20 Dec 2009

जो जो प्रेम नहीं है उसे नकारना



प्रेम क्या है?  हम यह चर्चा नहीं कर रहे कि प्रेम को क्या होना चाहिये? हम यह देख रहे हैं कि वो क्या है जिसे हम प्रेम कहते हैं। आप कहते हैं ”मैं अपनी पत्नी से प्यार करता हूँ“ पर मैं नहीं जानता कि आपका प्रेम क्या है? मुझे संदेह है कि आप किसी भी चीज से प्यार प्रेम करते हों। क्या आप प्रेम शब्द का अर्थ भी जानते हैं? क्या प्रेम आमोद-प्रमोद या मजा है? क्या प्रेम ईर्ष्‍या है? क्या वह व्यक्ति प्रेम कर सकता है जो महत्वाकांक्षी हो? हो सकता है वो अपनी पत्नी के साथ सोता हो, कुछ बच्चे भी पैदा कर लिये हों। एक व्यक्ति जो राजनीति में या व्यापार जगत में एक महत्वपूर्ण व्यक्ति बनने के लिए संघर्षरत हो अथवा धार्मिक जगत में जहां कि वो एक संत बनना चाहता हो जहां कि उसे इच्छारहित होना है.... यह सब महत्वाकांक्षाओं, आक्रामकता, इच्छाओं के ही अवयव हैं।
क्या एक व्यक्ति जो कि प्रतियोगिता में, दौड़ में शामिल हो... वो प्रेम में हो सकता है? और आप सब प्रतियोगिता में हैं, क्या आप नहीं? अच्छे जॉब, बेहतर पद प्रतिष्ठा, अच्छा घर, अधिक महान विचार, अपनी अधिक सुस्पष्ट छवि बनाने में लगे हैं.. आप सब जानते हैं कि आप इन सब से गुजर ही रहे हैं। क्या यह सब प्रेम है? क्या आप तब प्रेम कर सकते हैं जब आप यह सब अत्याचार सम्पन्न करते गुजर रहे हों, जब आप अपनी ही पत्नि या पति या बच्चों पर प्रभुत्व जमा रहे हों? जब आप ताकत या शक्ति की खोज में लगे हों? तब क्या प्रेम की कोई संभावना बचती है? तो जो जो प्रेम नहीं है उस सब को नकारते अस्वीकार करते हुए हम जहां पहुंचते हैं वो प्रेम होता है। आप समझे श्रीमन्? आपको उस सबको अस्वीकार या नकारना होगा जो प्रेम नहीं है। जो कि महत्वाकांक्षा ना हो, प्रतियोगिता ना हो, क्रोध आक्रामकता ना हो, हिंसा ना हो - भले ही वो बोलचाल में हो या आपके कृत्यों में या विचारों में। जब आप उस सब को अस्वीकार... नकार देंगे जो प्रेम नहीं है, तब आप जानेंगे कि प्रेम क्या है।

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