20 Aug 2009
क्या आप बिना किसी मजबूरी के स्वयं को भूल सकते हैं?
क्या यह मन के लिए संभव है कि वह प्रेक्षक, दृष्टा, अनुभवकर्ता से बिना किसी उद्देश्य के मुक्त हो जाए। निश्चित ही , अगर कोई उद्देश्य होगा तो यह उद्देश्य ही अनुभवकर्ता और मैं का निचोड़ होगा। क्या आप बिना किसी मजबूरी के स्वयं को भूल सकते हैं? बिना किसी ईनाम या दंड के भय के स्वयं को भूल सकते हैं? केवल अपने को भूलना ही है, मुझे नहीं पता कि आपने कभी ऐसी कोशिश की हो। क्या कभी आपके सामने यह विचार उठा, क्या कभी आपके मन में यह बात आई। और कभी ऐसा खयाल आया भी हो, तो आप तुरन्त कहते हैं ”अगर मैं स्वयं को भूल जाऊं तो मैं इस दुनियां में केसे जिंऊगा, जहाँ हर कोई मुझे एक तरफ धकेलता हुआ आगे बढ़ना चाह रहा है।“ इस प्रश्न का सही उत्तर प्राप्त करने के लिए आपको सर्वप्रथम यह जानना होगा कि आप बिना किसी ‘मैं’ के कैसे जी सकते हैं। बिना किसी अनुभवकर्ता, बिना किसी आत्मकेन्द्रित गतिविधि के कैसे जी सकते हैं? यही मैं पन, अनुभवकर्ता होना, आत्मकेन्द्रित गतिविधियाँ दुख की सृजक हैं, भ्रम और दुर्गति का मूल हैं। तो क्या यह संभव है इस संसार में जीते हुए इसके सभी जटिल सम्बंधों, घोर दुख में जीते हुए कोई पूरी तरह उस चीज से बाहर हो जाए जो ‘मैं’ को बनाती है।
31 Jul 2009
जब केवल निपट प्रेक्षण होता है तभी जागरूकता होती है।
आप जानते हैं एकाग्रता एक प्रयास है, किसी विशेष पृष्ठ, एक विचारधारा, छवि, चिन्ह आदि पर ध्यान केन्द्रित करना आदि। एकाग्रता अपवर्जना की एक प्रक्रिया है। एकाग्रता किसी चीज को वर्जित कर अन्य पर ध्यान केन्द्रित करना है। आप किसी छात्र से कहते हैं खिड़की के बाहर मत देखो, अपनी किताब पर ध्यान दो। तो वो बाहर देखना चाहता है, पर किताब पर ध्यान केन्द्रित करने के लिए स्वयं को बाध्य करता है तो यहाँ एक द्वंद्व है। एकाग्रता का यह अविरत प्रयास, एक अपवर्जन (किसी चीज को वर्जित कर किसी अन्य में प्रवृत्त होना) प्रक्रिया है जिसका जागरूकता से कोई लेना देना नहीं है।
जब कोई प्रेक्षक होता है देखता है, यह आप भी कर सकते हैं, कोई भी कर सकता है। जब केवल चुनाव रहित प्रेक्षण होता है तो ही जागरूकता होती है। चुनाव सहित देखना, पूर्वाग्रह सहित देखना भ्रमित रहना और अ‘जागरूकता है।
जब कोई प्रेक्षक होता है देखता है, यह आप भी कर सकते हैं, कोई भी कर सकता है। जब केवल चुनाव रहित प्रेक्षण होता है तो ही जागरूकता होती है। चुनाव सहित देखना, पूर्वाग्रह सहित देखना भ्रमित रहना और अ‘जागरूकता है।
आप उसे ईष्र्या, क्रोध लोभ कहते हैं।
आप खुद पर ही यह प्रयोग कर के देखें। यह बहुत ही सामान्य और आसान है। अगली बार जब भी आप क्रोधित हों, ईष्र्या, लोभ, हिंसा या जो कुछ भी भाव हो....से भर जाएं स्वयं को देखें। उस दशा में ‘आप स्वयं’ नहीं होते। वह केवल निपट अस्तित्व की दशा होती है। उसके कुछ क्षणों बाद, कुछ सेकण्ड्स बाद आप अस्तित्व में आते हैं, आप उस दशा.. को नाम एक देते हैं या क्रोध, ईष्र्या, लोभ आदि कहते हैं। तो आप देखिये... आप तुरंत एक दृष्टा और एक दृश्य, एक अनुभव और एक अनुभोक्ता की रचना कर लेते हैं। जब अनुभोक्ता और अनुभव होता है तो अनुभोक्ता (अनुभव करने वाला) अनुभव में बदलाव की कोशिश करता है। तो इन सब बातों को याद रखें इस प्रकार हम खुद, अपने और अनुभव में अलगाव बनाये रखते हैं। यदि आप भावों का नामकरण नहीं करते हैं - जिसका मतलब है कि जब आप परिणाम की खोज में नहीं हैं, जब आप आलोचना नहीं कर रहे हैं, जब आप केवल चुपचाप अहसास को देख भर रहे हैं - तब आप पाएंगे इस अहसास की दशा में इस अनुभव की दशा में अनुभोक्ता और अनुभव कुछ नहीं होता। क्योंकि अनुभव और अनुभव करने वाला एक ही हैं। केवल अनुभविता ही है।
