30 Nov 2009

प्रत्येक विचार की जड़ तक जाना



विचार को खत्म करने के लिए हमें सर्वप्रथम तो सोचने विचारने के मशीनी तरीके को समझना होगा। हमें अपने भीतर, गहरे तक विचार को ही पूरी तरह समझना होगा। हमें प्रत्येक विचार की जॉंच करनी होगी, किसी भी विचार को बिना समझे जाने दिये। कोई भी विचार ऐसा नहीं होना चाहिए जो बिना हमारी जॉंच, हमारे ज्ञान और समझ के बिना हमारे मन में हो। इसके लिए हमारा मस्तिष्क, मन और हमारा सम्पूर्ण अस्तित्व बहुत ही सावधान, सचेत होना चाहिए।
जब हम विचार की जड़ तक जाते हैं, पूरी तरह उसके अंत तक जाते हैं, उस समय हम देखेंगे कि विचार स्वयं के द्वारा ही समाप्त होता है। हमें इसके खात्मे के लिए कुछ अतिरिक्त नहीं करना होता क्योंकि विचार एक स्मृति या याद है। स्मृति अनुभव के छोड़े हुए निशान या चिन्ह हैं और जब कि कि अनुभव को पूरी तरह, सम्पूर्ण रूप से नहीं समझा गया होता, वह निशान छोड़ता है। यदि हम अनुभव को सम्पूर्णता में अनुभव करते हैं, जीते हैं तब उस पल अनुभव अपने पीछे कोई निशानी नहीं छोड़ता। तो यदि हम प्रत्येक विचार की जड़ तक जायें और देखें कि निशान हैं और यह निशान तथ्य रूप में हैं तो हमें इस तथ्य को उघाड़ना होगा, उसे खोलना होगा और उसकी विचार श्रंखला, विचार प्रक्रिया को समझकर उसके अंत तक जाना होगा, ताकि हमारे मन में प्रत्येक विचार, प्रत्येक अहसास हमारी अपने द्वारा समझा बूझा हुआ हो।

Pursuing every thought to the root
To end thought I have first to go into the mechanism of thinking. I have to understand thought completely, deep down in me. I have to examine every thought, without letting one thought escape without being fully understood, so that the brain, the mind, the whole being becomes very attentive. The moment I pursue every thought to the root, to the end completely, I will see that thought ends by itself. I do not have to do anything about it because thought is memory. Memory is the mark of experience; and as long as experience is not fully, completely, totally understood, it leaves a mark. The moment I have experienced completely, the experience leaves no mark. So if we go into every thought and see where the mark is and remain with that mark as a fact—then that fact will open and that fact will end that particular process of thinking, so that every thought, every feeling is understood.
[Krishnamurti on Education, pp 119-120]


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