16 Jun 2010

जिन्दगी का मतलब क्या है?


जिन्दगी का मतलब जीने में है। जब हम डरे हुए रहते हैं, या किसी के कहे मुताबिक चलते हैं, या हम किसी की नकल करते हुए जिन्दगी जीते हैं तो क्या इसे जीना कहेंगे? क्या तब जिन्दगी लीने लायक होती है? किसी प्रमाणित व्यक्ति के रूप में स्थापित व्यक्ति का पिछलग्गू बनना, क्या जिन्दगी जीना है? जब हम किसी के पिछलग्गू बने होते हैं, चाहे वे महान संत, राजनेता या विद्वान हो, तब क्या हम जी रहे होते हैं?
यदि आप ध्यानपूर्वक अपने तौर तरीकों को देखें तो आप पाएंगे कि आप किसी ना किसी के पद्चिन्हों पर चलने के अलावा कुछ अन्य नहीं कर रहे हैं। दूसरों के कदमों पर कदम रखते हुए चलने के सिलसिले को हम जीना कह देते हैं और इसके अंत में हम यह सवाल भी करते हैं कि जिन्दगी की अर्थवत्ता क्या है? लेकिन यह सब करते हुए जिन्दगी का कोई मतलब नहीं रह जाता है। जिन्दगी में अर्थवत्ता तब ही हो सकती है जब हम कई तरह की मान्यताओं और प्रमाणिकताओं को एक ओर रख दें, जो कि सरल नहीं है।
कुछ और वि‍स्‍तार से पढ़ें, इन लि‍न्‍क पर:
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21 May 2010

