18 Mar 2011

सम्‍बंधों की हकीकत


हम वही हैं हम जिन चीजों पर आधिपत्य जमाये बैठे हैं

रिश्तों को समझने के लिए आवश्यक रूप से एक निष्क्रिय-अप्रतिरोधात्मक-धैर्य होना चाहिए, जो रिश्तों को नष्ट ना करता हो। इसके विपरीत यह धैर्य रिश्तों को और जीवन्त, और सार्थक बनाता है। तब, उस रिश्ते में वास्तविक लगाव की संभावना होती है; उसमें उष्णता होती है, निकटता का अहसास होता है, जो कि केवल निरी भावुकता और रोमांच नहीं होता। यदि हम ऐसे रिश्ते तक पहुंच सकते हैं, या सारी चीजों...सारी बातों, सारे अस्तित्व के साथ हम ऐसे ही रिश्ते में हैं, तो हमारी समस्या सहज ही हल हो जायेगी.... चाहे वह सम्पत्ति की समस्या हो, चाहे वह किसी आधिपत्य की समस्या हो क्योंकि हम वही हैं हम जिन जिस पर आधिपत्य चाहते हैं। वह व्यक्ति जो धन पर आधिपत्य चाहता है, उसका जीवन धन ही है। जो संपत्ति, या जमीन जायदाद, फर्नीचर आदि पर कब्जे करना चाहता है उसका जीवन किसी संपत्ति की तरह ही है। ऐसा ही संकल्पनाओं विचारों के साथ भी है, या लोगो कें साथ भी... और जब भी जहां पर आधिपत्यशाली होना चाहा जाता है.. वहां रिश्ता नहीं होता। लेकिन हम में से बहुत से लोग आधिपत्य चाहते हैं क्योंकि हमें तभी लगता है कि हम कुछ हैं, यदि हमारा किसी चीज पर कब्जा ही ना हो तो लगता ही नहीं कि हम कुछ हैं।

अगर हमारे आधिपत्य में कुछ ना हो... यदि हम अपने जीवन को फर्नीचर, संगीत, ज्ञान और यह और वह से नहीं भर लेते  तो हम खुद को खोखले घोंघे सा अनुभव करते हैं। यह खोखलापन बहुत ही शोर पैदा करता है, इस शोर को ही हम जीना कहते हैं, और यही है जिससे हम संतुष्ट भी रहते हैं। अगर इस सब में किसी तरह का व्यवधान पड़ता है, यह चक्र टूटता है तब वहां पर हम दुख होता है.. क्योंकि तब वहां पर अचानक ही आप... अपनी नग्नता को देख पाते हैं.. वह देख पाते हैं जो कि आप असलीयत में..हकीकत में हैं - बिना किसी मतलब का, एक खोखला घोंघापन। 

तो रिश्तों के इस सारे बुनाव के प्रति होशवान होना ही...धैर्यपूर्ण या विधेयात्मक कर्म है, इसी कर्म से वास्तविक संबंधों की संभावना बनती है। एक संभावना बनती है, रिश्तों की अतल गहराईयों की, सार्थकता की खोज की.. और इसकी भी कि प्रेम क्या है?

We Are That Which We Possess

To understand relationship, there must be a passive awareness, which does not destroy relationship. On the contrary, it makes relationship much more vital, much more significant. Then there is in that relationship a possibility of real affection; there is a warmth, a sense of nearness, which is not mere sentiment or sensation. And if we can so approach or be in that relationship to everything, then our problems will be easily solved;the problems of property, the problems of possession. Because, we are that which we possess. The man who possesses money is the money. The man who identifies himself with property is the property, or the house, or the furniture. Similarly with ideas, or with people; and when there is possessiveness, there is no relationship. But most of us possess because we have nothing else, if we do not possess. We are empty shells if we do not possess, if we do not fill our life with furniture, with music, with knowledge, with this or that. And that shell makes a lot of noise, and that noise we call living; and with that we are satisfied. And when there is a disruption, a breaking away of that, then there is sorrow because then you suddenly discover yourself as you are:an empty shell, without much meaning. So, to be aware of the whole content of relationship is action; and from that action there is a possibility of true relationship, a possibility of discovering its great depth, its great significance, and of knowing what love is.
 
