25 Apr 2014

प्रतिबद्ध या बंधा हुआ मन ...स्वस्थ नहीं होता


संगठित धर्मों के मध्य जो सामाजिक अन्याय, सामाजिक दुर्दशा, सामाजिक नैतिकता और संस्कृति के हालात हैं, इन्हें देखें और यदि इनकी वैधता को मनोवैज्ञानिक रूप से नकारें, तो शायद हम असाधारण रूप से नैतिक हो सकें। क्योंकि आखिरकार नैतिकता ही सुव्यवस्था या अनुशासन है; नैतिक उत्कृष्टता (सद्गुण, अच्छाई, भलाई) सम्पूर्ण अनुशासन या सुव्यवस्था है। और यह तभी अस्तित्व में आती है जब आप अव्यवस्था को नकारें, वह दुव्र्यवस्था जिसमें हम जी रहे रहे हैं, द्वंद्व की अव्यवस्था, भय की अव्यवस्था जिस में हर आदमी व्यक्तिगत सुरक्षा ढूंढ रहा है। 

मुझे नहीं पता कि आपने कभी सुरक्षा के प्रश्न पर विचार किया हो। आपको पता है हम, लोगों से वादों में, प्रतिबद्धता में सुरक्षा ढूंढते हैं; यदि हमसे (या हम किसी से) कोई वचन दे, कोई प्रतिबद्धता दिखायें तो हम बहुत ही सुरक्षित महसूस करते हैं, चाहे वो हिन्दू होने, मुसलमान होने या ईसाई होने या इसी तरह का कुछ होने में वह सुरक्षितता मिले। यह प्रतिबद्धता या कुछ होना हमें सुरक्षितता देता है। यदि हम स्वयं से ही किसी काम के लिए प्रतिबद्ध हैं... तो यह प्रतिबद्धता हमें बड़ी ही निश्चितता, भरोसा, आश्वस्तता दिलाती है। 

लेकिन यह प्रतिबद्धता हमेशा ही अव्यवस्था पैदा करती है, और यही चीज है जो वाकई यथार्थतः हमेशा घटित होती है। 

मैं हिन्दू हूं.. आप हिन्दू नहीं है या जो भी हैं। मैं अपनी निश्चित धारणाओं, संकल्पनाओं-सिद्धांतों, श्लोकों-नारों के प्रति प्रतिबद्ध हूं और इएलिए हम बंट जाते हैं आप ‘वो हैं‘ और ‘मैं ये हूं’। जबकि यदि हम किसी विषय में सम्बद्ध या शामिल तो हों.. पर प्रतिबद्ध नहीं, बल्कि जीवन की समग्र गति में शामिल हों तो यह भेद या बंटवारा नहीं होगा; तब हम मनुष्य होंगे.. दुख में.. ना कि एक दुःखी हिन्दू, दुःखी मुसलमान या दुःखी ईसाई.. तब हम केवल मात्र मनुष्य होंगे जो दोषी हैं, पश्चाताप में हैं, बेचैन हैं, यातनाएं झेल रहे हैं, अकेले हैं और रोजाना की जिंदगी से बोर हो रहे हैं। अगर हम एक साथ इकट्ठें हों... तो हम इन सब चीजों से बाहर आने का रास्ता मिलकर ढूंढ लेंगे। लेकिन हम प्रतिबद्ध होना पसंद करते हैं, हम चाहते हैं कि हम अलग-थलग.. अकेले सुरक्षित रहें, राष्ट्र या सम्प्रदाय के रूप में ही नहीं... बल्कि व्यक्तिगत रूप से भी। इस प्रतिबद्धता में ही अलगाव है। और जब मन किन्हीं चीजों से प्रतिबद्ध या बंधा हुआ होता है, वह अलग थलग अकेला होता है और स्वस्थ भी नहीं होता।

When the mind is isolated it is not sane

To look at social injustice, social misery, social morality and culture in the midst of which organized religions exist, and to deny their validity psychologically, is to become extraordinarily moral. Because after all morality is order; virtue is complete order. And that can only come into being when you deny disorder, the disorder in which we live, the disorder of conflict, of fear in which each individual is seeking personal security. I do not know if you have ever considered the question of security. You know we find security in commitment; in being committed to something there is a great feeling of security, in being a Communist, in being a Frenchman, or an Englishman, or anything else. That commitment gives us security. If you have committed yourself to a course of action, that commitment gives a great deal of surety, assurance, certainty. But that commitment always breeds disorder, and this is what is actually taking place. I am a Communist and you are not -whatever you are. We are committed to ideas, to theories, to slogans and so we divide, as you are this and I am that. Whereas if we are involved, not committed, involved in the whole movement of life then there is no division; then we are human beings in sorrow, not a Frenchman in sorrow, not a Catholic in sorrow, but human beings who are guilty, anxious, in agony, lonely, bored with the routine of life. If you are involved in it, then we'll find a way out of it together. But we like to be committed, we like to be separately secure, not only nationalistically, communally, but also individually. And in this commitment there is isolation. When the mind is isolated it is not sane.
Talks in Europe 1968, Social Responsibility

24 Apr 2014

कोई कैसे किसी चीज को कैसे पूरा का पूरा, सम्पूर्णता में देखे?