ईश्वर की पहचान

आप जानते हैं कि कैसे एक ग्रामीण व्यक्ति या किसान उस प्रतिमा को ईश्वर मान लेता है जिस पर वह कुछ फल फूल आदि चढ़ाता है। आदिम मानव बादलों के गरजने को ईश्वर का इशारा समझता था कुछ अन्य मनुष्य पेड़-पौधों प्रकृति को भगवान मानते हैं। जैसे हमारे देश में पीपल, बरगद का पूजन किया जाता है वैसे ही यूरोप में सेब और जैतून के वृक्षों की पूजा की जाती रही है। ये सब आज भी चला आ रहा है।
बहुत पुराने शहरों से लेकर अभी अभी बने शहरों तक सभी जगह मन्दिर होते हैं। मन्दिरों में मूर्तियां होती हैं जिन पर तेल, फूलों के हार, आभूषण चढ़ाकर पूजा जाता हैं। इसी तरह आप भी कोई नई कल्पना रच सकते हैं, जो कि आपके वंश की परंपरा आपकी पारिवारिक पृष्ठभूमि से उपजी हो और उसे आप ईश्वर कह सकते हैं। शायद आपको मालूम ना हो जिस व्यक्ति ने संसार में पहले पहल परमाणु बम गिराये थे उसने भी सोचा था कि ईश्वर उसके साथ है। हिटलर से लेकर किचनर तक सभी युद्धोन्मादी, सेना में छोटे बड़े ओहदों पर आसीन सभी नायक ईश्वर के नाम पर युद्ध करने में जरा नहीं हिचकते। तो क्या यह सब प्रतिमा, विचार और कर्मकाण्ड ईश्वर हो सकता है? या क्या ईश्वर कोई ऐसी चीज है जिसका आकलन हम अपने मन से नहीं कर सकते जो हमारी कल्पना से परे की चीज है।
ईश्वर की गूढ़ता की थाह ले पाना हमारे लिए असंभव है। ईश्वर के सत्य का अनुभव कभी कभी तब होता है जब हम पूर्णतः मौन में होते हैं, जब हमारा मन प्रक्षेपण में रत नहीं होता, जब हम अन्दर ही अन्दर खुद से ही युद्ध और संघर्ष की स्थिति में नहीं होते। जब मन निश्चल होता है शायद तब हम जान पाते हैं कि ईश्वर क्या है?
इसलिये यह बहुत महत्वपूर्ण है कि कम उम्र से ही हम ईश्वर शब्द में अटकें नहीं, ईश्वर के बारे में हमें दूसरों द्वारा जो कुछ भी बताया समझाया जाता है उसे स्वीकारें नहीं। लाखों लोग हैं जो ईश्वर के संबंध में आपको सिखाने, बताने, समझाने के लिए उत्सुक हैं परन्तु हमें यह करना है कि जो कुछ भी वो कहें हम उस सबकी जांच करें। इसी तरह कुछ ऐसे भी लोग हैं जो कहते हैं ईश्वर वगैरह कुछ नहीं होता - तो हम इन लोगों की भी ना सुनें पर बारीकी और सावधानी से हर बात की जांच पड़ताल करें। ना विश्वास करने वालों पर अंधविश्वास करें ना ईश्वर को नकारने वाले को ही मानें। जब हमारा मन विश्वास और अविश्वास दोनों से ही आजाद होता है तब मन निश्चल होता है, केवल तभी संभावना बनती है कि ईश्वर संबंधित सत्य का बोध हो सके।
इन सब पहलुओं के बारे में खुले मन से सोचने समझने की जरूरत है, इन सब के बारे में किसी व्यक्ति को कहां से शुरूआत करनी है यह सब कोई नहीं बताता।
जब आप किसी महान गुरूनुमा व्यक्ति के पास जाते हैं तो वह आपको सिद्ध करके बताने की कोशिश करेगा कि ईश्वर है, वह कई विधियां बतायेगा कि किस किस तरह से क्या क्या करने पर ... यह मंत्र जपो तो ये होगा, इस प्रकार पूजा करो तो ये होगा, इस व्रत उपवास अनुशासन का पालन करने पर यह परिणाम होगा आदि। यह सब करने के बाद भी आप पायेंगे कि जो प्राप्त होगा वह ईश्वर नहीं। आपको वही प्राप्त होगा जिस चीज को आपका मन प्रक्षेपित कर रहा है, जिस चीज की रचना मन कर रहा है, यह सब आपकी मानसिक इच्छाओं की ही एक छवि होगी पर ईश्वर कदापि नहीं।
तो ईश्वर उसके बारे में जानना समझना इतना भी सरल नहीं है। ईश्वर संबंधित बातों को जानने समझने के लिए बहुत अधिक चिंतन मनन खोजबीन की जरूरत है। पहले तो अपने आपको सारे पूर्वाग्रहों से मुक्त करना होगा। अपने आपको इस योग्य बनाना होगा कि आप स्वयं इसका पता लगा सकें, स्वयं ही इन सब बातों के पीछे के रहस्यों को जान सकें। इस कार्य में कोई दूसरा आपका आधार नहीं बन सकता, आपको अपनी सहायता स्वयं करनी होगी, स्वयं ही ईश्वर को तलाशना होगा।

13 May 2010

सुन्दर संसार की परिभाषा क्या है?


