26 Nov 2010

जे कृष्णमूर्ति जी की शिक्षाओं का निचोड़

जे कृष्णमूर्ति की शिक्षाओं का निचोड़ उनके सन 1929 में दिये गये वक्तव्य में है जिसमें उन्होंने कहा-

सच एक पथरहित भूमि है यानि सच ऐसा गंतव्य है जहां तक कि सुनिश्चित, बंधे बंधाये मार्ग से नहीं पहुंचा जा सकता। इंसान को यदि सच तक पहुंचना है तो वो ऐसा किसी संगठन, किसी पंथ, किसी परंपरा या रूढ़ि, संत-महात्मा-पंडे-पुजारी या रीति रिवाजों के अनुसरण से नहीं पहुंच सकता। ना ही किसी दार्शनिक ज्ञान या मनोवैज्ञानिक तकनीक से ही सच तक पहुंच संभव है। यदि किसी को सच का पता लगाना है तो उसे खुद को संबंधों के दर्पण में देखना होगा, अपने मन के तत्वों को समझना होगा, अवलोकन करना होगा ना कि बौद्धिक विश्लेषण या आत्मविश्लेषण, खयाली चीरफाड़ से यह संभव हो सकेगा। इंसान ने अपनी सुरक्षा की बाड़ के रूप में, अपनी ही धार्मिक, राजनीतिक, वैयक्तिक आदि कई छवियां बना रखी हैं। इंसान के व्यवहार में ये प्रतीकों, विचारों और विश्वासों के रूप में प्रकट होती हैं। इन गढ़ी हुई छवियों का बोझ - इंसान की सोच, उसके रिश्ते और उसकी रोजमर्रा की जिन्दगी पर हावी रहता है। एक दूसरे के बारे में गढ़ी हुई ये छवियां ही इंसानी समस्याओं का कारण हैं क्योंकि ये एक आदमी को दूसरे से अलग करती हैं, दो व्यक्तियों में अलगाव बनाती हैं। इंसान के मन में पहले से ही स्थापित धारणाओं के आधार पर जीवन के प्रति उसका नजरिया आकार लेता है। जो आदमी की चेतना में है वही उसका पूरा अस्तित्व होता है। किसी व्यक्ति का नाम, पंरपरा और परिवेश से ग्रहण बातें ही उसकी सतही सांस्कृतिक और निजता की पहचान बनते हैं। लेकिन आदमी का अनूठापन उसकी बाहरी छद्म पहचान में नहीं, अपितु अपनी चेतना की सभी तत्वों से पूरी तरह मुक्त हो रहने में निहित है, जो सारी मानवता के लिए एकसमान रूप से लागू होता है। इसलिए किसी भी व्यक्ति का सारी मानवता से अलग, किसी प्रकार का अस्तित्व नहीं है।

मुक्ति कोई प्रतिक्रिया नहीं है - ना ही कोई चुनाव या पसंद है। यह आदमी का ही दिखावा है कि - क्योंकि वह चुन रहा है, इसलिए वह मुक्त है। मुक्ति विशुद्ध अवलोकन है - बिना किसी दिशा या कारण के, बिना किसी सजा या दंड के भय या ईनाम के। मुक्ति का कोई निहितार्थ या उद्देश्य भी नहीं होता। ऐसा नहीं है कि जब किसी मनुष्य का पूरा विकास हो जाता है तो, मनुष्यत्व का चरम आ जाता है तब वो मुक्त हो जाता है पर उसके अस्तित्व के पहले कदम पर ही मुक्ति भी निहित है.. मुक्ति भी होती ही है। अवलोकन में/से ही कोई देखना शुरू करता है कि कहां कहां मुक्ति का अभाव है, कमी है, कहां मुक्ति नहीं है... वो बंध रहा है। मुक्ति हमारे दैनिक जीवन, उसकी गतिविधियों को बिना पसंद-नापसंद के या चयनरहित होकर देखने या अवधान.., ध्यान में रहने में पाई जाती है।