कोई कैसे किसी चीज को कैसे पूरा का पूरा, सम्पूर्णता में देखे? कोई कैसे भय को पूरा का पूरा देखे, ना कि भय को विभिन्न रूप और आकारों में बंटा हुआ.. आधा-अधूरा। ना कि चेतन और अचेतन मन के भय, चेतन रहते हुए भय और अचेतन रहते हुए भय.. अपितु सम्पूर्ण भय को। आप समझे? कोई कैसे भय को.. पूरा का पूरा, सम्पूर्णता में देखे? 

कोई कैसे ‘मैं’, ‘अहं’ या ‘स्व’ को पूरा का पूरा, सम्पूर्णता में देखे? अहं जो विचार से बना है, जो विचार से अलग कर दिया गया है, विचार जो कि खुद टुकड़े-टुकड़े में बँटा हुआ है.. इसलिए विचार ‘मैं’ को गढ़ता है और सोचता है कि ‘मैं’ विचार से कुछ अलग है, स्वतंत्र है। ‘मैं’ सोचता है कि वह ‘विचार’ से अलग है, लेकिन विचार ने ही ‘मैं’ को बनाया होता है.. उसकी सारी चिंताओं, डरों, घमंड, आत्मप्रदर्शन, सन्ताप, सुख, पीड़ा, आशाओं सहित। इस ‘मैं’ ‘अहं’, ‘स्व’ को विचार ही बनाता है। और फिर ‘मैं’, ‘विचार’ से मुक्ति की बात करता है, वह सोचता है.. उसकी अपनी जिन्दगी है। जैसे कि कोई माईक जिसे विचार ने ही बनाया है, पर वो विचार से अलग भी है। कोई पर्वत, विचार ने नहीं बनाया है लेकिन वो विचार से अलग है। ‘मैं’ को ‘विचार’ ही बनाता है और फिर ‘मैं’ कहता है कि ‘मैं विचार से पृथक, मुक्त हूं’। अब आपको यदि पूर्णता में देखना है... आप समझे.. क्या आपको अब यह सब साफ-साफ स्पष्ट दिखा? 

तो अब बतायें कि भय पूर्णता में क्या है? ना कि भय के भिन्न रूप, ना कि डर की विभिन्न पत्तियाँ बल्कि भय का सारा का सारा वृक्ष, सम्पूर्ण वृक्ष? ठीक? तो अब बतायें कि किसी को भय को पूरा का पूरा कैसे देखना चाहिए? 

किसी चीज को उसकी पूर्णता में देखने या सुनने के लिए मुक्त होना जरूरी है, क्या नहीं? पूर्वाग्रहों से मुक्त होना, अपने निष्कर्षों से मुक्त होना, इस बात से मुक्त होना कि आप भय से मुक्त होना चाहते हैं, भय की तर्कसंगत व्याख्या की इच्छा से मुक्त होना। कृपया इस सब को देखें। किसी इच्छा को नियंत्रित करने की इच्छा से मुक्त होना... क्या मन इन सब चीजों से मुक्त हो सकता है? अन्यथा वह कभी भी सम्पूर्णता को, किसी चीज को पूरा का पूरा नहीं देख सकता। मैं डरा हुआ हूं। मैं डरा हुआ हूं ‘कल’ के डर से, नौकरी छूट जाने, खो जाने के डर से, असफल होने के डर से, अपना पद-प्रतिष्ठा खो जाने के डर से, या इस डर से कि मेरे सामने चुनौतियाँ आयेंगी और मैं उनका सामना नहीं कर पाऊंगा, चुनौतियों से संघर्ष की क्षमता खो दूंगा... उन सारे भयों डरों को देखना जो कि किसी को हो सकते हैं। 

क्या आप इन/इस सबको... बिना ‘किसी विचार’ को बीच में लाए, विचार की किसी गतिविधि के बिना देख सकते हैं? विचार... जो कि समय है... विचार की सक्रियता या कोई गतिविधि जो कि भय का कारण है। क्या आप कुछ समझे?


How does one perceive the whole of anything?

