25 Sept 2012

ध्यान का स्वरूप क्या हो?


लतें या आदतें और ध्यान साथ-साथ नहीं टिके रह सकते।
ध्यान कभी भी एक आदत नहीं बनाया जा सकता, ध्यान कभी भी उस ढर्रे का अनुगमन नहीं करता जो किसी विचार द्वारा गढ़ा गया हो और जो आदत बन जाए। ध्यान है विचार का विध्वंस। 
ध्यान ये बात है कि, विचार अपनी ही उलझनों, कल्पनाओं और अपनी ही निर्थकता का अनुगमन ना करे। 
जब विचार अपनी ही निरर्थकता के विरूद्ध जाकर खुद को ही विखंडित करने लग जाये, चकनाचूर करने लग जाये...तब ध्यान का विस्फोट होता है। इस ध्यान का अपनी ही गति होती है....दिशा रहित और इसलिए कारणरहित भी।
जेकृष्णमूर्ति, नोटबुक, पेज 213


"Habit and meditation can never abide together; meditation can never become a habit; meditation can never follow the pattern laid down by thought which forms habit. Meditation is the destruction of thought and not thought caught in its own intricacies, visions and its own vain pursuits. Thought shattering itself against its own nothingness is the explosion of meditation. This meditation has its own movement, directionless and so is causeless. "
- J. Krishnamurti's Notebook, p.213


9 Apr 2012

खुद को जानना और बदलना


बातों, तर्क-वितर्क और व्याख्याओं का कोई अन्त नहीं होता। लेकिन व्याख्याएं, तर्क वितर्क और बातें, हमें किसी सीधी कार्यवाही तक नहीं ले जाते क्योंकि सीधी कार्यवाही, सीधे तुरन्त कर्म तक पहुंचने के लिए हमें मौलिक और आधारभूत रूप से बदलने की आवश्कता होती है। यदि शब्दों की गहराई से सोचें तो इसके लिए किसी भी तर्कवितर्क, लफ्फाजी, ना बहलाने-फुसलाने, ना किसी सूत्र, ना किसी से प्रभावित होने की आवश्यकता होती है.. कि हम मूलभूत रूप से बदल सकें। हममें बदलाव की आवश्कता तो है, लेकिन किसी विशेष संकल्पना या सिद्धांत के अनुसार नहीं, क्योंकि जब हमारे पास किसी कर्म के बारे में कोई विचार या धारणा होती है, तो कर्म चुक जाता है। कर्म और विचार या धारणा के बीच एक समय अन्तराल होता है, एक स्थगन/देरी होती है और इस समय अंतराल में उस विचार/धारणा के प्रति या तो प्रतिरोध होता है, या सुनिश्चितता या किसी विचार या धारणा की नकल/अनुकरण और उसे कर्म में परिणित करने की कोशिश। यही तो वह सब है जो हम में से अधिकतर लोग, हमेशा करते रहते हैं। हम जानते हैं कि हमें बदलना है, न केवल बाहरी तौर पर बल्कि गहरे तक--मनोवैज्ञानिक रूप से।

बाहरी बदलाव तो बहुत से हैं। वे हमें किसी कार्य प्रणाली/किसी तौर तरीके के अनुसार सुनिश्चित होने के लिए या कहें कि एक ढर्रे पर चलने के लिए बाध्य करते हैं, लेकिन रोजमर्रा की जिन्दगी की चुनौतियों का सामना करने के लिए हममें गहन क्रंाति की आवष्यकता होती है। हममें से अधिकांष लोगों के पास कोई न कोई पूर्वनिर्धारित विचार या धारणा होती है कि हमें क्या होना चाहिए, परंतु हम कभी बुनियादी तौर से नहीं बदल पाते। हमें क्या होना चाहिए-इस संबंध में विचार और मनोभाव हममें कोई परिवर्तन नहीं ला पाते। हम तभी बदलते हैं जब यह नितंात आवष्यक हो जाता है, क्योंकि हम परिवर्तन की आवश्यकता को कभी सीधे-सीधे अपने सामने, साक्षात् नहीं देख पाते। हम कभी बदलना भी चाहते हैं, तो हममें भारी द्वंद्व और प्रतिरोध खड़ा हो जाता है और हम प्रतिरोध करने में, अवरोध खड़े करने में अपनी विपुल ऊर्जा व्यर्थ कर देते हैं ...

