21 Nov 2009

ध्यान जीवन से अभिन्न है



ध्यान जीवन से अलग नहीं है। ऐसा नहीं करना है कि कमरे के किसी कोने में जाकर बैठ जाना है, 10 मिनट ध्यान लगाना है और उसके बाद वापस अपनी कसाईपने वाले ढर्रे पर लौट आना है। कसाई की... ये उपमा नहीं हकीकत है। ध्यान सर्वाधिक गंभीर चीजों में से एक है। इसे आप सारा दिन, दफ्तर में, परिवार में, किसी से यह कहते हुए कि ’’मुझे तुमसे प्यार है’’, या फिर अपने बच्चों के बारे में सोचते हुए.. इसे सारा दिन ध्यान में रखना है। क्या आपने ध्यान से देखा है कि आप अपने बच्चों को किसी की हत्या...सैनिक बनने की शिक्षा देते हैं, आप उसमें राष्ट्रीयता की भावना कूट-कूट कर भरते हैं, झण्डे का सम्मान करना सिखाते हैं, और आधुनिक युग की अंधी दौड़ में दौड़ना सिखाते हैं।
इन सब बातों को देखना, इनमें अपनी भूमिका की वास्तविकता पहचानना, ये सब ध्यान का ही हिस्सा है। जब आप ध्यानपूर्ण होते हैं तो आप इसकी अत्यंतिक सुन्दरता को पहचान पाते हैं, तब आप अपने आप ही सही काम करने लगते हैं या गलती होती भी है तो आप खेद या क्षमा में समय गंवाये बगैर इसे तुरन्त ही सुधार देते हैं। ध्यान जीवन का एक अंग है, जीवन से इतर कुछ नहीं।

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