3 Jul 2016

सच की तलाश में कोई अन्य कितना मददगार हो सकता है?


श्रीमन् किस भी सत्ता / प्रभुता का अनुसरण ना करें. किसी भी सत्ता के अनुयायी ना बने. प्रभुता या सत्ता ही शैतानियत है. सत्ता तबाह कर देती है, विकृति लाती है, भ्रष्ट करती है; और जो व्यक्ति सत्ता का अनुसरण कर रहा है स्वयं का विनाश तो कर ही रहा है वह उसको भी नष्ट कर देता है जिसे कि वह सत्ता या प्रभुता की गद्दी पर विराजमान करता है. जैसे अनुयायी नेता को नष्ट कर देते हैं वैसे ही नेता भी अनुयायियों को नष्ट कर देता है । जैसे शिष्य गुरू को नष्ट कर देते हैं वैसे ही गुरू भी शिष्यों को नष्ट कर देते हैं।

सत्ता से आप कभी भी कुछ भी हासिल नहीं कर सकते. सत्य या हकीकत की खोज के लिए आपको सत्ता से पूरी तरह मुक्त होना होता है. सबसे मुश्किल बातों में से एक यह है कि — सत्ता से मुक्त हुआ जाये, बाहरी सत्ता से भी और भीतरी सत्ता से भी. भीतरी सत्ता है अनुभवों की चेतना, ज्ञान की चेतना. और बाहरी सत्ताएं हैं राज्य, पार्टियॉं, समूह संप्रदाय, समुदाय.. एक वो व्यक्ति जिसे कि सच की खोज करनी है, सच का पता लगाना है उसे इन सारी भीतरी और बाहरी सत्ताओं / प्रभुताओं से अलग रहना होता है. तो यह न कहिये कि क्या सोचना है / पठन पाठन या पढ़ने का यही अभिशाप है कि दूसरे के शब्द ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
तो प्रश्न उठते हैं इस वाक्य के साथ कि ''हमें बताया गया है कि..''. तो कौन है जो आपको बता रहा है? आपको किसने बताया? श्रीमन! क्या आप यह नहीं देख पा रहे कि महान नेता और संत और महान शिक्षक भी असफल रहे हैं, फेल हैं.. क्योंकि "हम वैसे ही हैं जैसे कि हम हैं?" तो उन सबको छोड़ दें. आपने उनको असफल कर दिया है, क्योंकि आप सच की तलाश नहीं कर रहे; आप किसी ऊंची योग्यता, या सुख या आनंद की फिराक में ये सब पढ़ते लिखते हैं. तो मेरे या जे कृष्णमूर्ति सहित किसी का भी अनुसरण ना करें, किसी अन्य को अपना प्रभु ना बनाये, आपको स्वयं ही अपना गुरू और शिष्य बनना है. जिस क्षण आप किसी को अपना गुरू और स्वयं को उसका शिष्य मान लेते हैं... आप सच को अस्वीकार कर देते हैं, नकार देते हैं. सच की खोज में ना तो कोई गुरू होता है ना शिष्य.
सच की तलाश, सच की खोज महत्वपूर्ण है ना कि आप या वो गुरू जो कि सच की खोज में आपकी मदद करने वाला है. आप देख ही सकते हैं कि आधुनिक शिक्षा और पुरानी शिक्षा ने भी आपको यह सिखाया है कि ''क्या सोचना है?'' ये नहीं कि ''कैसे सोचना है''. उसने आपको एक फ्रेम एक ढांचें या सांचे में डाल दिया है और यह ढांचा आपको नष्ट कर देता है, क्योंकि आप तभी किसी गुरू, किसी शिक्षक, किसी राजनीतिक नेता या अन्य के अनुयायी या शिष्य बनते हैं जब आप भ्रम या भ्रांति में होते हैं. अन्यथा आपको कभी भी किसी का अनुयायी बनने की क्या जरूरत है. य​दि आप स्वयं में बढ़े स्पष्ट हैं. यदि आपकी सोच पारदर्शी है, यदि आप अपनी भीतरी समझ के प्रकाश से ही आलोकित हैं, तो आप कभी भी किसी के अनुयायी नहीं बनेंगे.
लेकिन ऐसा नहीं हेाता इसलिए आप अनुयायी बनते हैं, आप अपनी भ्रांति या भ्रम में अनुयायी हो जाते हैं, तो आप जिसका अनुसरण करते हैं उसको भी भ्रम या भ्रांति में डालते हैं. आपके नेता भी उतने ही भ्रम या भ्रांति में हैं जितने कि स्वयं आप. राजनीतिक रूप से भी और धार्मिक रूप से भी. इसलिए सर्वप्रथम अपनी भ्रम भ्रांति को दूर का स्पष्ट हो जऐं, ताकि आप स्वयं अपने विवेक के आलोक में आलोकित हों और तब अन्य समस्याएं खत्म हो जाएंगी. गुरू और शिष्य के भीेच का भेद बड़ा ही अन—अध्यात्मिक और अधार्मिक है.

Sir, don’t follow any authority. Authority is evil. Authority destroys, authority perverts, authority corrupts; and a man who follows authority is destroying himself and destroying also that which he has placed in a position of authority. The follower destroys the master as the master destroys the follower. The guru destroys the pupil as the pupil destroys the guru.

Through authority you will never find anything. You must be free of authority to find reality. It is one of the most difficult things to be free of authority, both the outer and the inner. Inner authority is the consciousness of experience, consciousness of knowledge. And outward authority is the state, the party, the group, the community. A man who would find reality must shun all authority, external and inward. So, don’t be told what to think. That is the curse of reading – the word of another becomes all-important.
The question begins by saying, ”We have been told.” Who is there to tell you? Sir, don’t you see that leaders and saints and great teachers have failed, because you are what you are? So leave them alone. You have made them failures because you are not seeking truth; you want gratification. Don’t follow anyone, including myself; don’t make of another your authority. You yourself have to be the master and the pupil. The moment you acknowledge another as a master and yourself as a pupil, you are denying truth. There is no master, no pupil, in the search for truth.

The search for truth is important, not you or the master who is going to help you to find the truth. You see, modem education, and also the previous education, have taught you what to think, not how to think. They have put you within a frame, and that frame has destroyed you, because you seek out a guru, a teacher, a leader, political or other, only when you are confused. Otherwise you never follow anybody. If you are very clear, if you are inwardly a light unto yourself, you will never follow anyone. But because you are not, you follow; you follow out of your confusion, and what you follow must also be confused. Your leaders as well as yourself are confused, politically and religiously. Therefore, first clear up your own confusion, become a light unto yourself, and then the problem will cease. The division between the master and the pupil is unspiritual.

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