एक भला समाज बनाने के लिये मानव जाति को स्वयं में बदलाव लाना होगा। मन के इस आमूल परिवर्तन के लिये आपको और मुझे ऊर्जा, संवेग और जीवन-शक्ति तलाशनी होगी, पर्याप्त ऊर्जा के बिना यह संभव नहीं है। स्वयं में बदलाव लाने के लिये हमें विपुल ऊर्जा चाहिए, परंतु हम अपनी यह ऊर्जा द्वंद्व, प्रतिरोध, अनुकरण, स्वीकरण और अनुपालन में व्यर्थ गवंते हैं, किसी ढर्रे का अनुकरण करना अपनी ऊर्जा व्यर्थ गवांना है। अपनी ऊर्जा को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिये हमें स्वयं के प्रति सजग रहना होगा, अपनी ऊर्जा का हम कैसे-कैसे अपव्यय करते हैं इसके प्रति सजग रहना होगा।  यह युग-युगांतकारी समस्या है, क्योंकि अधिकांषतः मनुष्य अकर्मण्य होते हैं। वे स्वीकार करने, अनुपालन करने और अनुसरण करने को प्राथमिकता देते हैं। यदि हम इस अकर्मण्यता और गहराई तक अपनी जड़ें जमाये हुए आलस्य को जान लें और अपने मन-मस्तिष्क में प्रयासपूर्वक स्फूर्ति ले आएं तो इसकी प्रबलता पुनः एक द्वंद्व बन जाती है और यह भी ऊर्जा का अपव्यय ही है।

हमारी अनेक समस्याएं हैं और उनमें से एक है कि ऊर्जा का संरक्षण कैसे किया जाए--उस ऊर्जा का संरक्षण जो चेतना के प्रस्फुटन के लिये आवष्यक होती है-वह प्रस्फुटन नहीं जो सुनियोजित होता है या जो विचार द्वारा गढ़ी गई, एक जुगाड़ होता है, बल्कि वह प्रस्फुटन जो इस ऊर्जा का अपव्यय न किये जाने पर स्वमेव घटता है... हम अपनी चेतना में एक आमूल क्रंाति लाने के लिये संपूर्ण ऊर्जा को एकत्र करने की जरूरत पर बात कर रहे हैं, क्योंकि हमारे पास एक नया ताजा मन होना ज़रूरी है; तो, हमें जीवन को एक नितंात भिन्न दृष्टि से देखना होगा।

4 Jan 2012

ईश्वर पाने का शार्टकट


ईश्वर को पाने का सरलतम मार्ग कौन सा है? 
जे कृष्णमूर्ति : मुझे नहीं लगता कि कोई सरल मार्ग है। क्योंकि ईश्वर को पाना अत्यंत कठिन, अत्यधिक श्रमसाध्य बात है। जिसे हम ईश्वर कहते हैं, क्या मन ही ने उसका निर्माण नहीं किया है? आप जानते ही हैं कि मन क्या होता है? मन समय का परिणाम है, और यह कुछ भी, किसी भी भ्रांति को निर्मित कर सकता है। धारणाओं को बुनने तथा रंगीनियों और कल्पनाओं में अपना प्रक्षेपण करने की शक्ति इसके पास है। यह निरन्तर संचय, काट-छांट और चयन करता रहता है। संकीर्ण सीमित तथा पूर्वाग्रहों से ग्रसित होने के कारण, यह अपनी सीमाओं के अनुसार ईश्वर की कल्पना कर सकता है, उसकी छवि बना सकता है। चूंकि कुछ खास शिक्षकों, पुरोहितों तथा तथाकथित उद्धारकर्ताओं ने कह रखा है कि ईश्वर है, और उसका वर्णन भी कर दिया है, इसलिए उसी शब्दावली में मन ईश्वर की कल्पना तो कर सकता है। लेकिन वह कल्पना, वह छवि ईश्वर नहीं है। इ्र्रश्वर का अन्वेषण मन द्वारा नहीं किया जा सकता।