विचार समय है। विचार, अनुभव और ज्ञान से जन्मता है। अनुभव और ज्ञान समय और अतीत से अलग नहीं किये जा सकते। समय, इंसान का मनौवैज्ञानिक दुश्मन है। हमारे कर्म ज्ञान पर आधारित होते हैं, यानि समय पर आधारित होते हैं इसलिए इंसान हमेशा ही अतीत का दास या गुलाम होता है। विचार हमेशा सीमित होता है, उसकी सीमाएं होती हैं इसलिए हम अनवरत, नित्य ही द्वंद्व और संघर्ष में जीते हैं। मनोवैज्ञानिक विकास नाम की कोई चीज नहीं होती। जब आदमी अपने ही विचारों की गतिविधियों के प्रति जाग जाता है, अवधान-ध्यानपूर्ण हो जाता है तो वह देख पाता है कि विचारक और विचार के बीच में क्या कोई अंतर है भी,। वह देख पाता है कि अवलोकनकर्ता और अवलोकन, अनुभवकर्ता और अनुभव के बीच क्या कोई अंतर है भी। वह जान जाता है कि इनके बीच अंतर, एक भ्रम है। तब वहां केवल विशुद्ध अवलोकन रह जाता है, जो कि वो अंर्तदृष्टि है जो अतीत की किसी भी तरह की छाया से रहित होती है। यह समयातीत अंतदृष्टि मन में गहरा, अत्यंतिक मूल बदलाव लाती है।

पूरी तरह नकार, पूर्ण निषेध ही सकार का निचोड़ है। जब उन सभी चीजों का निषेध या नकार हो जाता है जिन्हें कि विचार द्वारा मनौवैज्ञानिक रूप से पैदा किया जाता है -तब जो शेष रहता है - वह ही प्रेम है, जो परम संवेदना या करूणा भी है, जो परम प्रज्ञा या समझ भी है।

10 Sept 2010

ध्यान वही ‘अवकाश’ है।

ध्यान कुछ ऐसा है... जिसका कि उस तरह से अभ्यास नहीं किया जा सकता, जिस तरह आप वायलिन या पियानो बजाने का अभ्यास करते हैं। आप अभ्यास करते हैं अर्थात् आप पूर्णता के किसी खास स्तर पर पहुंचना चाहते हैं। पर ध्यान में कोई स्तर नहीं है, कुछ पाना नहीं है। इसलिए ध्यान कोई चेतन या जान-बूझकर किया जानेवाला कर्म नहीं है। ध्यान वह है जो पूरी तरह से बिना किसी दिशा निर्देशन के है, अगर मैं चाहूं तो अचेतन शब्द का प्रयोग कर सकता हूं। यह जानबूझकर की गयी प्रक्रिया नहीं है। अब इसे यहीं छोड़ें। हम इस पर बहुत समय एक घण्टा, एक पूरा दिन बल्कि पूरा जीवन लगा सकते हैं। आइये, अब अवकाश स्पेस के बारे में बात करें क्योंकि ध्यान वही ‘अवकाश’ है।

हमारी बुद्धि में अवकाश नहीं है। दो प्रयासों के बीच, दो विचारों के बीच अवकाश है, लेकिन यह अब भी विचार की परिधि में है। इसलिए अवकाश क्या है? क्या अवकाश में समय भी रहता है? अथवा क्या समय में सारा अवकाश शामिल है? हमने समय के बारे में बातचीत की। यदि अवकाश में समय है तब तो यह अवकाश नहीं है? यह तो घिरा हुआ और सीमित है। अतः क्या बुद्धि समय से मुक्त हो सकती है? श्रीमन, यह महत्वपूर्ण व्यापक प्रश्न है। यदि जीवन, सारा जीवन ‘अब’ मैं समाया है तो आप देख पा रहे हैं कि इसका आशय क्या है? सारी मानवता आप हैं। सारी मानवता -क्योंकि दुखी हैं, वह दुखी है। उसकी चेतना आप हैं, आपकी चेतना, आपका होना.. वह है। यहां ‘आप’ या ‘मैं’ जैसा कुछ नहीं है जो कि अवकाश को सीमित करे। अतः क्या समय का कोई अन्त है? घड़ी का समय नहीं, जिसकी चाभी आप भरा करते हैं और जो बन्द हो सकती है बल्कि समय की समग्र गति। 