How does one perceive the whole of anything? The whole of fear, not the broken up of fear in different forms or the fear of the unconscious and the conscious - in the conscious and in the unconsciousness - but the whole of fear. You understand? How does one perceive the whole of fear? How do I perceive the whole of me - the 'me' constructed by thought, isolated by thought, fragmented by thought which in itself is fragmented? So it creates the 'me' and thinks that 'me' is independent of thought. The 'me' thinks it is independent of thought but it has created the 'me' - the 'me' with all its anxieties, fears, vanities, agonies, pleasures, pain, hopes - all that. That 'me' has been created by thought. And that 'me' becomes independent of thought, it thinks it has its own life - like a microphone which is created by thought, and yet it is independent of thought. The mountain is not created by thought but yet it is independent. The 'me' is created by thought and the 'me' says: "I am independent of thought". Now to see the totality - you understand - is this clear now? So what is fear totally - not the various forms of fear, not the various leaves of this tree of fear but the total tree of fear? Right? How does one see the totality of fear? To see something totally or to listen to something completely there must be freedom, mustn't there? Freedom from prejudice, freedom from your conclusion, freedom from your wanting to be free of fear, freedom from the rationalization of fear. Please follow all this. Freedom from the desire to control it - can the mind be free of all that? Otherwise it can't see the whole. I am afraid. I am afraid because of tomorrow, losing a job, afraid I may not succeed, afraid I might lose my position, afraid that there I will be challenged and I'll not be able to reply, afraid of losing my capacity - all the fears that one has. Can you look at it without - please listen - any movement of thought which is time, which causes fear? Have you understood something?

Saanen 4th Public Talk 20th July 1975

19 Apr 2014

एक अलग तरह का मन

हर आदमी कश्मकश और बखेड़ों से भरी जिंदगी.. निरंतर भागदौड़ हड़बड़ी और संघर्ष में फंसा है. इस जिंदगी का मतलब समझने के लिए किसी को भी पहले तो इस पर बौद्धिक रूप से पकड़ बनानी होगी और उसके बाद इससे उपजी समझ को व्यवहार में लाना होगा. चूंकि विचार पहले आता है यह बहुत जरूरी है कि वह सत्य या मौलिक, हमारा जाना—समझा विचार हो.. इसलिए आपको किसी समस्या का सामना स्पष्ट विश्लेषित मन के साथ करना होगा, पूर्वाग्रह से रहित, दिखावटी कोशिश और अंधविश्वास से मुक्त होकर... एक ऐसे मन सहित जो जांच परख कर, चीजों की जड़ तक जाने की सुदृढ़ इच्छा रखता हो ना कि सतह पर ही झाग या फेन की तरह फैले रहने की....

A different mind
In the confusion and turmoil of life, in its continual bustle and conflict, every individual is caught. To understand the meaning of it, o
ne must first grapple with it intellectually and afterwards put one's intellectual theories into practice... And since thought comes first, it very necessary that it should be true thought. Therefore you must approach the problem with a clear synthetic mind, free from prejudice, vanity and superstition - a mind that is willing to probe to the real root of things and not merely to skim the surface.

J. Krishnamurti Early Works, circa 1930

9 Apr 2014

साध्य और साधन भिन्न या अलग नहीं होते

हम इतिहास का अध्ययन करते हैं और ऐतिहासिक तथ्यों का अपनी पूर्वधारणाओं के अनुसार अनुवाद कर लेते हैं, लेकिन भविष्य के प्रति सुनिश्चित होता एक भ्रांति है। मनुष्य केवल किसी एक प्रभाव का परिणाम नहीं है, वह व्यापक रूप से जटिल है ; और अन्य को न्यून आंकते हुए केवल किसी एक प्रभाव को बढ़ा-चढ़ा कर देखना एक असंतुलन पैदा करता है, जो हमें और भी अव्यवस्था और विपदाओं में ले जाएगा। मनुष्य एक संपूर्ण प्रक्रिया है। तो इस संपूर्णता को समझना ही होगा, ना कि इसका कोई एक हिस्सा... हालांकि चाहे कोई हिस्सा अस्थायी रूप से कितना ही महत्वपूर्ण क्यों ना हो। किसी भविष्य के लिए वर्तमान से समझौता करना उन लोगों का पागलपन है, जो सत्ता-शक्ति मिलने से पागल हैं और ताकत एक बहुत बड़ी बुराई है। ये लोग मानवता की दिशा तय करने के लिए खुद को सही साबित करने पर तुले रहते हैं, ये लोग नई तरह के पंडित हैं। साधन और साध्य अलग नहीं हैं, ये एक ही संयुक्त तथ्य है। साधन ही साध्य का सृजन करता है। हिंसा के द्वारा शांति नहीं हासिल की जा सकती। पुलिसिया व्यवस्था द्वारा नियंत्रित राज्य शांतिपूर्ण नागरिक नहीं पैदा कर सकता। विवश करके, आजादी हासिल नहीं की जा सकती। यदि कोई पार्टी संपूर्णतः शक्तिसंपन्न है, तो वह एक वर्गविहीन समाज की स्थापना नहीं कर सकती क्योंकि वर्गविहीन समाज किसी तानाशाही से नहीं पाया जा सकता। यह सब सहज ही समझ में आ जाना चाहिए। 