ईश्वर को समझने के लिए पहले आपको अपने मन को समझना होगा, जो बहुत कठिन है। मन बहुत पेचीदा है और इसे समझना सरल नहीं है। बैठे-बैठे किसी प्रकार के सपने में खो जाना, विविध दिव्य दृश्यों तथा भ्रांतियों में लीन हो जाना और यह सोचने लगना कि आप ईश्वर के बहुत करीब आ गये हैं, यह सब तो काफी सरल है। मन अपने साथ अतिशय छल कर सकता है। अतः जिसे ईश्वर कहा जा सकता है उसका अनुभव करने के लिए आपको पूर्णतः शांत होना होगा, और क्या आपको यह मालूम नहीं है कि यह कितना अधिक कठिन है? क्या आपने ध्यान दिया है कि वयस्क लोग कभी भी शांत नहीं बैठ पाते हैं, वे किस तरह बेचैन रहते हैं, पैर हिलाते रहते हैं, हाथों को डुलाते रहते हैं? शारीरिक रूप से ही निश्चल बैठ पाना कितना दुःसाध्य है, मन का निश्चल होना तो और भी कितना ज्यादा मुश्किल है? आप किसी गुरू का अनुगमन कर सकते हैं और अपने मन को शांत होने के लिए बाध्य कर सकते हैं? पर आपका मन वस्तुतः शांत नहीं होता। यह अब भी बेचैन होता है, जैसे किसी बच्चे को कोने में खड़ा कर दिया गया हो। बिना किसी जोर जबरदस्ती के पूर्णतः मौन होना, एक महान कला हैं केवल तभी उसकी अनुभूति हो पाने की संभावना होती है, जिसे ईश्वर कहा जा सकता है।

8 Nov 2011

क्या मृत्यु के बाद भी कुछ बचता है?

क्या मृत्यु के बाद भी कुछ बचता है? जब एक आदमी दुख से भरा हुआ, मोहग्रस्त और खेदजनक स्थितियों में मरता है तो क्या बचता है?
क्या असली प्रश्न यह नहीं है कि - क्या मौत के बाद, कुछ बचता है? जब आपका कोई करीबी मर जाता है तो, आप कितना सयापा करते हैं? क्या आपने इस पर कभी गौर किया? सब आपके साथ रोते हैं। जब अपने भारत देश में कोई मर जाता है तो जितना शोक संताप किया जाता है, ऐसा सारी दुनियां में कहीं नहीं होता। आइये इसे गहराई में जाने।
सबसे पहले तो क्या आप देख सकते हैं, क्या आप हकीकतन महसूस कर सकते हैं कि आपकी चेतना ही सारी मानवता की चेतना है? क्या आप ऐसा महसूस कर सकते हैं? क्या यह आपके लिए एक तथ्य की तरह है? क्या यह आपके लिए यह उसी तरह तथ्य है, जैसे कि कोई आप आपके हाथ में सुई चुभोए और आप उसका दर्द महसूस करें? क्या यह इसी तरह वास्तविक है?