J. Krishnamurti, The Book of Life

24 Feb 2011

विकर्षित अवलोकन


जब आप किसी चीज को नाम देते हैं, तो आपके नामकरण की यह क्रिया, यह शब्द आपको अवलोकन से विकर्षित करता है, भटकाता है, आपके अवलोकन को दोषपूर्ण बनाता है। जब आप शब्द ‘बरगद’ का प्रयोग करते हैं, तो आप किसी वृक्ष को उस शब्द के माध्यम से देखते हैं, ना कि उस वृक्ष की वास्तविकता को। आप उस वृक्ष को उस छवि के माध्यम से देखते हैं जो आपने उस वृक्ष के बारे में बनाई हुई है,तो यह छवि, दृष्टि को बाधित करती है। इसी तरह यदि आप अपने को ही देखने की कोशिश करें, बिना अपनी कोई छवि बनाये, तो यह बड़ा ही अजीब और गहरे में विक्षुब्ध करने वाला होता है। जब आप गुस्से में, जब ईष्र्या में हों, तो इन अहसासों को बिना किसी अच्छी या बुरी श्रेणी में रखे, बिना किसी अहसास का नामकरण किये देेखें। क्योंकि जब आप इस अहसास को किसी अच्छी या बुरी श्रेणी में डालते हैं, या इसे नाम देते हैं तो आप आप वर्तमान के किसी क्षण को अतीत की स्मृतियों के माध्यम से देखते हैं। मुझे नहीं पता आपको यह सब समझ में आ रहा है या नहीं। कहने का तात्पर्य यह है कि किसी अहसास के वर्तमान में सामने आने पर, आप यथार्थतः किसी अहसास को ”जैसा वो है वैसा ना देखकर“, जब उसी तरह का कोई अन्य अहसास अतीत में पैदा हुआ था.... उस अहसास के बारे में अपनी इकट्ठा की गई स्मृतियों... उस अहसास के बारे में जो आपने जो कभी पढ़ा, सुना, लिखा, देखा है, उनके माध्यम से देखते हैं। साक्षात अवलोकन तब होता है, जब अवलोकन अतीत के माध्यम से नहीं हो रहा। इसी क्षण को इसी क्षण में देखा जा रहा हो।

Distraction from observation

When you name a thing, the very word acts as a distraction from observation. When you use the word 'cypress', you are looking at that tree through the word; so you are not actually looking at the tree. You are looking at that tree through the image that you have built up, and so the image prevents you from looking. In the same way, if you try to look at yourself without the image this is quite strange and deeply disturbing. To look when you are angry, when you are jealous, to look at that feeling without naming it, without putting it into a category. Because when you put it into a category or name it, you are looking at that present state of feeling through the past memory. I don't know if you are following this. So you are actually not looking at the feeling, but you are looking through the memory which has been accumulated when other similar types of feeling arose.

Talks with American Students, Chapter 4 1st Talk at Morcelo, Puerto Rico 14th September, 1968

16 Feb 2011

हम सच का सामना क्यों नहीं करना चाहते?


क्यों कल्पनाएं और सिद्धांत हमारे दिमाग में जड़ें बना लेते हैं? क्यों हमारे लिए तथ्य सर्वाधिक महत्वपूर्ण नहीं हो जाते बजाय संकल्पनाओं के, सिद्धांतों के? क्यों संकल्पनात्मक/सैद्धांतिक पक्ष तथ्यों की अपेक्षा इतना महत्वपूर्ण हो जाता है। क्या हम तथ्य को नहीं समझ पाते, या हम में इसकी सामथ्र्य ही नहीं है, या, हम तथ्य का , सच का सामना करने से डरते हैं? इसलिए आईडियाज, विचार, संकल्पनाएं, अनुमान तथ्य से पलायन का एक जरिया बन जाते हैं। आप लाख भागें, आप सभी तरह की ऊटपटांग बातें कर लें पर तथ्य यह है कि हमीं लोगों में से कई महत्वाकांक्षी है, कई कामवासना में धंसे हुए हैं, तथ्य यह है कि हमीं में से कई क्रोधी हैं और इसी तरह के दर्जनों तथ्य। आप इन सब का दमन कर सकते हैं, आप इनकी दिशा बदल इनको चुप करा देते हैं, जो दमन का ही एक अन्य प्रकार है, आप इन पर नियंत्रण भी पा लेते हैं, लेकिन ये सब दमन, नियंत्रित करना, अनुशासन में आ जाना संकल्पनाओं द्वारा होता है। क्या सिद्धांत संकल्पनाएं, मत, वाद हमारी ऊर्जा को नष्ट नहीं करते? क्या विचार हमारे मन मस्तिष्क को कुंद नहीं बनाते। आप अनुमान लगाने, दूसरों को उद्धृत करने में कुशल हो सकते हैं लेकिन एक जड़ मन ही दूसरों को उद्धृत करता है ...
यदि आप विपरीत का द्वंद्व एकबारगी ही खत्म कर दें और तथ्य के साथ जीने लगें तो आप अपने अन्दर उस ऊर्जा को मुक्त कर देंगे जो तथ्य का बखूबी सामना कर लेती है। हममें में से बहुत से लोगों के लिए विरोधाभासों का ऐसी विशेष परिधि होती है जो हमारे मनमस्तिष्क को जकड़े रखती है। हम करना कुछ चाहते हैं, और कर कुछ और ही रहे होते हैं। लेकिन यदि हम उस तथ्य का सामना करें जो हम करना चाहते हैं तो विरोधाभास नहीं रहेगा। इसलिए यदि मैं एकबार में ही विरोधाभास के संपूर्ण भाव को खत्म कर दूं तो मैं मन पूरी तरह उस तथ्य की समझ से वास्ता रखेगा ”जो मैं हूं“, जो तथ्य है।