हम सोचते हैं कि परिभाषा को समझ लेने पर हम उस शब्द को समझ जायेंगे जिसे परिभाषित किया गया है। लेकिन परिभाषा समझ नहीं होती, बल्कि इसके विपरीत यह तो सोचने का सर्वाधिक विनाशक तरीका है। हम सुन्दर विश्व की परिभाषा इसलिए जानना चाहते हैं ताकि हमें इस बारे में चिंतन-मनन ना करना पड़े, दिमाग का इस्तेमाल ना करना पड़े, सब पका पकाया कोई हमे समझा दे। आप इस संबंध में किताबें उलट-पलट कर या दार्शनिकों-विचारकों के पास जाकर सुंदर विश्व का अर्थ जान लेना चाहते हैं, इससे आपको शब्दों के अलावा कुछ हासिल नहीं होगा। हकीकत यह है कि उस प्रत्येक व्यक्ति को जिसे कि ‘‘सुंदर विश्व’’ की परिभाषा यथार्थ में जाननी समझनी है उसे गहराई से इसका चिंतन मनन करना होगा और उस शब्द के पीछे का सत्य भी जानना होगा।
प्रत्येक व्यक्ति की अपनी आशा, विश्वास, भाव और मानसिक स्थिति के अनुसार सुन्दर विश्व का अलग-अलग अर्थ हो सकता है। हो सकता है कि दो अलग अलग व्यक्तियों की सुन्दर विश्व के बारे में अपनी अपनी परिभाषायें हों जो सर्वथा विपरीत हों।
अब जरा तथ्य देखिये हमारी दुनिया एक सड़ी गली दुनियां है, यहां युद्ध हैं, धार्मिक, जातिवादी, आर्थिक, मानसिक सब तरह के विभाजन हैं। यह एक भ्रष्ट और विकृत संसार है।
शब्दों में बह जाना ठीक नहीं। हमें बचपन से ही हमेशा यह सिखाया जाता है कि क्या सोचें,,, यह हमें कभी नहीं सिखाया जाता कि कैसे सोचें?
‘सिमेंटिक्स’ नामक विज्ञान में शब्दों के तात्पर्य का अध्ययन किया जाता है। जो भी शब्द आज वर्तमान में प्रचलित हैं, या नये शब्द अस्तित्व में आ रहे हैं उनके विकास के मूल में एक संपूर्ण विज्ञान है। चूंकि शब्द हमें मानसिक और साथ ही भौतिक रूप से भी प्रभावित करते हैं अतः यह महत्वपूर्ण है कि हम उन्हें समझें पर उनसे अप्रभावित रहें। जिस क्षण साम्यवाद शब्द का इस्तेमाल किया जाता है, यदि कोई पूंजीवादी सरोकार वाला व्यक्ति उसे सुन ले तो उसे कंपकंपी छूटने लगती है। किसी गुरू के अनुयायी को आप यह समझायें कि ‘‘दूसरे के अनुयायी मत बनो, अनुयायी बनना नासमझी है’’ तो वह तुरन्त तनकर खड़ा हो जायेगा और आपको भागने पर मजबूर कर देगा। शब्दों से होने वाला यह निरंतर भय समझ के अभाव के कारण होता है।
आखिर शिक्षा का यही तो अर्थ है - शब्दों के माध्यम से दिये जाने वाले संप्रेषण को समझना, ना कि शब्दों में उलझ कर रह जाना।
सुंदर विश्व जैसी कोई चीज नहीं होती। चीजें जैसी हैं हमें उन्हें वैसा ही स्वीकारें, ना कि किसी आदर्श की तरह। विश्व कैसा होना चाहिए इस बारे में कोई आदर्श ना रखें। सभी आदर्श - आदर्श विद्यालय, आदर्श देश, आदर्श नायक, या अहिंसा आदि के सारे आदर्श बेतुके और हास्यास्पद होते हैं.. भ्रामक होते हैं। तथ्यतः वास्तविक वही है जो है। यदि सही मायने में हम विभिन्न चीजों को - गरीबी-भुखमरी, अलगाव, कटुता, आकांक्षा, लोभ, भ्रष्टाचार, भय आदि को जैसे वे हैं वैसा का वैसा ही उन्हें यथारूप समझ लें तो हम सब इनसे निपट सकते हैं, इन्हें मिटा सकते हैं। किंतु यदि हम आदर्श बनाते हैं, हम कहते हैं कि मुझे यह अथवा वह होना चाहिए तो हम भं्रातियों में भटकने लगते हैं। हमारे देश में सदियों से निरंतर जिन आदर्शों की घुट्टी पिलाई जाती रही है वे सभी भ्रम हैं। अतः क्या यह उचित नहीं होगा कि अहिंसा की बातें करने की बजाय हिंसा को समझा जाए? यदि आप ‘‘जो हैं’’ की समझ रखते हैं तो ही किसी वास्तविक क्रांति की संभावना बनती है।

20 Apr 2010

समझ अस्तित्व में कैसे आती है?


मुझे नहीं मालूम, अगर आपने कभी इस बात पर गौर किया है या नहीं कि,किसी समस्या को जितना ज्यादा आप समझने की कोशिश करते हैं, जूझते हैं बूझते हैं... समस्या को समझने में आपको उतनी ही मुश्किल आयेगी। लेकिन जिस पल आप संघर्ष करना बंद करते हैं और उस समस्या को अपनी सारी कहानी सुनाने का मौका देते हैं, अपनी सारी हकीकत बयान करने देते हैं - तब बात समझ में आ जाती है। इससे हम यह स्पष्ट ही जान सकते हैं कि किसी बात को समझने के लिए आपके मन का चुप होना बहुत जरूरी है। मन का बिना हां ना किये, निष्क्रिय रूप से जागरूक, सजग रहना जरूरी है इस स्थिति में ही हममे जीवन की कई समस्याओं की समझ आती है।
लंदन 23 अक्टूबर 1949

23 Mar 2010

जे कृष्णमूर्ति जी के साहित्य का हिन्दी अनुवाद

जे कृष्णमूर्ति जी के साहित्य का वृहद हिन्दी, गुजराती और पंजाबी अनुवाद  http://www.jkrishnamurtionline.org/index  पर भी उपलब्ध है!