मानव मस्तिष्क का विकास समय में हुआ है, और यह करोड़ों वर्षों के विकास का परिणाम है। यह मस्तिष्क एक विशेष ढांचे में बद्ध हो सकता है यदि कोई व्यक्ति दुनियां के किसी विशेष भाग में, एक संस्कृति और परिवेश में रह रहा हो, तो भी यह एक सामान्य आम मानव चेतनायुक्त मस्तिष्क ही होता है। इस बारे में आप पूर्णतः आश्वस्त रहें। यह आपका व्यक्तिगत मस्तिष्क नहीं होता, यह सामान्य चेतना होती है। मस्तिष्क को पैतृक रूप से या विरासत में बहुत सारी प्रतिक्रियाएं मिली होती हैं, और यह दिमाग अपने जीन्स (गुणसूत्रों) सहित - जिनमें कुछ पैतृक होते हैं कुछ समय में विकसित, इसमें मानवीय चेतना सामान्य घटक होती है। इस तरह यह मात्र आपका ही मस्तिष्क नहीं होता, यह सम्पूर्ण मानवीय चेतना भी होता है। विचार यह कह सकता है कि, यह मेरा दिमाग है। विचार यह कह सकता है कि, मैं एक व्यक्ति हूं। यही हमारा ढांचाबद्ध, सांचाबद्ध, या बद्ध होना है। यही बंधन है। क्या आप सारी मानवीय चेतना से हटकर एक व्यक्ति हैं? इसे जरा गहराई में जाकर देखें। आपका एक अलग नाम हो सकता है, एक रूप हो सकता है, एक अलग चेहरा हो सकता है, आप नाटे-लम्बे या गोरे-काले इत्यादि हो सकते हैं। क्या इससे ही आप एक सारी मानवीय चेतना से अलग व्यक्ति हो जाते हैं? क्या यदि आप किसी विशेष प्रकार के समूह या समुदाय या देश के हैं तो इससे आप अलग हो जाते हैं या एक अलग व्यक्ति बन जाते हैं?
तो वैयक्तिक्ता क्या है? एक व्यक्ति वह होता है जो खंडित नहीं है, बंटा हुआ नहीं है, मानवचेतना से विलग नहीं है।
जब तक आप सब खंडित हैं, तक एक व्यक्ति नहीं हो सकते। यह एक तथ्य है। जब तक यह तथ्य आपके खून में नहीं बहने लगता आप एक व्यक्ति नहीं हो सकते। भले ही आप अपने बारे में यह खयाल रखते हों कि आप एक व्यक्ति हैं, तो भी यह महज आपका विचार ही होगा। विचार ही सारी मानवजाति में आम चीज है, जो अनुभव, ज्ञान, स्मृति पर आधारित होती है और दिमाग में स्टोर हुई रहती है। मस्तिष्क या दिमाग सारी संवेदनों का केन्द्र होता है, जो सारी मानवजाति में आम है। यह सब तर्कसंगत है। तो जब आप कहते हैं कि, मेरे साथ क्या होगा, जब मैं मर जाऊंगा? तो इसमें ही आपकी रूचि है, इस ”मैं“ में, जो कि मरने वाला है। मैं क्या है? आपका नाम, आप कैसे दिखते हैं, आपकी शिक्षा-दीक्षा कैसी है, ज्ञान, कैरियर, पारिवारिक पंरपरा और धार्मिक संस्कृति, विश्वास, अंधविश्वास, लोभ, महत्वकांक्षा, वह सारी धोखाधडि़यां जो आप कर रहे हैं, आपके आदर्श - यह सब ही तो आपका ”मैं“ है। यह सब ही आपकी व्यक्तिपरक चेतना है। यही चेतना सारी मनुष्यता में समान है क्योंकि वह भी तो लोभी, ईष्र्यालु, भयभीत, जो सुरक्षा चाहती है, जो अंधविश्वासी है, जो एक तरह के ईश्वर में भरोसा करती है आप अन्य तरह के, इनमें से कुछ कम्युनिस्ट है, कुछ समाजवादी, कुछ पूंजीवादी। यह सब उसी का एक हिस्सा हैं। इन सबमें यह एक सामान्य घटक है कि आप ही सारी शेष मानवता हैं। आप सहमत होते हैं, आप कहते हैं कि ठीक है यह तो पूरी तरह सही है, लेकिन तो भी आप एक व्यक्ति, एक व्यक्तित्व की तरह बर्ताव करते हैं। यही वह बात है जो बहुत ही भद्दी है, बहुत ही पाखंडपूर्ण है।
तो अब, वह क्या है जो मर जाता है? यदि मेरी चेतना ही सारी मानवजाति की चेतना है, यह बदल जाती है, जो कि मैं सोचता हूं कि ”मैं“ हूं तो मेरे मरने पर क्या होगा? मेरी देह का मृत्युसंस्कार कर दिया जायेगा या हो सकता है यह अचानक ही किसी दुर्घटनावश नष्ट हो जाये, तो क्या होगा? यह आम चेतना चली जायेगी। मुझे नहीं मालूम कि आप इसे महसूस कर पा रहे हैं या नहीं ! जब सच को इस तरह देख लिया जाता है तो मृत्यु का बहुत ही तुच्छ अर्थ रह जाता है। तब मृत्यु का भय नहीं रहता। मृत्यु का भय तब तक ही रहता है जब तक कि हम खुद को मानवता से अलग व्यक्ति या व्यक्तित्व मानते हैं, जो कि परंपरा है... जिस परपंरा में हमारे दिमाग को एक कम्प्यूटर की तरह प्रोग्राम्ड किया जाता है यह फीड किया जाता है कि मैं एक अलग व्यक्ति हूं, मैं एक अलग व्यक्ति हूं, मैं विशेष तरह के ईश्वर को मानता हूं, मैं यह मानता हूं मैं वह मानता हूं आदि आदि।
इस सब में आप एक तथ्य और भूल रहे हैं वह है प्रेम। प्रेम मृत्यु को नहीं जानता। करूणा मृत्यु को नहीं जानती। तो वही व्यक्ति जिसे प्रेम का कुछ पता नहीं, जो प्रेम नहीं करता, जिसमें करूणा नहीं है वही मृत्यु से भयभीत होता है। तो आप कहेंगे कि ”मैं प्रेम कैसे करूं? मुझमें करूणा कैसे आये? जैसे कि ये सब बाजार से खरीदा जा सकता हो। लेकिन यदि आप देखें, अगर आप महसूस कर सकें कि प्रेम ही ऐसी चीज है जिसकी मृत्यु नहीं है, यही असली बुद्धत्व है, जागृति है। यह किसी भी ज्ञान, शब्दों की जुगाली या बौद्धिक अलंकरण से परे की चीज है।