समय गति है, घटनाओं का एक समूह है। विचार भी गतियों का समूह हैं। इस तरह समय विचार है अतः हम कह रहे हैं.... क्या विचार का अन्त है? जिसका आशय है: क्या ज्ञान का अन्त है? क्या अनुभव का अन्त है? जो कि पूर्ण मुक्ति है। और यही है ध्यान। न कि कहीं जाकर बैठना और देखना- ये बचकाना है। ध्यान के लिए बुद्धि की ही नहीं बल्कि गहरी अर्न्‍तदृष्‍टि‍ की भी आवश्यकता होती है। भौतिकविद्, कलाकार, चित्रकार, कवि आदि सीमित अन्तदृष्टि रखते हैं - सीमित और छोटी। हम समयातीत अन्तर्दृष्टि की बात कर रहे हैं। यही है ध्यान, यही है धर्म और यदि आप चाहें तो शेष दिनों के लिए यही है जीने का मार्ग।

6 Aug 2010

ईश्‍वर शब्‍द को पढ़ना या बोलना जान लेना, ईश्‍वर को जान लेना नहीं है

आप ईश्वर के विषय में बहुत चर्चा करते हैं। आपकी किताबें इससे भरी हुई हैं। आप गिरजे, मन्दिर बनाते हैं। आप त्याग और बलिदान करते हैं, पूजा पाठ करते हैं, अनुष्ठान आयोजित करते हैं और आप ईश्वर विषयक धारणाओं से भरे पड़े हैं, हैं कि नहीं? आप यह शब्द ‘ईश्वर’ तो दोहरा लेते हैं पर आपके कर्म तो ईश्वरीय नहीं हैं। यद्यपि जिसे आप ईश्वर कहते हैं, उसकी आप उपासना करते हैं, आपके तौर-तरीके, आपके विचार, आपका अस्तित्व ईश्वरीय नहीं हैं, क्या हैं? हालांकि आप ईश्वर शब्द दोहराते रहते हैं, तो भी आप दूसरों का शोषण किया करते हैं, क्या आप ऐसा नहीं करते? आपके अपने-अपने ईश्वर हैं - हिंदू, मुस्लिम, ईसाई और कई अन्य। आप मंदिर बनवाते हैं, आप जितने ज्यादा अमीर होते जाते हैं, उतने ज्यादा मन्दिर बनवाने लगते हैं। हंसिये मत, आप खुद भी यही कर रहे हैं और कुछ लोग धार्मिक रूप से अमीर होने में लगे हैं अन्य लोग नोटों से अमीर होने की कोशिशों में लगे हैं फर्क बस इतना सा ही है।