इस बीच कोई भी अंतराल नहीं... दूरी नहीं - आरंभ और अंत एक ही हैं
अंर्तवलोकन, खुद को देखना आत्मोन्नति (खुद को सुधारने की कोशिश) का एक प्रकार है। यह आत्मप्रसार कभी भी सत्य तक नहीं पहुँचाता क्योंकि यह स्वयं को आबद्ध करने वाली एक प्रक्रिया है। जबकि जागरूकता वह दशा है जहां सत्य अस्तित्व में आता है, ‘जो है’ वह सत्य रूप में। रोजमर्रा के जीवन के सामान्य सच। जब हम रोजमर्रा के सामान्य सत्यों को समझने लगते हैं तभी हम उनके पार जा सकते हैं। आपको कहीं जाना है तो आप ‘जहाँ हैं’ वही से शुरूआत करनी होगी। लेकिन हम में से बहुत से लोग छलांग लगाना चाहते हैं। जो पास है, निकट ही है उसको बिना जाने समझे, हम दूर की बातें जानना समझना चाहते हैं। जब हम जो पास ही है निपट निकट ही है उसे समझ लेते हैं, तब हमें पता चलता है कि पास और दूर कोई अंतराल है ही नहीं। उनमें कोई अंतरात या दूरी है ही नहीं शुरूआत और अंत एक ही हैं।
क्या कोशिश का मतलब बदलाव लाने के लिए किया गया वह संघर्ष नहीं है जो, ‘जो है’ उसे ‘जो नहीं है‘ या, जो होना चाहिए या जो होगा, उसमें बदलने के लिए। हम ‘जो है’, उसमें परिवर्तन अथवा बदलाव के लिए निरंतर पलायन करते/भागते रहते हैं। जब हम उस वास्तविकता से ‘जो है’, अ‘जागरूक होते हैं केवल उसी समय बदलाव की कोशिश पैदा होती है। तो कोशिश अ‘जागरूकता है। ‘जो है’ उसके अभिप्राय, उसके महत्व को जानना समझना जागरूकता है, और इस अभिप्राय/महत्व को पूर्णरूपेण स्वीकारना स्वतंत्रता लाता है। तो जागरूकता निष्प्रयास है। जागरूकता, ‘जो है’ उसे वैसा का वैसा बिना किसी विक्षेपण के देखना है। जहाँ भी कोशिश की जाती है प्रयास किया जाता है, वहाँ विक्षेपण होता है।
20 Jul 2009
सजगता द्वारा मैं खुद को देखना शुरू करता हूं, जैसा कि वास्तविकता में मैं हूं, अपने स्वयं का पूर्णत्व। प्रत्येक क्षण की गति को देखते हुए उसके सभी विचारों, उसके अहसासों, उसकी प्रतिक्रियाओं, अचेतन औ चेतन भी मन .... निरंतर अपनी गतिविधियों का अर्थ महत्व खोजता रहता हैं। यदि मेरी समझ मात्र कुछ चीजों का जोड़ है, तो यह जोड़ एक शर्त बन जाता है जो मेरी आगे की समझ को रोकती है। तो क्या मस्तिष्क स्वयं को बिना कुछ जोड़े घटाये जैसा है वैसा का वैसा ही देख सकता है?
एक स्पष्टता जो किसी कारण विशेष से नहीं होती - जब मन और शरीर की प्रत्येक क्रिया के बारे में अंर्तमुखी सजगता रहती है, जब आप अपने विचारों, खुले और दबे ढंके हुए सभी अहसासों, चेतन और अवचेतन के प्रति सजगता रखते हैं तब इस सजगता से एक स्पष्टता आती है जो बिना किसी कारण विशेष के होती है। जिसे बुद्धि के साथ एक ही श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। इस स्पष्टता के बिना आप जो करें, आप स्वर्ग, सारी धरती और कई अतल गहराईया छान लें लेकिन आप बिलकुल ही नहीं जान सकते कि सच क्या है?
एक स्पष्टता जो किसी कारण विशेष से नहीं होती - जब मन और शरीर की प्रत्येक क्रिया के बारे में अंर्तमुखी सजगता रहती है, जब आप अपने विचारों, खुले और दबे ढंके हुए सभी अहसासों, चेतन और अवचेतन के प्रति सजगता रखते हैं तब इस सजगता से एक स्पष्टता आती है जो बिना किसी कारण विशेष के होती है। जिसे बुद्धि के साथ एक ही श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। इस स्पष्टता के बिना आप जो करें, आप स्वर्ग, सारी धरती और कई अतल गहराईया छान लें लेकिन आप बिलकुल ही नहीं जान सकते कि सच क्या है?
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