2 Sept 2011

कोई दुख है, यानि‍ अहं भी है।


चेतना की परिधि में की गई कोई भी प्रगति मात्र आत्म विकास है और आत्म विकास का अर्थ है दुख के मार्ग पर ही बढ़ते जाना, उसका अंत करना नहीं। यदि आप इसे ध्यानपूर्वक देखें तो यह बात स्पष्ट हो जायेगी। यदि मन का वास्ता सम्पूर्ण दुख से मुक्त होने से है तो फिर मन को करना क्या होगा? पता नहीं आपने कभी इस समस्या पर विचार किया है या नहीं, परन्तु कृपया इस पर अब विचार कर लें।

हम दुख उठाते हैं, हैं न? हम केवल शारीरिक बीमारियों और अस्वस्थता से ही दुखी नहीं रहते, बल्कि अपने अकेलेपन और आंतरिक गरीबी के कारण भी दुखी रहते हैं। हम दुखी रहते हैं क्योंकि हमें कोई प्रेम नहीं करता। जब हम किसी को प्रेम करते हैं और जवाब में प्रेम नहीं मिलता तो हम दुखी हो जाते हें। हर तरह से, सोचने का अर्थ ही है, दुख से भर जाना। अतः हमें लगता है कि सोचने का क्या लाभ? इसलिए हम किसी विश्वास को थाम लेते हैं, और फिर उसी से बंधकर रह जाते हैं, उसी को हम धर्म कह देते हैं। यदि मन देख पाए कि क्रमशः प्रगति व आत्म-सुधार द्वारा दुख का अंत संभव नहीं है, तो फिर मन करे क्या? क्या मन इस चेतना के पार जा सकता है, तरह तरह की इन व्यग्रताओं और विरोधाभासी इच्छाओं के पार? और क्या उस पार जाने में समय समय लगेगा? कृपया इसे समझिये, केवल शाब्दिक रूप से नहीं, बल्कि वस्तुतः, वास्तविक रूप में। यदि यह समय का मामला है तो आप पुनः उस घेरे में आ जाते हैं जिसे प्रगति कहते हैं। क्या आप यह देख पा रहे हैं? चेतना की परिधि में, किसी भी दिशा में उठाया गया कदम आत्मविकास ही होता है? और इसलिए वहां दुख की निरंतरता बनी रहती है। दुख को नियंत्रित व अनुशासित किया जा सकता है, उसका दमन किया जा सकता है, उसे युक्तिसंगत तथा अत्यंत परिष्कृत बनाया जा सकता है, परन्तु दुख की अन्र्तनिहित प्रबलता तब भी बनी रहती है। और दुख से मुक्त होने के लिए, उसकी इस प्रबलता से, इसके बीज मैं से, अहं से, कुछ बनने होने के इस सम्पूर्ण प्रक्रम से मुक्त होना ही होगा। पार जाने के लिए इस प्रक्रिया पर विराम लगना आवश्यक है।


