16 Nov 2009

ध्‍यान न प्रार्थना, है न समर्पण



प्रार्थना शायद परिणाम देती हो अन्यथा करोड़ों लोग प्रार्थना नहीं करते। और शायद प्रार्थना मन को शांत भी बनाती है, किन्हीं विशेष शब्दों को दोहराते रहने से मन शांत हो जाता है। और इस शांति में कुछ पूर्वाभास, कुछ नजर आना, कुछ जवाब मिलना जैसा भी होता होगा। लेकिन ये सब मन की ही चालाकियाँ और कारगुजारियाँ हैं, क्योंकि इस सब के बावजूद इस प्रकार की तंद्रावस्था को गढ़ने वाले आप ही हैं, जिसके द्वारा आपने मन को शांत किया गया है। इस शांत अवस्था में कुछ छिपी हुई प्रतिक्रियाऐं आपके अचेतन और चेतना के बाहर से उठती हैं। लेकिन इस सब के बावजूद भी ये एक वैसी ही अवस्था है जिसमें समझबूझ नहीं होती।
न ही ध्यान समर्पण है - किसी सिद्धांत के प्रति समर्पण, किसी छवि, किसी विचार के प्रति समर्पण क्योंकि मन की बातें वही आदर्शवादी, मूर्ति-चिन्ह-विचार पूजक, दोहराव-पूजक होती हैं।
कोई मूर्ति की पूजा नहीं करता ये सोचते हुए कि वो मूर्तिपूजा कर रहा है और ये मूर्खता है, अंधविश्वास है अपितु बहुत से लोगों की तरह हर व्यक्ति अपने मन में पैठी बातों, आदर्शों की पूजा करता है वो भी आदर्शपूजन ही है न। यह एक छवि, एक विचार, एक सिद्धांत के प्रति समर्पण है यह ध्यान नहीं है। जाहिर है कि ये अपने आप से ही पलायन का एक तरीका है, यह बहुत ही सुविधाजनक पलायन है, लेकिन अंततः पलायन ही है न।
Share/Bookmark