तो आप ईश्वर से खूब परिचित हैं, कम से कम इस शब्द से तो हैं ही; पर यह शब्द ईश्वर नहीं है, शब्द वह वस्तु नहीं होता है। हम इस मुद्दे पर पूरी से स्पष्ट हो लें। यह शब्द ईश्वर नहीं है। आप ईश्वर शब्द का अथवा किसी अन्य शब्द का प्रयोग कर सकते हैं, किंतु ईश्वर वह शब्द नहीं है जिसका प्रयोग आप कर रहे हैं। चूंकि आप ईश्वर शब्द का प्रयोग कर लेते हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि आप ईश्वर को जानते हैं। मैं इस शब्द का प्रयोग नहीं करता, इसकी बड़ी साफ वजह है कि आप इसे जानते हैं। जो आप जानते हैं, वह यथार्थ नहीं है। इसके अतिरिक्त, यथार्थ का पता लगाने के लिए मन की सारी शाब्दिक बड़बड़ का बंद होना जरूरी है, क्या नहीं? आपके यहां ईश्वर की प्रतिमाएं हैं, किंतु निश्चित वह प्रतिमा ईश्वर नहीं है। आप ईश्वर को कैसे जान पाएंगे? जाहिर है, किसी मूर्ति के, किसी मंदिर के जरिये तो नहीं। ईश्वर को, अज्ञात को ग्रहण करने के लिए मन को भी अज्ञात हो जाना होता है। यदि आप ईश्वर की तलाश में हैं, तो आप ईश्वर को पहले से ही जानते हैं, आप उस लक्ष्य से अवगत हैं। यदि आप ईश्वर को ढूंढ रहे हैं तो आप जानते ही होंगे कि ईश्वर क्या है, नहीं तो आप उसे ढूंढते ही नहीं, या ढंूढते हैं? आप उसे या तो अपनी पुस्तकों के मताबिक ढूंढते हैं, या अपनी भावनाओं के अनुरूप ढूंढते हैं। आपकी भावनाएं आपकी स्मृति की प्रतिक्रियाएं मात्र हैं। इसलिए जिसे आप ढूंढ रहे हैं, वह पहले से ही गढ़ लिया गया है, या तो स्मृति के द्वारा या सुनी सुनाई बातों के द्वारा, और जो पूर्व निर्मित है, वह शाश्वत नहीं है वह तो मन की ही उपज है।

अगर किताबें नहीं होतीं, गुरू नहीं होते, दोहराने के लिए सूत्र नहीं होते, तो आपको पता होता केवल दुख और सुख का। यही होता न? लगातार दुख और परेशानियां एवं प्रसन्नता के कुछ विरले क्षण। और तब आप जानना चाहते कि आपको दुख क्यों होता है। पर आप ईश्वर में पलायन नहीं कर पाते-लेकिन शायद आप दूसरे तरीकों से पलायन करने लगते (रूस में नास्तिकतावादियों के सुख और दुख की पहेलियों, जीवन की नीरसता से पलायन करने के ईश्वर के अलावा भी कई बहाने हैं।), और शीघ्र ही पलायन के रूप में आप देवताओं का आविष्कार कर लेते। किंतु यदि आप दुख की समग्र प्रक्रिया को वस्तुतः समझना चाहते हैं, एक नूतन मानव की तरह, एक नए खिले इंसान की की तरह, पलायन नहीं बल्कि जांच परख करते हुए, तब आप स्वयं को दुख से मुक्त कर लेंगे, तब आप खोज लें कि यथार्थ क्या है ईश्वर क्या है? पर जो मनुष्य दुख से ग्रस्त है, वह ईश्वर अथवा यथार्थ को नहीं खोज पाता; यथार्थ को तभी खोजा या पाया जा सकता है जब दुख का अंत हो जाता है, जब प्रसन्नता विद्यमान होती है, तुलना की जा सकने वाली विषमता के रूप में नहीं, विपरीत के रूप में नहीं, अपितु वह तो एक ऐसी अवस्था है, जिसमें विपरीत है ही नहीं।