अभिमान-स्वाभिमान, मैं, अहं, इगो, घमण्ड, होमी, आत्म, स्व आदि शब्द पर्यायवाची हैं। बचपन, जवानी हो या बुढ़ापा, जब कभी भी, जिस भी उम्र में हम अपने बारे में सोचने-समझने लगते हैं, तो उम्र के साथ ही हम चाहे-अनचाहे अपना व्यक्तित्व बनाने लगते हैं। विभिन्न तत्वों को जोड-घटा कर, उनका सामंजस्य कर, हम अपने ”व्यक्ति” को गढ़ने लगते हैं। व्यक्ति अपनी रूचि अरूचि अनुसार, विभिन्न तरह के लक्षण अपना लेता है। व्यक्तित्व के लिए अंग्रेजी में शब्द है ”पर्सोनेलिटी“, इसमें पर्सोना शब्द का हिन्दी अर्थ होता है मुखौटा। हम अपना एक ऐसा मुखौटा गढ़ते हैं, जैसा कि हम समाज को दिखना चाहते हैं। इसी तरह, हम खुद-स्वयं के लिए और विभिन्न संबंधों के लिए भी अलग-अलग या विभिन्न चीजों को जोड़कर मुखौटे बनाते हैं। समाज हमें और हम समाज के प्रत्येक व्यक्ति को इन्हीं मुखौटों की सच्ची झूठी हकीकतों से पहचानते हैं। समाज में इसे किसी व्यक्ति के लक्षणों के रूप में जाना जाता है और तद्नुसार भला-बुरा, नगण्य, घमंडी-गंदा, बुद्धिजीवी, स्वार्थी आदि की सामान्य प्रतिक्रियाएं देता है, विशिष्ट लक्षणों को विशिष्ट मान्यताएं देता है। लेकिन किसी भी मुखौटे को गढ़ना यानि अहं को गढ़ना है। अपने मूल अस्तित्व से भिन्न एक कृत्रिम चीज गढ़ना है।

आत्म विकास का अर्थ अहं का विकास ही है। हम अपने बारे में जो भी भला-बुरा सोचकर, योजना बनाकर, जानबूझकर जो आदर्शों के लक्ष्य स्थापित कर प्रगति की सीढि़यां बनाते हैं, इनसे हम दुख के मार्ग पर ही चलते हैं। क्योंकि तय करके चलेंगे तो राह में कई रोढ़े आयेंगे, तकलीफें मिलेंगी, दुख होगा

इतना सोच-समझकर चलने पर भी दुख खत्म नहीं होता, तो हम अपनी विवेक-विचार क्षमता को ही निकम्मा जानकर, सोचने-समझने को एक तरफ रख देते हैं और किसी विश्वास को पकड़ लेते हैं। किसी किताब, गुरू या किसी पुरानी से पुरानी सिद्ध चीज के पीछे लग जाते हैं और उसमें लिखे की नकल करने लग जातें हैं, उनकी बातों का अंधानुकरण करने लग जाते हैं। लेकिन यह सब भी हम अपने व्यक्तित्व को, अहं को पुष्ट करने के एक तरीके की ही तरह करते हैं। इसमें भी कोई लक्ष्य या आदर्श और फिर उस पर आगे बढ़ने की रास्ते और सीढि़यां होती हैं, इन पर भी दुख रहता ही है।