12 Feb 2011

विश्वास की झीनी चादर


आप ईश्वर में विश्वास करते हैं और दूसरा कोई नहीं करता, तो आपका ईश्वर में विश्वास करना और किसी अन्य का ईश्वर में विश्वास नहीं करना, आप लोगों को एक दूसरे से बांटता है। सारी दुनियां में विश्वास ही हिन्दुत्व, बौद्ध, ईसाईयत, मुस्लिम और अन्य धर्म सम्प्रदायों में संगठित हुवा, हुआ है और आदमी को आदमी से अलग कर रहा है, बांट रहा है। हम भ्रम में हैं और हम सोचते हैं कि विश्वास के द्वारा हम अपने भ्रम को दूर कर लेंगे लेकिन हमारा विश्वास ही भ्रम पर एक और परत बनकर चढ़ जाता है। लेकिन विश्वास भ्रम के तथ्य से पलायन मात्र है, यह हमें भ्रम के तथ्य का सामना करके, उसे समझने में मदद नहीं करता बल्कि हमें उसी भ्रम में ले आता है जिस में हम अभी हैं। भ्रम को समझने के लिए, विश्वास जरूरी नहीं है और विश्वास हमारे और हमारी समस्या के बीच एक झीनी चादर का काम करता है। तो धर्म.. जो कि संगठित विश्वास है, जो हम हैं, हमारे भ्रम के तथ्य से पलायन मात्र बन जाता है। वह आदमी जो भगवान पर विश्वास करता है, या जो भविष्य में भगवान पर विश्वास करने वाला है, या वो जो अन्य किसी तरह का किसी पर विश्वास रखता है, यह सब “जो वो है” उस तथ्य से पलायन करना मात्र है। क्या आप उन लोगों को नहीं जानते जो ईश्वर में विश्वास रखते हैं, पूजा करते हैं, विशेष तरह के मंत्रों और शब्दों का जप करते हैं और अपनी रोजाना की आम जिन्दगी में दूसरों पर प्रभुत्व जमाते हैं, अत्याचारी हैं, महत्वाकांक्षी हैं, धोखेबाज हैं, बेईमान हैं। क्या ऐसे लोग भगवान को पा सकेंगे? क्या ऐसे लोग वाकई में भगवान को तलाश रहे हैं? क्या भगवान शब्दों के दोहराव, जप और विश्वास से मिल जायेगा? लेकिन कुछ लोग ईश्वर में विश्वास करते हैं, वो भगवान की पूजा करते हैं, वो रोज मन्दिर जाते हैं, और वो.. वो सब करते हैं जो ”जो वो हैं“ उन्हें इस तथ्य से दूर ले जाता है। ऐसे कुछ लोग, आप सोचते हैं सम्माननीय हैं, क्योंकि खुद आप भी तो यही हैं ना।