अतः अज्ञात, वह जिसकी सृष्टि मन ने नहीं की है, मन द्वारा प्रतिपादित, सूत्रबद्ध नहीं किया जा सकता। वह जो कि अज्ञात है, उसके बारे में सोचा नहीं जा सकता। जिस क्षण आप अज्ञात के विषय में सोचने लगते हैं, यह ज्ञात ही होता है। निश्चित ही आप अज्ञात के विषय में विचार नहीं कर सकते, कर सकते हैं क्या? आप विचार केवल ज्ञात के बारे में ही कर सकते हैं। विचार की गति ज्ञात से ज्ञात की ओर ही होती है और जो ज्ञात है वह यथार्थ नहीं है। तो जब आप सोचते हैं और ध्यान करते हैं, जब आप बैठ जाते हैं और ईश्वर के विषय में विचार करने लगते हैं, तब आप उसी के विषय में विचार कर रहे होते हैं जो ज्ञात है। वह समय में है, वह समय के जाल में आबद्ध है, अतएव यह यथार्थ नहीं है। यथार्थ केवल तभी अस्तित्व में आ सकता है, जब मन समय के जाल से मुक्त हो जाता है। जब मन सर्जन करना बंद कर देता है, तब सर्जन होता है। तात्पर्य यह है कि मन का पूर्णरूपेण स्थिर होना, निश्चल होना जरूरी है, लेकिन वह उकसाई तथा सम्मोहनजन्य स्थिरता नहीं होनी चाहिए, वह तो मात्र एक परिणाम ही होगी। यथार्थ का अनुभव करने के लिए स्थिर बनने की कोशिश करना पलायन का ही एक और रूप है। शांति, स्थिरता तभी होती है, जब सारी समस्याएं समाप्त हो चुकी होती हैं। जैसे हवा के थमने पर सरोवर शांति हो जाता है, वैसे ही मन स्वाभाविक रूप से मौन, शांत हो जाता है, जब बेचैन करने वाला विचारक नहीं रहता। विचार के अंत हेतु, वे सभी विचार जिनका वह निर्माण कर रहा है, सोच लिये जाने जरूरी हैं। विचार का प्रतिरोध करने से, उसके खिलाफ प्रतिरोध खड़े करने से कुछ होने वाला नहीं है, क्योंकि सभी विचारों को अनुभूत कर लेना, महसूस कर लेना आवश्यक है।

जब मन स्थिर प्रशांत होता है, तो यथार्थ, वह अनिर्वचनीय प्रकट होता है। आप इसे निमंत्रित नहीं कर सकते। इसे निमंत्रित करने के लिए तो आपका इसे जानना जरूरी होगा, और जो जाना हुआ है, ज्ञात है, वह यथार्थ नहीं है। अतः यह आवश्यक है कि मन सरल हो, विश्वासों से, कल्पित धारणाओं से लदा हुआ न हो। और जब स्थिरता होती है, जब कोई इच्छा, कोई ललक नहीं रहती, जब ऐसी स्थिरता सहित जिसे प्रवृत्त नहीं किया गया है, लादा नहीं गया है, मन खामोश होता है, तब यथार्थ का आगमन होता है एवं वह सत्य, वह यथार्थ ही एकमात्र रूपांतरकारी तत्व है, केवल यही वह कारक है, जो हमारे अस्तित्व में, हमारे दैनिक जीवन में एक आधारभूत, आमूल क्रांति लाता है। उस यथार्थ को पाने के लिए उसे खोजना नहीं पड़ता, बल्कि उन कारकों को समझ लेना होता है जो मन को उद्वेलित, बेचैन करते रहते हैं। तब मन सरल, मौन, स्थिर होता है। उस स्थिरता में वह अज्ञात, वह अविज्ञेय आविर्भूत होता है। जब ऐसा होता है, तो आशीर्वाद होता है, स्वस्ति होती है।
मुंबई, 8 फरवरी 1948 पुस्तक: ईश्वर क्या है, पृष्ठ क्रमांक 55-57