20 Mar 2010

जे. कृष्णमूर्ति जी का परि‍चय





जे. कृष्णमूर्ति का जन्म 11 मई 1895 को आन्ध्रप्रदेश के एक छोटे से कस्बे मदनापल्ली में एक धर्म परायण परिवार में हुआ था। उनका पूरा नाम जिड्डू या जिद्दू कृष्णमूर्ति है।

विभिन्न धर्मग्रंथो में वर्णित इस मान्यता के अनुसार कि मानवता के उद्धार के लिए समय-समय पर परमचेतना मनुष्य रूप में अवतरित होती है, थियोसोफिकल सोसायटी के सदस्य पहले ही किसी विश्वगुरू के आगमन की भविष्यवाणी कर चुके थे। श्रीमती बेसेंट और थिऑस्फ़िकल सोसायटी के प्रमुखों को जे.कृष्णमूर्ति में वह विशिष्ट लक्षण दिखे जो कि एक विश्वगुरू में होते हैं। तो श्रीमती बेसेंट द्वारा किशोरवय में ही जे.कृष्णमूर्ति को गोद लेकर उनकी परवरिश पूर्णतया धर्म और आध्यत्म से ओतप्रोत परिवेश में की गई। उनकी संपूर्ण शिक्षा इंग्लैंड में हुई।

जे कृष्णमूर्ति ने किसी जाति, राष्ट्रयता अथवा धर्म में अपनी निष्ठा व्यक्त नहीं की ना ही वे किसी परंपरा से आबद्ध रहे।
सन् 1922 में श्री कृष्णमूर्ति किन्हीं गहरी आध्यात्मिक अनुभूतियों से होकर गुजरे और उन्हें उस करूणा का स्पर्श हुआ जिसके बारे में उन्होंने स्वयं कहा ”वो करूणा सारे दुख, कष्टों को हर लेती है“।

उन्होंने सत्य के मित्र और प्रेमी की भूमिका निभायी लेकिन स्वयं को कभी भी गुरू के रूप में नहीं रखा। उन्होंने जो भी कहा वह उनकी अन्तर्दृष्टि का संप्रेषण था। उन्होनंे दर्शनशास्त्र की किसी नई पद्धति या प्रणाली की व्याख्या नहीं की, बल्कि मनुष्य की रोज़मर्रा की जिन्दगी से ही - भ्रष्ट और हिंसापूर्ण समाज की चुनौतियों, मनुष्य की सुरक्षा और सुख की खोज, भय, दुख, क्रोध जैसे विषयों पर कहा। बारीकी से मानव मन की गुत्थियों को सुलझा कर लोगों के सामने रखा। दैनिक जीवन में ध्यान के यथार्थ स्वरूप, धार्मिकता की महत्ता के बारे में बताया। उन्होनंे विश्व के प्रत्येक मानव के जीवन में उस आमूलचूल परिवर्तन की बात कही जिससे मानवता की वास्तविक प्रगति की ओर उन्मुख हुआ जा सके।

उन्होंने हमेशा इस बात पर जोर दिया कि मनुष्य की वैयक्तिक और सामाजिक चेतना दो भिन्न चीजें नहीं, ”पिण्ड में ही ब्रम्हांड है“ इस को समझाया। उन्होंने बताया कि वास्तव में हमारी भीतर ही पूरी मानव जाति पूरा विश्व प्रतिबिम्बित है। प्रकृति और परिवेश से मनुष्य के गहरे रिश्ते और प्रकृति और परिवेश से अखण्डता की बात की। उनकी दृष्टि मानव निर्मित सारे बंटवारों, दीवारों, विश्वासों, दृष्टिकोणों से परे जाकर सनातन विचार के तल पर, क्षणमात्र में जीने का बोध देती है।
बुदधत्व उपरांत 65 वर्षों तक वे अनथक सारी दुनियां में भ्रमण करते हुए निज अर्न्तदृष्टि से उद्भूत सार्वजनिक वार्ताओं, साक्षात्कार, निजी विवेचनाओं, संवाद, लेखन और व्याख्यानों के माध्यम से सत्य के विभिन्न पहलुओं से लोगों को परिचित कराते रहे। उन्होंने बताया कि किसी भी गुरू, संगठित धर्म, राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक उपाय से मनुष्य में भलाई, प्रेम और करूणा नहीं पैदा की जा सकती।