1 Apr 2014

नवीन मौलिक की खोज


एक सीखा-सिखाया आदमी, चाहे वह कितना ही विद्वान या पंडित हो, विकिपीडिया से भरा हो.... अगर वह प्रेम-प्यार नहीं जानता, तो उसका सारा ज्ञान बकवास या व्यर्थ है.. वह केवल किताबी कीड़ा है। एक आदमी जो किसी तरह के विश्वास या श्रद्धा या मत के अनुसार, किसी धर्मसम्प्रदाय के हिसाब से चलने वाला है वह सीमित या बंधा होगा कहीं ना कहीं गुलाम होगा क्योंकि यदि किसी विश्वास के अनुसार ही अनुभव करता हो.. तो उसके अनुभव, कितने ही दिव्य अनुभव हों... उसे मुक्त नहीं करते। इसके विपरीत विश्वास, धर्म आधारित तथाकथित आध्यात्मिक अनुभव बांधते ही हैं। और सब तरह से मुक्त होना ही किसी नये, नवीन मौलिक की खोज में सहायक हो सकता है।

A man of learning, however erudite, however encyclopaedic his knowledge may be, if he has no love, surely his knowledge is worthless; it is merely book learning. A man of belief, as we discussed, must inevitably shape his life according to the dogma, the tenet, that he holds, and therefore his experience must be limited; because, one experiences according to one's beliefs, and such experience can never be liberating. On the contrary, it is binding. And, as we said, only in freedom can we discover anything new, anything fundamental.

J. Krishnamurti The Collected Works Volume V

26 Mar 2014

अगर आप अहसास को कोई नाम ना दें


जब आप किसी अहसास या भाव को देखें, तो वह स्वतः ही विलीन हो जाता है। लेकिन जब किसी अहसास के समाप्ति के बाद भी, यदि वहाँ कोई अहसास को देखने वाला होता है, एक दर्शक होता है, महसूस करने वाला या एक एक विचारक होता है जो उस मूल बीते अहसास से अलग... उस अहसास की स्मृति बन रहता है...तो वहां पर भी द्वंद्व होता है। तो बहुत ही महत्वपूर्ण है, यह समझना कि हम किसी अहसास को, भाव को किस तरह देखते हैं। तो पल भर के लिए हम एक बहुत ही सामान्य अहसास या भाव या अनुभूति -जलन को लें। हम सब जानते हैं कि जलन क्या होती है या एक जलकुकड़ा होना क्या होता है। तो अब आप अपनी जलन को देखे... इसे आप कैसे देखते हैं? जब आप इस भाव को देखते हैं, आप जलन के अवलोकनकर्ता होते हैं... अपने आप से कुछ अलग। आप जलन को बदलने या उसके प्रारूप में बदलाव की कोशिश करते हैं, या उस जलन की व्याख्या करने की कोशिश करते हैं... आप देखिये कि आप किस तरह अपनी जलन को न्यायसंगत तर्कसंगत दिखाने की कोशिश करते हैं ... इसी तरह अन्य बातें। तो यहां पर एक तो अस्तित्व होता है, संवेदक होता है और एक चीज होती है जलन से अलग... जो कि जलन को देखती है। कुछ पल के लिए जलन गायब हो जाती है, पर फिर पुनः लौट आती है... वह लौट आती है इसलिए कि आप वाकई उसकी ओर उस तरह नहीं देखते कि वह आपका ही हिस्सा है, आप ही हैं।

तो मैं यह कहना चाहता हूं कि जिस क्षण आप उस भाव को एक नाम देते हैं, किसी अहसास पर एक लेबल लगा देते हैं... आप पुनः अतीत के ढांचे से निकालकर उसे अतीत का ही सातत्य दे देते हैं। अतीत का वह ढांचा क्या है ? वह है . आपका वह दर्शक होना... वह अलग अपनी ही छवि जो शब्दों, कल्पनाओं और क्या सही है? और क्या गलत? के विचारों के भेद से बनी है। किन्तु यदि आप भाव को या अहसास को नाम नहीं देते जिसके लिए कि बहुत ही होशपूर्ण होने की आवश्यकता है ... तो तुरन्त ही आप समझ के एक अन्य ही आयाम में पहुंच जाते हैं जहां अवलोकनकर्ता नहीं होता, विचारक नहीं होता... वह केन्द्र नहीं होता, जहां से आप निर्णय करते हैं... जहां आप जानते हैं कि आप अहसास से अलग-कुछ  नहीं हैं.. तब वहां कोई भी ‘मैं’ नहीं होता जो किसी अहसास को महसूसता है।