14 Jul 2010

महत्वाकांक्षा भ्रष्ट करती है।

जब तक भी कुछ हासिल करने की इच्छा है, कुछ उपलब्धि, कुछ होने की इच्छा है, भले ही वो किसी भी स्तर पर हो... तब तक, तब तब वहां पर क्षोभ, गुस्सा, शोक, भय होगा। अमीर होने की आकांक्षा, ये और वो होने की महत्वाकांक्षा तभी गिर सकती है जब हम इस शब्द में निहित सड़ांध या महत्वाकांक्षा की भ्रष्ट प्रकृति को समझ लें। उन क्षणों में जब कि हम देख समझ लेते हैं कि ताकत, सत्ता हासिल करने की इच्छा, चाहे वो किसी भी रूप में हो, चाहे वो प्रधानमंत्री बन जाने की हो या जज या कोई पुजारी या धर्म गुरू - हमारी किसी भी प्रकार की शक्ति अर्जित करने की इच्छा आधारभूत रूप से पैशाचकीय या पाप है। लेकिन हम नहीं देख पाते कि महत्वाकांक्षा भ्रष्ट करती है, यह कि शक्ति की ताकत की आकांक्षा वीभत्स है। इसके विपरीत हम कहते हैं कि हम शक्ति और ताकत को भले काम में लगायेंगे, जो कि निहायत ही बेवकूफाना वक्तव्य है। किसी भी गलत चीज से अंत में कोई सही चीज हासिल नहीं की जा सकती। यदि माध्यम या साधन गलत हैं तो उनका अंजाम या परिणाम भी गलत ही होंगे। यदि हम सभी महत्वाकांक्षाओं के सम्पूर्ण आशय को, उनके परिणामों, उसके परिणामों के साथ ही मिलने वाले एैच्छिक-अनैच्छिक परिणामों सहित नहीं जानते समझते हैं और अन्य इच्छाओं के केवल दमन का प्रयास करते हैं तो इस बात का कुछ भी अर्थ नहीं है।

6 Jul 2010

मौत को महसूस कि‍ये बि‍ना, जि‍न्‍दगी क्‍या है ? इस सवाल का जवाब नही मि‍ल सकता



काम करने के दिन यहाँ पर इतने लोगों को देखना, कुछ अद्भुत सा लगता है। नहीं? पहली बार जब आप यहाँ मिले थे - शनिवार था- हमने चर्चा की थी कि प्रेम क्या है। यदि आप यहाँ थे तो शायद आपको याद होगा। हम सब लोग मिलकर-मेरा अभिप्राय है साथ साथ - इस पूरे मसले के संबंध में खोजबीन कर रहे हैं; यह अत्यंत जटिल है। यदि आप बुरा न मानें, तो आपको विचार करना है- केवल सहमत नहीं हो जाना है। इसे विचारने में आपको अपने मस्तिष्क का इस्तेमाल पूरी ताकत से करना होगा। तो हम लोग एक साथ इस प्रश्न की छानबीन करने जा रहे हैं कि प्रेम क्या है - साथ-साथ आप और हम एक ही मार्ग पर साथ चल रहे हैं; आप वक्ता का केवल अनुमोदन नहीं कर रहे हैं और यह नहीं कह रहे हैं, ‘‘हाँ, सुनने में अच्छा लग रहा है’’ - उपनिषद का, गीता का भी यही कहना है इत्यादि, यह सब बकवास है।

सर्वप्रथम, अपने अनुभवों, निष्कर्षों, विचारों के सम्बंध में किसी बात को स्वीकार न करें - मेरी भी नहीं। मैं तो एक पथिक हँू, मेरा महत्व नहीं है। हम आप और मैं, मिलकर पता लगाने जा रहे हैं कि क्या स्पष्ट है, क्या स्पष्ट नहीं है। हम लोग मिलकर जाँच कर रहे हैं, सन्देह कर रहे हैं, वक्ता का क्या कहना है... उसे हम कतई भी स्वीकार नहीं कर रहे हैं। यह मार्गदर्शन, निर्देश या सहायता के लिए कोई भाषण नहीं है; यह तो अत्यधिक नादानी की बात होगी। उस तरह की सहायता तो हमें पीढ़ी दर पीढ़ी मिलती रही है और इसके बावजूद हम जहां थे, वहीं हैं। हम जैसे अभी हैं वहीं से आरंभ करना है, अतीत में हम कहां थे अथवा भविष्य में हम क्या होंगे उससे नहीं। अभी हम जैसे हैं भविष्य में भी वैसे ही होंगे। हमारा लोभ, हमारा द्वेष हमारी ईष्र्या, हमारा प्रबल अंधविश्वास, किसी को पूजने की हमारी कामना - अभी तो हम यही हैं।

