8 Feb 2010

सृजन के द्वार खोलना


सच्चे शाब्दिक मायनों में सीखना केवल जागरूकता अवधानपूर्ण अवस्था में ही संभव है, जिसमें आन्तरिक या बाहृय विवशता न हो। उपयुक्त चिंतन-मनन केवल तब हो सकता है, जब मन परंपरा और स्मृति की दासता में न हो। अवधानपूर्ण होना ही मन में शांति को आंमत्रित करता है, जो कि सृजन का द्वार है। यही वजह है कि अवधान या जागरूकता सर्वोच्च रूप से महत्वपूर्ण हैं। मन की उर्वरता के लिए क्रियात्मक स्तर पर ज्ञान की आवश्यकता होती है, न कि ज्ञान पर ही रूक जाने की। हमारा सरोकार छात्र के मानव के रूप में सम्पूर्ण विकास पर होना चाहिए ना कि गणित, या वैज्ञानिक या संगीत जैसे किसी एक क्षेत्र में उसकी क्षमता बढ़ाने से। हमारा सरोकार छात्र के सम्पूर्ण मानवीय विकास से होना चाहिए। अवधान की अवस्था किस प्रकार उपलब्ध की जा सकती है? यह अनुनय-विनय-मनाने, तुलना करने, पुरस्कार अथवा दंड जैसे दबाव के तरीकों से नहीं उपजायी जा सकती। भय का निर्मूलन अवधानपूर्ण होने की शुरूआत है। जब तक कुछ होने, कुछ हो जाने कि जिद या अपेक्षा जो कि सफलता का पीछा करने जैसा है, जब तक हैं - ....अपनी सम्पूर्ण निराशा, अवसाद और कुटिल विसंगतियों के साथ... भय बना रहता है। आप ध्यान केन्द्रित करना सिखा सकते हैं, लेकिन अवधानपूर्ण होना नहीं सिखा सकते वैसे ही जैसे कि भय से स्वाधीन रहना नहीं सिखा सकते। लेकिन हम शुरूआत कर सकते हैं - भय को पैदा करने वाले कारणों को खोजकर.... उन कारणों को समझना भय के निर्मूलन में सहायक हो सकता है। तो जब छात्र के आसपास अच्छाई का वातावरण बनता है, जब वह अपने आपको सुरक्षित और सहज महसूसत करता है तो जागरूकता या अवधान तुरन्त ही उदित हो जाता है। जागरूकता या अवधान सप्रेम निष्काम कर्म की तरह उसमें चले आते हैं। प्रेम तुलना नहीं है इसलिए कुछ होने की ईष्र्या और दमन भी अपने आप ही समाप्त हो जाते हैं।

Opening the door to creation

Learning in the true sense of the word is possible only in that state of attention, in which there is no outer or inner compulsion. Right thinking can come about only when the mind is not enslaved by tradition and memory. It is attention that allows silence to come upon the mind, which is the opening of the door to creation. That is why attention is of the highest importance. Knowledge is necessary at the functional level as a means of cultivating the mind, and not as an end in itself. We are concerned, not with the development of just one capacity, such as that of a mathematician, or a scientist, or a musician, but with the total development of the student as a human being.
How is the state of attention to be brought about? It cannot be cultivated through persuasion, comparison, reward or punishment, all of which are forms of coercion. The elimination of fear is the beginning of attention. Fear must exist as long as there is an urge to be or to become, which is the pursuit of success, with all its frustrations and tortuous contradictions. You can teach concentration, but attention cannot be taught just as you cannot possibly teach freedom from fear; but we can begin to discover the causes that produce fear, and in understanding these causes there is the elimination of fear. So attention arises spontaneously when around the student there is an atmosphere of well-being, when he has the feeling of being secure, of being at ease, and is aware of the disinterested action that comes with love. Love does not compare, and so the envy and torture of `becoming' cease.
J. Krishnamurti Life Ahead Saanen 4th Public Dialogue 3rd August 1974. 

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