उन्होंने कहा कि मनुष्य को स्वबोध के जरिये, अपने आपसे परिचय करते हुए स्वयं को भय, पूर्वसंस्कारों, सत्ता प्रामाण्य और रूढ़िबद्धता से मुक्त करना होगा, यही मनुष्य में व्यवस्था और आमूलचूल मनोवैज्ञानिक परिवर्तनों का आधार हो सकता है।

हर तरह की आध्यात्मिक तथा मनोवैज्ञानिक दावेदारी को नकारना और उन्हें भी कोई गुरू या अथॉरिटी ना बना डाले इससे आगाह करना उनके चेतावनी वाक्य थे।

अपने कार्य के बारे में उन्होंने कहा ”यहां किसी विश्वास की कोई मांग या अपेक्षा नहीं है, यहां अनुयायी नहीं है, पंथ संप्रदाय नहीं है, व किसी भी दिशा में उन्मुख करने के लिए किसी तरह का फुसलाना प्रेरित करना नहीं है, और इसलिए हम एक ही तल पर, एक ही आधार पर और एक ही स्तर पर मिल पाते हैं, क्योंकि तभी हम सब एक साथ मिलकर मानव जीवन के अद्भुत घटनाक्रम का अवलोकन कर सकते हैं।”

जे कृष्णमूर्ति ने स्वयं तथा उनकी शिक्षाओं को महिमा मंडित होने से बचाने और उनकी शिक्षाओं की व्याख्या की जाकर विकृत होने से बचाने के लिए लिए अमरीका, भारत, इंग्लैंड, कनाडा और स्पेन में फाउण्डेशन स्थापित किये।
भारत, इंग्लैण्ड और अमरीका में विद्यालय भी स्थापित किये जिनके बारे में उनका दृष्टिबोध था कि शिक्षा में केवल शास्त्रीय बौद्धिक कौशल ही नहीं वरन मन-मस्तिष्क को समझने पर भी जोर दिया जाना चाहिये। जीवन यापन और तकनीकी कुशलता के अतिरिक्त जीने की कला कुशलता भी सिखाई जानी चाहिए।

17 फरवरी 1986 को जे कृष्‍णमूर्ति‍ जी का देहावसान हुआ।
जे कृष्णमूर्ति के मौलिक दर्शन ने पारंपरिक, गैरपरंपरावादी विचारकों, दार्शनिकों, शीर्ष शासन-संस्थाप्रमुखों, भौतिक और मनोवैज्ञानियों और सभी धर्म, सत्य और यथार्थपरक जीवन में प्रवृत्त सुधिजनों को आर्कर्षित किया और उनकी स्पष्ट दृष्टि से सभी आलोकित हुए हैं।

उनके साहित्य में सार्वजनिक वार्ताएं, प्रश्नोत्तर, परिचर्चाएं, साक्षात्कार, परस्पर संवाद, डायरी और उनका खुद का लेखन शामिल है जो कि अब तक 75 से अधिक पुस्तकों और 700 से अधिक ऑडियो और 1200 से अधिक वीडियो कैसेट्स सीडी के रूप में उपलब्ध है। उनका मूल साहित्य अंग्रेजी भाषा में है, जिसका कई मुख्य प्रचलित भाषाओं में अनुवाद किया गया है। वार्ताएं, प्रश्नोत्तर, परिचर्चाएं, साक्षात्कार, परस्पर संवाद, प्रवचनों के ऑडियो और वीडियो टेप भी उपलब्ध हैं।

उनसे जुड़ी प्रमुख वेबसाईट्स पते निम्नलिखित हैं:

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