इस प्रकार हम मिलकर एक बहुत लंबे पथ पर चल रहे हैं। इसके लिए ऊर्जा चाहिये और हम इस मसले पर गौर करने जा रहे हैं कि प्रेम क्या है। बहुत गहरी और सूक्ष्म छानबीन हम इस बारे में भी करें कि - ऊर्जा क्या है। आपकी प्रत्येक चेष्टा ऊर्जा पर आधारित है। अभी जब आप वक्ता केा सुन रहे हैं, आप अपनी ऊर्जा लगा रहे हैं। घर के निर्माण में, वृक्ष लगाने में, कोई भी मुद्रा बनाने में, बात करने में, इन सबको लिए ऊर्जा की आवश्यकता है। कौवे की काँव-काँव, सूर्योदय और सूर्यास्त; यह सब कुछ ऊर्जा है। जन्म लेते ही बच्चे का रोना ऊर्जा का ही अंग है। वायलिन बजाना, बोलना, विवाह करना, यौन क्रिया - धरती की हर बात में ऊर्जा आवश्यक है।

अतः हम पूछते हैं: ऊर्जा क्या है? यह है वैज्ञानिक प्रश्नों में से एक। वैज्ञानिक कहते हैं- ऊर्जा पदार्थ है। हो सकता है कि वह पदार्थ हो, पर उसके पहले, मूलभूत ऊर्जा क्या है? उसका उद्गम स्रोत क्या है? किसने इस ऊर्जा का सृजन किया? सावधान, यह नहीं कह दें कि ईश्वर ने.... और ऐसा कह कर चल दीजिए। ईश्वर को मैं नहीं मानता, वक्ता का कोई ईश्वर नहीं है। इतना स्पष्ट है न?
तो, ऊर्जा क्या है? हम पता लगा रहे हैं, वैज्ञानिकों के कथन को, हम स्वीकार नहीं कर रहे हैं। और यदि आप कर सकें तो जो कुछ भी प्राचीन लोगों ने कहा है, हम उस सब को त्याग दें- छोड़ दें उन्हें, राह के किनारे छोड़कर हम साथ-साथ आगे बढ़ें।

आपका मस्तिष्क, जो एक पदार्थ है, दस लाख वर्षों के एकत्रित अनुभवों का भण्डार है, और उस तमाम विकास का अर्थ है ऊर्जा। और मैं स्वयं से पूछ रहा हूं- आप स्वयं से पूछ रहे हैं, क्या कोई ऊर्जा है जो ज्ञान के क्षेत्र में अर्थात् विचार के क्षेत्र में चालित और आबद्ध नहीं है? क्या कोई ऐसी ऊर्जा है जो विचार की गतिविधि से परे है?

विचार आपको प्रबल ऊर्जा देता है-प्रत्येक सुबह नौ बजे आॅफिस जाने के लिए, पैसा अर्जित करने के लिए, ताकि आप बेहतर घर बना लें। अतीत के संबंध में विचार, भविष्य का विचार, वर्तमान की योजना बनाना, इस तरह विचार प्रचण्ड ऊर्जा  देता है। धनी बन जाने के लिए आप प्रबल अग्निशिखा के वेग की भांति कार्य करते हैं। विचार ऊर्जा उत्पन्न करता है। अतः अब हमें विचार के स्वरूप का ही गहराई से पता लगाना है।
विचार ने इस समाज को योजनाबद्ध किया है, इसने इस संसार को विभाजित कर दिया है - साम्यवादी, समाजवादी, जनतंत्रवादी, गणतंत्रवादी, थलसेना, जलसेना, वायुसेना - ना केवल देश से निकाल बाहर करना वरन् वध करना भी शासकों-सैनिकों का कार्य है। इस प्रकार हमारे जीवन में विचार बड़ा ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि विचार के बिना हम कुछ भी नहीं कर सकते। हर चीज विचार की प्रक्रिया में निहित है। तो विचारणा क्या है? आप पता लगाईए, मेरी बात ही नहीं सुनिए। वक्ता ने तो इस पर बहुत चर्चा की है, इसलिए उसकी किताबें नहीं देखिए। यह नहीं कहिए, यह सब मैं पहले सुन चुका हूं। यहां आप समस्त किताबों को, अब तक आपने जितनी सारी चीजें पढ़ी हैं, सबको भुला दीजिए। यह इसलिए कि इस पर प्रत्येक बार बिलकुल नये ढंग से हम गौर करें।

