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20 Apr 2010

समझ अस्तित्व में कैसे आती है?


मुझे नहीं मालूम, अगर आपने कभी इस बात पर गौर किया है या नहीं कि,किसी समस्या को जितना ज्यादा आप समझने की कोशिश करते हैं, जूझते हैं बूझते हैं... समस्या को समझने में आपको उतनी ही मुश्किल आयेगी। लेकिन जिस पल आप संघर्ष करना बंद करते हैं और उस समस्या को अपनी सारी कहानी सुनाने का मौका देते हैं, अपनी सारी हकीकत बयान करने देते हैं - तब बात समझ में आ जाती है। इससे हम यह स्पष्ट ही जान सकते हैं कि किसी बात को समझने के लिए आपके मन का चुप होना बहुत जरूरी है। मन का बिना हां ना किये, निष्क्रिय रूप से जागरूक, सजग रहना जरूरी है इस स्थिति में ही हममे जीवन की कई समस्याओं की समझ आती है।
लंदन 23 अक्टूबर 1949

8 Feb 2010

सृजन के द्वार खोलना


सच्चे शाब्दिक मायनों में सीखना केवल जागरूकता अवधानपूर्ण अवस्था में ही संभव है, जिसमें आन्तरिक या बाहृय विवशता न हो। उपयुक्त चिंतन-मनन केवल तब हो सकता है, जब मन परंपरा और स्मृति की दासता में न हो। अवधानपूर्ण होना ही मन में शांति को आंमत्रित करता है, जो कि सृजन का द्वार है। यही वजह है कि अवधान या जागरूकता सर्वोच्च रूप से महत्वपूर्ण हैं। मन की उर्वरता के लिए क्रियात्मक स्तर पर ज्ञान की आवश्यकता होती है, न कि ज्ञान पर ही रूक जाने की। हमारा सरोकार छात्र के मानव के रूप में सम्पूर्ण विकास पर होना चाहिए ना कि गणित, या वैज्ञानिक या संगीत जैसे किसी एक क्षेत्र में उसकी क्षमता बढ़ाने से। हमारा सरोकार छात्र के सम्पूर्ण मानवीय विकास से होना चाहिए। अवधान की अवस्था किस प्रकार उपलब्ध की जा सकती है? यह अनुनय-विनय-मनाने, तुलना करने, पुरस्कार अथवा दंड जैसे दबाव के तरीकों से नहीं उपजायी जा सकती। भय का निर्मूलन अवधानपूर्ण होने की शुरूआत है। जब तक कुछ होने, कुछ हो जाने कि जिद या अपेक्षा जो कि सफलता का पीछा करने जैसा है, जब तक हैं - ....अपनी सम्पूर्ण निराशा, अवसाद और कुटिल विसंगतियों के साथ... भय बना रहता है। आप ध्यान केन्द्रित करना सिखा सकते हैं, लेकिन अवधानपूर्ण होना नहीं सिखा सकते वैसे ही जैसे कि भय से स्वाधीन रहना नहीं सिखा सकते। लेकिन हम शुरूआत कर सकते हैं - भय को पैदा करने वाले कारणों को खोजकर.... उन कारणों को समझना भय के निर्मूलन में सहायक हो सकता है। तो जब छात्र के आसपास अच्छाई का वातावरण बनता है, जब वह अपने आपको सुरक्षित और सहज महसूसत करता है तो जागरूकता या अवधान तुरन्त ही उदित हो जाता है। जागरूकता या अवधान सप्रेम निष्काम कर्म की तरह उसमें चले आते हैं। प्रेम तुलना नहीं है इसलिए कुछ होने की ईष्र्या और दमन भी अपने आप ही समाप्त हो जाते हैं।

