22 Sep 2009

हम अकेले नही रह सकते

अब देखिये: जब आप सुनते हैं, यदि आप सुन रहें हैं, जब आप क्या कहा जा रहा है, यह सुनते हैं और उसमें हाजिर रहते हैं, न कि ये कि आप जो कहा जा रहा है उसे समझने की कोशिश करते हैं, हाजिर होने में मात्र जागरूकता होती है आप नहीं। वह क्षण जब आप जागरूक नहीं होते, आप एक केन्द्र होते हैं, आपका अहं या केन्द्र होता है। यह केन्द्र ही समस्याएं पैदा करता है। आपने जाना? नहीं? महानुभाव यह बहुत ही गंभीर बात है अगर आप इसमें गहरे जाएं। अगर एक ऐसा मन चाहिए जो समस्यारहित हो, और इसलिए अनुभव रहित भी तो यह बहुत ही गंभीर बात है। वह क्षण जब आप कुछ अनुभव करते हैं, और आप अनुभव को संचित करना, सहेजना चाहते हैं तब यह अनुभव एक स्मृति या या याद बन जाता है और आप इसे और अधिक मात्रा में चाहते हैं। तो वह मन जिसको कोई समस्या नहीं होगी, कोई अनुभव भी नहीं होगा। ओह! आप नहीं जानते कि इसमें कितनी सुन्दरता है।
क्या मैं आपसे आदरपूर्वक कह सकता हूं कि आप कृपया किसी के भी अनुयायी न बनें, अनुसरण न करें। लेकिन आप इसमें सहायता नहीं करते।
महोदय, इसका कारण जाने: हम अकेले नही रह सकते, हम सपोर्ट सम्बल चाहते हैं, हम दूसरों की ताकत चाहते हैं, हम चाहते हैं कि हमें एक समूह के रूप में पहचाना जाए, एक संस्थान के साथ। यह संस्थान (अब, कृष्णमूर्ति फाउंडेशन) उस तरह का संस्थान नहीं है, यह केवल पुस्तकें आदि प्रकाशित करने के लिए है। आप इसका अनुसरण नहीं कर सकतेे, क्योंकि आप किताबें नहीं छाप रहे, आप स्कूलों को नहीं चला रहे। पर संकल्पना है कि हम किसी चीज का हिस्सा बनें, ठीक? और किसीसे सम्बद्ध होना या अनुसरण ताकत देता है, ठीक? अगर मैं भारत में हूं और कहता हूं कि मैं हिन्दू नहीं हूं तो लोग मुझे जिस दृष्टि से देखेंगे वह खतरनाक होगी।

एक प्रश्नकर्ता ने कहा है कि जब वह एक चिन्हविशेष पर केन्द्रित होते हैं तो ताकत का अहसास करते हैं। हम सभी चिन्हों से जुड़े हैं। ईसाई जगत चिन्हांे से भरा पड़ा है। ठीक? सारा ईसाईजगत धार्मिक चिन्ह, छवियों, संकल्पनाओं, विश्वास, आदर्शों, रिवाजों से आच्छादित है इसी तरह का माहौल भारत में भी है बस नामकरण अलग है। जब कोई किसी विशाल समूह से सम्बद्ध रहता है जो समूह एक ही चिन्ह में श्रद्धा रखता है, वह एक अनन्य शक्ति प्राप्ति का अहसास करता है, यह प्राकृतिक है या बहुत ही आप्राकृतिक? यह आपमें जोश बनाये रखता है। यह आपमें यह अहसास बनाये रखता है कि आप कम से कम उसे चिन्ह से कुछ ज्यादा ही जानते समझते हैं।

पहले तो आप एक चिन्ह की खोज करते हैं - आप देखिये कि आपका मन कैसे काम करता है? पहले तो हम एक चिन्ह खोजते हैं, चर्च या मन्दिर मंे एक छवि, या यदि आप मस्जिद में हैं तो कोई अक्षर हम सब खोजते गढ़ते हैं और फिर उनकी पूजा शुरू कर देते हैं। हम उस सब की पूजा करते हैं जो हमने ही गढ़ा रचा या बनाया खोजा है यह मानकर कि वो हमारे अपने विचार से परे है.. जो हमें ताकत देता है शक्ति देता है।

तो क्या होता है? अब जबकि चिन्ह या संकेत या छवि जो कि वास्तविक नहीं है। पर चिन्ह या छवि हमें संतुष्टि देते हैं। चिन्हों को देखने, सोचने, उनके साथ रहने से हमें जोश, जीवनी शक्ति मिलती है। निश्चित ही जो विचार से सृजित हैं, मनोवैज्ञानिक रूप से वह संभ्रम और कल्पनाएं ही होंगे, क्या नहीं?

आप मुझे गढ़ सकते हैं, मैं आशा करता हूं कि आप ऐसा न करें, पर आप मुझे अपने गुरू के रूप में गढ़ लेते हैं। मैंने गुरू बनना सदा अस्वीकार किया है, यह एक बहुत ही बेहूदा चीज है क्योंकि मैंने देखा है कि किस तरह अनुयायी या शिष्य गुरू को और गुरू शिष्यों अनुयायियों को बर्बाद करते हैं। आप यह सब समझ रहें हैं न। मैंने यह देखा है। मेरे लिये यह सारी बात एक वीभत्सता है। क्षमा करें में रूक्ष भाषा का प्रयोग कर रहा हूं। पर जैसे आप मेरी एक गुरू की छवि बनाते हैं, वक्ता की छवि बनाते हैं, तो सारा गुरूघंटालों का धंधा अभी यहीं शुरू हो जाता है।
तो सर्वप्रथम यदि मैं कुछ इंगित करना चाहता हूं तो ये कि इन सब बातों में दिग्भ्रमित करने वाले चर्च और मन्दिर हैं, मस्जिदें हैं जो कि सच नहीं हैं, वास्तविक नहीं हैं। यह सब मन्दिर, मस्जिद, चर्च - पुजारियों के द्वारा, विचारों के द्वारा, हमारे डर के द्वारा, हमारी चिंता, भविष्य के प्रति अनिश्चितता से गढ़े गये हैं। आप समझें। हम एक संकेत या छवि बनाते हैं और उसी में फंस जाते, जकड़ जाते हैं। तो सर्वप्रथम हमें यह वास्तविकता जाननी होगी कि विचार वो चीज पैदा करता है जो हमं मनोवैज्ञानिक रूप से संतुष्टि प्रदान करती है, खुशी देती है। ठीक? वो हमें सुविधा देती है। ये संकेत या छवियां हमें अत्यंतिक सुविधा देती है। यह कुलमिलाकर संभ्रम है पर यह मुझे सुविधा देता है इसलिए मैं इससे परे कुछ देखता ही नहीं।
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