31 Dec 2008

ध्यान शुभता के पुष्प का खिलना ही है।

एक निःश्छल, निस्वार्थ दिल का होना ध्यान का आरंभ है। जब हम उस के बारे में बात करना चाहते हैं तो मन मस्तिष्क के अंतस्तल की कोशिशों की आवश्यकता होगी। हमें पहला कदम उसके सबसे निकट के बिंदु से उठाना होगा। ध्यान का फल है शुभता और निश्छल ह्दय ध्यान का आरंभ है। हम जीवन की बहुत सी चीजों के बारे में बात करते हैं। प्रभुता, महत्वाकांक्षा, भय, लोभ, ईष्र्या, मृत्यु के संबंध में बहुत सी बातें करते हैं। अगर आप देखें तो, अगर आप इनके भीतर तक जाएं तो, यदि आप ध्यानपूर्वक सुने तो ये सारी बातें एक ऐसे मन को खड़ा करने का आधार हैं जो ध्यान में सक्षम हो। आप ध्यान के शब्द से खेल सकते हैं - ध्यान नहीं कर सकते यदि आप महत्वाकांक्षी हों। यदि आपका मन प्रभुत्व का आकांक्षी है, संस्कारों में बंधा है, स्वीकार और अनुसरण में लगा है तो आप ध्यान की खूबसूरती का अतिरेक नहीं देख सकतेे।
समयबद्ध रूप से इच्छाओं को पूर्ण करने की कोशिशें, मन की निश्छलता को, निस्वार्थ भाव को खत्म करती हैं। और आपको चाहिए एक निश्छल मन - एक खुला ह्दय, जो आकाश की तरह खाली हो। एक दिल जो बिना विचारे, निरूद्देश्य देना चाहता हो बिना किसी प्रतिफल की आशा के। क्षुद्रतम से लेकर जितना भी उसके पास हो उसे देने की त्वरितता, बिना किसी असमंजस, भले बुरे की परवाह बगैर, मानरहित..... किसी ऊंचाईयां की तलाश की कोशिश बगैर, बिना प्रसिद्धि की लालसा में। ऐसे उर्वर मन की भूमि पर ही शुभता फूलती फलती है। और ध्यान शुभता के पुष्प का खिलना ही है।
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