Opening the door to creation

Learning in the true sense of the word is possible only in that state of attention, in which there is no outer or inner compulsion. Right thinking can come about only when the mind is not enslaved by tradition and memory. It is attention that allows silence to come upon the mind, which is the opening of the door to creation. That is why attention is of the highest importance. Knowledge is necessary at the functional level as a means of cultivating the mind, and not as an end in itself. We are concerned, not with the development of just one capacity, such as that of a mathematician, or a scientist, or a musician, but with the total development of the student as a human being.
How is the state of attention to be brought about? It cannot be cultivated through persuasion, comparison, reward or punishment, all of which are forms of coercion. The elimination of fear is the beginning of attention. Fear must exist as long as there is an urge to be or to become, which is the pursuit of success, with all its frustrations and tortuous contradictions. You can teach concentration, but attention cannot be taught just as you cannot possibly teach freedom from fear; but we can begin to discover the causes that produce fear, and in understanding these causes there is the elimination of fear. So attention arises spontaneously when around the student there is an atmosphere of well-being, when he has the feeling of being secure, of being at ease, and is aware of the disinterested action that comes with love. Love does not compare, and so the envy and torture of `becoming' cease.
J. Krishnamurti Life Ahead Saanen 4th Public Dialogue 3rd August 1974. 

13 Jan 2010

वास्‍तव में जागरूकता है क्‍या ?



प्रश्न: आपने हमें बताया कि अपने दैनिक जीवन में गतिविधियों कार्यव्यवहार का अवलोकन करें लेकिन वह क्या या कौन सा अस्तित्व है जो यह तय करेगा कि किसका अवलोकन करना है और कब? कौन तय करेगा कि उसे अवलोकन करना चाहिये?
कृष्णमूर्ति: क्‍या आपने तय किया है कि अवलोकन करना है? या आप केवल अवलोकन कर रहे हैं? क्या आपने यह फैसला लिया, तय किया है और कहा है कि ”मैं अवलोकन करने और सीखने जा रहा हूँ?“ तब वहां प्रश्न हो सकता है कि कौन तय कर रहा है? तब वहां पर कहा ये जा रहा है कि ‘मैं जरूर करूंगा?’ और जब वह असफल रहता है, तब वह अपने आपको दंडात्मक भाषा में बार-बार कहता है -मैं करूंगा ही, मुझे करना ही है, तब वहां पर संघर्ष होता है तो मन-मस्तिष्क की वह अवस्था जब ‘‘अवलोकन करना’’ फैसला लिया जाकर, तय किया जाता है... वह कतई, कहीं से भी अवलोकन नहीं है। आप सड़क पर चले जा रहें है और आपके बगल से गुजरा आपने उसे देखा और और खुद से कहा - कैसा गंदा है वह, कैसी बदबू मार रहा है, मैं कामना करता हूं कि वह ऐसा और वैसा ना हो। जब आप अपने बगल से गुजरने वाले पर अपनी प्रतिक्रियाओं के प्रति जागरूक रहते हैं, जब आप इस बात के प्रति जागरूक रहते हैं कि आप कोई फैसला दे रहें हैं, आलोचना कर रहें या किसी चीज को न्यायोचित ठहराने की कोशिश कर रहें हैं - तब आप अवलोकन कर रहे हैं। तब आप यह नहीं कहते कि मुझे फैसला नहीं करना है, मुझे न्यायोचित नहीं ठहराना है। जब कोई आपकी प्रतिक्रियाओं के प्रति जागरूक होता है तब किसी तरह का निर्णय नहीं होता। आपने देखा होगा किसी ने कल आपकी बेइज्जती की... तुरन्त आपकी मांसपेशियां फड़कने लगती हैं, आप असहज और गुस्सा हो सकते हैं, आप उसे नापसंद करना शुरू कर देते हैं; तो उस नापसंदगी के प्रति जागरूक रहना है, उन सारी प्रतिक्रियाओं के प्रति जागरूक रहें, यह फैसला ना करें कि आपको अवलोकन करना है। अवलोकन करें, उस अवलोकन में कोई भी अवलोकनकर्ता नहीं होता, ना ही ‘अवलोक्य’ यानि ‘देखने वाला‘ और ‘देखा जा रहा’ अलग नहीं होते, तब केवल अवलोकन मात्र ही होता है। अवलोकनकर्ता तब पैदा होता है, जब आप अवलोकन में हेर-फेर या जोड़ना घटाना शुरू करते हैं। देखे गये को इकट्ठा कर उस पर नियंत्रण या कब्जा करने की कोशिश करते हैं। जब आप कहते हैं, वह मेरा मित्र है क्योंकि वह मुझे प्रसन्न करता है या वह मेरा मित्र नहीं है क्योंकि उसने मेरे बारे में बुरा गंदा कहा, या आपके बारे में कुछ सच ही कहा जो आप पसंद नहीं करते। तो अवलोकन को जमा, इकट्ठा या संग्रह करने वाला उसमें हेर फेर की गुंजाइश रखने वाला ही अवलोकनकर्ता है। जब आप बिना संग्रह करने या बिना हेर-फेर की इच्छा के अवलोकन करते हैं, तब कोई भी फैसला या निर्णय नहीं करते। आप सारा समय यही करते हैं इस अवलोकन में निसर्गतः प्राकृतिक रूप से विशेष निश्चित निर्णय प्राकृतिक परिणाम के रूप में आतें हैं पर यह वह निर्णय नहीं होते जो अवलोकनकर्ता, अवलोक्य या अवलोकन को इकट्ठा, जमा या संग्रह कर उन पर नियंत्रण या कब्जा कर, या उनमें हेर-फेर कर करता है।