27 Nov 2010

हमारा परम यथार्थ यही है।


कोई हमारी खुशामद करता है, हमें अपमानित या दुखी करता है या हमें चोट पहुंचाता है या प्यार जताता है तो इन सब बातों को हम संग्रह क्यों कर लेते हैं? इन अनुभवों को ढेर और इनकी प्रतिक्रियाओं के अलावा हम क्या हैं? हम कुछ भी नहीं हैं अगर हमारा कोई नाम ना हो, किसी से जुड़ाव ना हो, कोई विश्वास या मत ना हो। यह ना कुछ होने का भय ही हमें बाध्य करता है कि हम इन सब तरह के अनुभवों को इकट्ठा करें, संग्रह करें। और यह भय ही, चाहे वो जाने में हो या अनजाने में, यह भय ही है जो हमारी एकत्र करने... संग्रह करने की गतिविधियों के बाद हमें अन्दर ही अन्दर तोड़ने... विघटन और हमारे विनाश के कगार पर ले आता है।
यदि हम इस भय के सच के बारे में जान सकें, तो यह सत्य ही हमें इस भय से मुक्त करता है ना कि किसी भय से मुक्त होने के उद्देश्य से लिया गया कोई संकल्प। क्योंकि वाकई हम कुछ भी नहीं हैं। हमारा नाम और पद हो सकता है, हमारी संपत्ति और बैंक में खाता हो सकता है, हो सकता है आपके पास ताकत हो और आप प्रसिद्ध भी हों, लेकिन इन सब सुरक्षा उपायों के बावजूद हम कुछ नहीं हैं। आप इस नाकुछ होने, खालीपन से अनजान हो सकते हैं या आप सहज ही नहीं चाहते कि आप इस नाकुछपने को जाने लेकिन ये हमेशा यहीं.. आपके पास ही, अन्दर ही होता है..। आप होते ही नहीं, यही होता है, आप इससे बचने के लिए चाहे जो कर लें। आप इससे पलायन के लिए चाहे कितने ही कुटिल उपाय कर लें, कितनी ही वैयक्तिक या सामूहिक हिंसा कर लें, वैयक्तिक या सामूहिक पूजा-पाठ सत्संग कर लें, ज्ञान या मनोरंजन के द्वारा इससे बचें लेकिन जब भी आप सोयें या जागें- हमारा नाकुछपना हमेशा यहीं होता है। आप इस नाकुछ होने और इसके भय से केवल तभी संबंध बना सकते हैं जब आप, अपने इससे बचाव या पलायन के प्रति बिना पसंद या नापसंद के जागरूक रह सकें। 

आप इससे किसी अलग या वैयक्तिक शै की तरह नहीं जुड़े हैं। आप वो अवलोकनकर्ता नहीं हैं, जो इसे एक दूरी से इसे देख रहे हैं लेकिन आपके बिना, जो कि सोच रहा है, अवलोकन कर रहा है यह नहीं है। आप और यह नाकुछपना एक ही है। आप और यह नाकुछ होना एक संयुक्त घटना है दो अलग-अलग प्रक्रम नहीं हैं। यदि आप, जो कि सोचने वाले हैं, इससे डरे हुए हैं और इससे ऐसे व्यवहार करते हैं जैसे यह आपसे कुछ अलग या विपरीत है, तो आपके द्वारा इसके प्रति उठाया गया कोई भी कदम निश्चित ही.. अनिवार्यतः आपको भ्रम और उससे उपजे द्वंद्व और विपदाओं, संतापों में ले जायेगा।
जब यह पता चल जाता है कि इस नाकुछपने को को अनुभव करने वाले आप ही हैं तब वह भय जो कि तभी रहता है जब कि विचार करने वाला अपने विचार से अलग रहता है और इसलिए इससे कोई सम्बंध स्थापित करना चाहता है, यह भय पूरी तरह खो जाता है।  केवल तभी मन के लिए थिर या अचल हो पाना संभव होता है और इस शांति, निर्वेदपन में ही परमसत्य होता है।

26 Nov 2010

जे कृष्णमूर्ति जी की शिक्षाओं का निचोड़

जे कृष्णमूर्ति की शिक्षाओं का निचोड़ उनके सन 1929 में दिये गये वक्तव्य में है जिसमें उन्होंने कहा-