कोई दुख है, इसका मतलब है कि हमारे मौलिक वास्तविक अस्तित्व के अतिरिक्त भी, एक इच्छा या चाह है और हम उसे पूरा करना चाह रहे हैं... वह पूरी नहीं होती और दुख होता है। हम अपनी वास्तविकता से इतर विचारों से एक कृत्रिम व्यक्तित्व या आदर्श या लक्ष्य गढ़ते हैं, जो कि असलीयत में अहं होता है। इस लक्ष्य की राह पर चलने से ही दुख होता है। अपने मूल स्वरूप, वास्तविक अस्तित्व के अतिरिक्त खुद को किसी भी अन्य कृत्रिम रूप में जानने, पहचानने, उसके बारे में विचार करने में ही दुख का बीज छिपा है। जब हमारे विचार, अपने बारे में कोई कृत्रिम छवि गढ़ते हैं तो हम दुख का बीज बोते हैं। जब हम अपनी छवि को पालते-पोसते हैं तो दुख को पालते-पोसते हैं, बढ़ा करते हैं।

इसी कुछ होने-बनने की चाह और तद्नुसार कोशिश करने और इसमें होने वाले दुख के कुचक्र से निकलने के लिए, हम क्या कर सकते हैं? अपनी चेतना के इस आयाम से पार होने के लिए, हम क्या कर सकते हैं?
आत्म विकास, अहं का विकास करने, आदर्श, लक्ष्य बनाकर चलने, दुनियां के हिसाब से चलने की कोशिश में हम दुख से निजात नहीं पा सकते... इससे तो किसी ना किसी तरह का दुख मिलेगा ही। हम जैसे कुदरती हैं, मौलिक रूप से हैं...वैसे ही रहें। किसी चीज को कल्पना, विचार, सिद्धांत या शाब्दिक रूप से समझने की बजाय, उसका साक्षात अवलोकन करें तो ही उसका यथार्थ समझ आ सकता है। यदि कोई दुख से मुक्त होना चाहता है, तो उसे अहं को बनाने वाली सम्पूर्ण प्रक्रिया से वाकिफ होना होगा, इस अहं निर्माण की प्रक्रिया पर रोक लगानी होगी। अपने अस्तित्व की वास्तविकता में रहना होगा।

दुख, अवसाद, अहं, अभि‍मान, स्‍वाभि‍मान, व्‍यक्‍ि‍त, व्‍यक्‍ि‍तत्‍व, घमंड, इगो, Ego, Sorrow, Ending of sorrow, J Krishnamurthy, I, Self, Self Development, Personality, Persona

12 Jul 2011

मानव का अस्तित्व क्यों हैं और हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है?


इमेज से http://www.google.co.in/imgres?imgurl=http://api.ning.com/files/J2e साभार 

