23 Oct 2009

रिश्ते दर्पण की तरह हैं।

रिश्ते दर्पण की तरह हैं जिनमें हम अपने आप को देख सकते हैं जैसे कि अभी हम हैं। इस पृथ्वी पर कोई भी ऐसी जिन्दा चीज नहीं जो किसी अन्य से सम्बंधित न हो। यहाँ तक की जंगल में अकेला बैठा सन्यासी भी अपने अतीत और अपने आसपास के लोगों से जुड़ा होता है। सम्बंधों से पलायन संभव ही नहीं है। यही संबंध एक दर्पण की तरह होते हैं जिनमें हम अपने आपको देख सकते हैं, हम यह खोज सकते हैं कि हम क्या हैं। इसी दर्पण में हम अपनी प्रतिक्रियाएं, पूर्वधारणाएं, गुस्सा, क्रोध, अपने भय, तनाव, विषाद, क्षोभ, अकेलापन, शोक, दर्द और दुख को देखते हैं। सम्बंधों के दर्पण में ही हम देख सकते हैं कि हम प्यार करते हैं या इस तरह की कोई चीज है ही नहीं। हमें रिश्तों संबंधी प्रश्नों की जाँच करनी चाहिए क्योंकि यही प्रेम का आधार हैं।
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