Q:You tell us to observe our actions in daily life but what is the entity that decides what to observe and when? Who decides if one should observe?
Krishnamurti: 
Do you decide to observe? Or do you merely observe? Do you decide and say, `I am going to observe and learn'? For then there is the question: `Who is deciding?' Is it will that says, `I must'? And when it fails, it chastises itself further and says, `I must, must, must; in that there is conflict; therefore the state of mind that has decided to observe is not observation at all. You are walking down the road, somebody passes you by, you observe and you may say to yourself, `How ugly he is; how he smells; I wish he would not do this or that'. You are aware of your responses to that passer-by, you are aware that you are judging, condemning or justifying; you are observing. You do not say, `I must not judge, I must not justify'. In being aware of your responses, there is no decision at all. You see somebody who insulted you yesterday. Immediately all your hackles are up, you become nervous or anxious, you begin to dislike; be aware of your dislike, be aware of all that, do not `decide' to be aware. Observe, and in that observation there is neither the `observer' nor the `observed' - there is only observation taking place. The `observer' exists only when you accumulate in the observation; when you say, `He is my friend because he has flattered me', or, `He is not my friend, because he has said something ugly about me, or something true which I do not like,. That is accumulation through observation and that accumulation is the observer. When you observe without accumulation, then there is no judgement. You can do this all the time; in that observation naturally certain definite decisions are natural results, not decisions made by the observer who has accumulated.

28 Dec 2009

क्या मैं स्वयं ही जाग्रत हो सकता हूँ ?