मानव का अस्तित्व क्यों हैं और हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है?
आप इसलिए है क्योंकि आपके माता-पिता ने आपको जन्म दिया है, और आप भारत के ही नहीं, विश्व की सम्पूर्ण मानवता के शताब्दियों के विकास का परिणाम हैं। आप किसी असाधारण अनूठेपन से नहीं जनमें हैं बल्कि आपके साथ पंरपरा की पूरी पृष्ठभूमि है। आप हिन्दू या मुस्लिम हैं। आप पर्यावरण-वातावरण, खानपान, सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेशों और आर्थिक दबावों से उपजे हैं। आप अनेकों शताब्दियों का, समय का, द्वंद्वों का, दर्दों का, खुशियों का और लगाव चाव का परिणाम हैं। आपमें से हर कोई जब यह कहता है कि वह एक आत्मा है, जब आप कहते हैं कि आप शुद्ध ब्राहम्ण हैं, तो आप केवल परंपरा का, किसी संकल्पना का, किसी संस्कृति, भारत की विरासत, भारत की सदियों से चली आ रही विरासत का ही अनुकरण कर रहे होते हैं।
प्रश्न है कि जीवन में आपका ध्येय क्या हो? तो पहले तो आपको अपनी पृष्ठभूमि को समझना होगा। यदि आप पंरपरा, संस्कृति को, समूचे परिदृश्य को नहीं समझते, तो आप अपनी पृष्ठभूमि से उपजे किसी आईडिये, मिथ्या अर्थ को मान लेंगें और उसे ही अपने जीवन का ध्येय कहने लगेंगे। माना कि आप हिन्दू हैं और हिन्दू संस्कृति में पले बढ़े हैं। तो आप हिन्दूवाद से उपजे किसी सिद्धांत या भावना को चुन लेंगे और उसे अपने जीवन का ध्येय बना लेंगे। लेकिन क्या आप किसी अन्य हिन्दू से अलग, पूरी तरह अलग तरह से सोच सकते हैं? यह जानने के लिए कि हमारे अंतर्तम की क्या संभावनाएं या हमारा अंतर्तम क्या गुहार लगा रहा है, क्या कह रहा है? यह जानने के लिए किसी व्यक्ति को इन सभी बाहरी दबावों से, बाहरी दशाओं से मुक्त होना ही होगा। यदि मैं किसी चीज की जड़ तक जाना चाहता हूं तो मुझे यह सब खरपतवार या व्यर्थ की चीजें हटानी होंगी जिसका मतलब है मुझे हिन्दू मुसलमान होने से हटना होगा और यहां भय भी नहीं होना चाहिए, ना ही कोई महत्वाकांक्षा, ना ही कोई चाह। तब मैं कहीं गहरे तक पैठ सकता हूं, और जान सकता हूं कि हकीकत में यथार्थ संभावनाजनक, या सार्थक क्या है। लेकिन इन सबको हटाये बिना मैं जीवन में सार्थक क्या है इसका अंदाजा नहीं लगा सकता। ऐसा करना मुझे केवल भ्रम और दार्शनिक अटकलबाजियों में ही ले जायेगा।

तो यह सब कैसे होगा?
पहले तो हमें सदियों से जमी धूल को हटाना होगा, जो कि बहुत आसान नहीं है। इसके लिए गहरी अन्र्तदृष्टि की जरूरत है। इसमें आपकी गहरी रूचि होनी चाहिए। संस्कारों का निर्मूलन, परंपराओं, अंधविश्वासों, सांस्कृतिक प्रभावों की धूल को हटाने के लिए खुद को... अपने आपको समझने की आवश्यकता होती है ना कि किताबों से या किसी शिक्षक से सीखने की... यही ध्यान है।
जब मन अपने आपको सारे अतीत की धूल से साफ कर लेता है, मुक्त कर लेता है.. तब आप अपने अस्तित्व की सार्थकता के बारे में बात कर सकते हैं। आपने यह प्रश्न किया है, तो अब इस पर आगे बढ़ें, तब तक लगे रहें जब कि यह ना जान लें -कि क्या कोई ऐसी किसी वास्तविक, मौलिक, अभ्रष्ट चीज है भी? यह ना कहें कि ”हां, वाकई ऐस कुछ है“ या ”ऐसा कुछ नहीं होता“। बस इस पर काम करना जारी रखें, तलाशने, पाने, जानने की कोशिश ना करें क्योंकि आप जान नहीं पायेंगे। एक ऐसा मन जो भ्रष्ट है वो उस चीज को कैसे जान सकता है जो कि शुद्ध है, भ्रष्ट नहीं है। क्या मन खुद को साफ शुद्ध कर सकता है? हां कर सकता है। और यदि मन अपने आपको शुद्ध साफ कर सकता है, तब आप देख सकते हैं, तब आप जान सकते हैं, पता लगा सकते हैं। मन का परिष्करण, शुद्धिकरण ध्यान है।