सच एक पथरहित भूमि है यानि सच ऐसा गंतव्य है जहां तक कि सुनिश्चित, बंधे बंधाये मार्ग से नहीं पहुंचा जा सकता। इंसान को यदि सच तक पहुंचना है तो वो ऐसा किसी संगठन, किसी पंथ, किसी परंपरा या रूढ़ि, संत-महात्मा-पंडे-पुजारी या रीति रिवाजों के अनुसरण से नहीं पहुंच सकता। ना ही किसी दार्शनिक ज्ञान या मनोवैज्ञानिक तकनीक से ही सच तक पहुंच संभव है। यदि किसी को सच का पता लगाना है तो उसे खुद को संबंधों के दर्पण में देखना होगा, अपने मन के तत्वों को समझना होगा, अवलोकन करना होगा ना कि बौद्धिक विश्लेषण या आत्मविश्लेषण, खयाली चीरफाड़ से यह संभव हो सकेगा। इंसान ने अपनी सुरक्षा की बाड़ के रूप में, अपनी ही धार्मिक, राजनीतिक, वैयक्तिक आदि कई छवियां बना रखी हैं। इंसान के व्यवहार में ये प्रतीकों, विचारों और विश्वासों के रूप में प्रकट होती हैं। इन गढ़ी हुई छवियों का बोझ - इंसान की सोच, उसके रिश्ते और उसकी रोजमर्रा की जिन्दगी पर हावी रहता है। एक दूसरे के बारे में गढ़ी हुई ये छवियां ही इंसानी समस्याओं का कारण हैं क्योंकि ये एक आदमी को दूसरे से अलग करती हैं, दो व्यक्तियों में अलगाव बनाती हैं। इंसान के मन में पहले से ही स्थापित धारणाओं के आधार पर जीवन के प्रति उसका नजरिया आकार लेता है। जो आदमी की चेतना में है वही उसका पूरा अस्तित्व होता है। किसी व्यक्ति का नाम, पंरपरा और परिवेश से ग्रहण बातें ही उसकी सतही सांस्कृतिक और निजता की पहचान बनते हैं। लेकिन आदमी का अनूठापन उसकी बाहरी छद्म पहचान में नहीं, अपितु अपनी चेतना की सभी तत्वों से पूरी तरह मुक्त हो रहने में निहित है, जो सारी मानवता के लिए एकसमान रूप से लागू होता है। इसलिए किसी भी व्यक्ति का सारी मानवता से अलग, किसी प्रकार का अस्तित्व नहीं है।

मुक्ति कोई प्रतिक्रिया नहीं है - ना ही कोई चुनाव या पसंद है। यह आदमी का ही दिखावा है कि - क्योंकि वह चुन रहा है, इसलिए वह मुक्त है। मुक्ति विशुद्ध अवलोकन है - बिना किसी दिशा या कारण के, बिना किसी सजा या दंड के भय या ईनाम के। मुक्ति का कोई निहितार्थ या उद्देश्य भी नहीं होता। ऐसा नहीं है कि जब किसी मनुष्य का पूरा विकास हो जाता है तो, मनुष्यत्व का चरम आ जाता है तब वो मुक्त हो जाता है पर उसके अस्तित्व के पहले कदम पर ही मुक्ति भी निहित है.. मुक्ति भी होती ही है। अवलोकन में/से ही कोई देखना शुरू करता है कि कहां कहां मुक्ति का अभाव है, कमी है, कहां मुक्ति नहीं है... वो बंध रहा है। मुक्ति हमारे दैनिक जीवन, उसकी गतिविधियों को बिना पसंद-नापसंद के या चयनरहित होकर देखने या अवधान.., ध्यान में रहने में पाई जाती है।

विचार समय है। विचार, अनुभव और ज्ञान से जन्मता है। अनुभव और ज्ञान समय और अतीत से अलग नहीं किये जा सकते। समय, इंसान का मनौवैज्ञानिक दुश्मन है। हमारे कर्म ज्ञान पर आधारित होते हैं, यानि समय पर आधारित होते हैं इसलिए इंसान हमेशा ही अतीत का दास या गुलाम होता है। विचार हमेशा सीमित होता है, उसकी सीमाएं होती हैं इसलिए हम अनवरत, नित्य ही द्वंद्व और संघर्ष में जीते हैं। मनोवैज्ञानिक विकास नाम की कोई चीज नहीं होती। जब आदमी अपने ही विचारों की गतिविधियों के प्रति जाग जाता है, अवधान-ध्यानपूर्ण हो जाता है तो वह देख पाता है कि विचारक और विचार के बीच में क्या कोई अंतर है भी,। वह देख पाता है कि अवलोकनकर्ता और अवलोकन, अनुभवकर्ता और अनुभव के बीच क्या कोई अंतर है भी। वह जान जाता है कि इनके बीच अंतर, एक भ्रम है। तब वहां केवल विशुद्ध अवलोकन रह जाता है, जो कि वो अंर्तदृष्टि है जो अतीत की किसी भी तरह की छाया से रहित होती है। यह समयातीत अंतदृष्टि मन में गहरा, अत्यंतिक मूल बदलाव लाती है।

पूरी तरह नकार, पूर्ण निषेध ही सकार का निचोड़ है। जब उन सभी चीजों का निषेध या नकार हो जाता है जिन्हें कि विचार द्वारा मनौवैज्ञानिक रूप से पैदा किया जाता है -तब जो शेष रहता है - वह ही प्रेम है, जो परम संवेदना या करूणा भी है, जो परम प्रज्ञा या समझ भी है।