वो चाहे खुशगवार हों या पीड़ाजनक, अपने आपको जागृत रखने के लिए हम अनुभवों पर निर्भर रहते हैं; किसी भी प्रकार की चुनौती हो हम अपने आपको जागा हुआ रखना चाहते हैं। जब कोई यह सच जान जाता है कि चुनौतियों और अनुभवों पर निर्भरता, दिमाग को केवल और ज्यादा कुंद या जड़ बनाती है और यह निर्भरता हमें जागे रहने नहीं रहने देती..... जब कोई यह समझ जाता है कि हमने हजारों युद्ध लड़ें हैं और एक बात भी नहीं सीखी कि हम अपने पड़ोसी को कल किसी क्षणिक सी उत्तेजना पर कत्ल कर सकते हैं... तब कोई कह सकता है कि जागे जागृत रहने के लिए यह अनुभव और चुनौतियों पर निर्भरता हम क्यों चाहते हैं? और क्या यह संभव है कि बिना किसी चुनौती के हम होशपूर्ण-जागृत-जागे रह सकें? यह ही मुख्य-असली प्रश्न है। हम चुनौतियों, अनुभवों पर यह सोच कर निर्भर रहते हैं कि ये हमें रोमांच, ज्यादा जिन्दापन, और ज्यादा त्वरितता देंगे, इनसे हमारा दिमाग और तेज होगा, पर इनसे ऐसा नहीं होता। तो यदि संभव हो तो मैं अपने आप से कहूं सम्पूर्ण रूप से जागृत-सचेत-होशपूर्ण के लिए.... आंशिक या टुकड़ों में नहीं या अपने अस्तित्व के कुछ बिन्दुओं पर ही नहीं... पर पूरी तरह जागृति, क्या बिना किसी चुनौती के, बिना किसी अनुभव के द्वारा। इसका मतलब ये भी है कि क्या मैं खुद ही प्रबुद्ध हो सकता हूँ, खुद को ही जगाये रह सकता हूँ बिना किसी बाहरी प्रकाश पर निर्भर हुए? इसका मतलब यह नहीं है कि यदि मैं किसी संवेदना उत्तेजना पर निर्भर नहीं रहकर, निरर्थक हो रहूंगा। क्या मैं कोई ऐसी रोशनी हो सकता हूँ जो बाह्य-उन्मुखी ना हो? यह सब जानने समझने के लिए हमें अपने में ही बहुत गहरे जाना होगा, मुझे खुद को ही पूरी तरह जानना होगा, सम्पूर्णतः.... अपने भीतर का एक-एक कोना मेरा जाना समझा होना चाहिये, कोई भी ऐसा कोना नहीं होना चाहिए जो दबा, ढंका, छिपा या रहस्यपूर्ण हो। सब कुछ खुला होना चाहिए। हमें अपने स्व, अपनत्व के, हमारेपन के सम्पूर्ण क्षेत्र के प्रति जागृत होना चाहिये, जो कि हमारी वैयक्तिता और हमारी सामाजिकता की चेतना है। यह जागरण केवल तब हो सकता है जब हमारा मन, वैयक्तिक और सामाजिक चेतना की परिधि के पार जाये तभी कोई संभावना है कि कोई अस्तित्व स्वतः प्रबुद्ध हो सके और बाह्य-उन्मुखी न हो।

20 Jul 2009

यदि आप बाहरी चीजों के प्रति होशवान हैं

कृपया इसे ध्यानपूर्वक सुनें। हम में से बहुत से लोग सोचते हैं कि सजगता, ध्यान कुछ रहस्यमयी चीज है जिसका अभ्यास करना चाहिए और जिसके लिए बार-बार हम इकट्ठे होते और, बातें करते हैं। लेकिन इस तरीके से कभी होशवान नहीं हुआ जाता। लेकिन यदि आप बाहरी चीजों के प्रति होशवान हैं - दूर तक चली गई सड़क के सर्पीले घुमावदार लहराव, वृक्ष का आकार, किसी के पहनावे का रंग, नीले आसमान की पृष्ठ भूमि में किसी पर्वत का रेखाचित्र, किसी फूल का सौन्दर्य, किसी पास से गुजरते व्यक्ति के चेहरे पर दुःखदर्द के चिन्ह, किसी का हमारी परवाह न करना, दूसरों की ईष्र्या, पृथ्वी की सुंदरता..... तब इन सब बाहरी चीजों को बिना किसी आलोचना के, बिना पसंद नापसंद किये, देखना...... इससे आप आंतरिक अंर्तमुखी सजगता की लहर पर भी सवार हो जाते हैं। तब आप अपनी ही प्रतिक्रियाओं, अपनी ही क्षुद्रता, अपने ईष्र्यालुपन के प्रति भी होशवान हो सकते हैं । बाहरी सजगता से आप आंतरिक सजगता की ओर आते हैं। लेकिन यदि आप बाह्य बाहरी के प्रति सजग नहीं होते हैं तो आपका अंातरिक अंर्तमुखी सजगता पर आना असंभवप्राय है।