विचारणा या विचारना ज्ञान पर आधारित है। और हमने असीम ज्ञान एकत्र कर लिया हैः कैसे हम एक दूसरे को बेच डालें, एक दूसरे का शोषण किस प्रकार करें, ईश्वरों का और मन्दिरों का निर्माण कैसे करें आदि हम जानते हैं।

बिना अनुभव के ज्ञान नहीं हो सकता है। अनुभव - स्मृति के रूप में मस्तिष्क में संग्रहित ज्ञान - यही विचार का प्रारंभ है। अनुभव सदैव सीमित है, क्योंकि आप इसमें और-और जोड़ रहे हैं। इस प्रकार अनुभव सीमित है, ज्ञान सीमित है, स्मृति सीमित है। अतः विचार सीमित है। ईश्वर, जिन्हें विचारों ने निर्मित किया है- आपके ईश्वर, आपकी विचारणा सदैव सीमित रहेंगें। सीमितता से हम उद्गम की, ऊर्जा की खोज का प्रयास करते हैं - आप समझ रहे हैं न? हम उद्गम, सृष्टि का प्रारंभ खोजने की कोशिश करते हैं।
विचार ने भय का निर्माण किया। ठीक? आगे चलकर क्या होगा, क्या आप इससे भयभीत नहीं हैं? नौकरी कहीं खोे न दें? परीक्षा में असफल ना हो जाएं, सफलता की सीढ़ी पर शायद ऊपर न चढ़ पाएं? और आप भयभीत हैं कि आप अपनी कामनाओं की पूर्ति नहीं कर पाए, अकेले खड़े रह पाने में असमर्थ हैं, आप स्वयं में एक ताकत नहीं बन पाए। आप हमेशा किसी न किसी पर निर्भर रहते हैं, और यह बात प्रचण्ड भय उत्पन्न करती है।

हमारे नित्य जीवन का यही तथ्य है कि हम भयभीत लोग हैं और इसी से सुरक्षा चाहते हैं, इसी से भय उत्पन्न होता है। भय प्रेम को विनष्ट कर देता है। जहां भय है वहां प्रेम का अस्तित्व हो ही नहीं सकता। भय स्वयं में ही एक प्रबल उर्जा है। प्रेम का भय से कोई संबंध ही नहीं है- वे एक दूसरे से पूर्णतया अलग हैं।
तो भय का उद्गम क्या है? इस सब पर प्रश्न करना ही जीवन्तता है। विचारणा ने भय उत्पन्न किया है। भविष्य, अतीत के संबंध में विचार, वातावरण से शीघ्रतापूर्वक समायोजित नहीं हो पाना, शायद कहीं कुछ हो न जाये, मेरी पत्नी कहीं मेरा परित्याग न कर दे अथवा कहीं उसकी मृत्यु ना हो जाए, तब मैं बिल्कुल अकेला रह जाऊंगा- मैं तब क्या करूंगा? मेरे अनेक बच्चे हैं; इसलिए किसी से पुनर्विवाह कर लेना बेहतर होगा, कम से कम वह मेरे बच्चों की देखभाल तो करेगी- ऐसे ही और विचार। यह है अतीत पर आधारित भविष्य के संबंध में विचारणा। इस प्रकार विचार और समय इसमें निहित है- भविष्य के सबंध में विचार, भविष्य अर्थात् आने वाला कल। वह विचारणा ही भय का कारण है। इस प्रकार समय और विचार भय के केन्द्रीय तत्व हैं।

तो जीवन के प्रधान तत्व हैं, समय और विचार। समय आन्तरिक और बाहरी दोनों है। भीतरी मैं यह हूं, मैं वह बनूंगा और बाहरी। और समय है विचार - ये दोनों ही गतियां हैं।
मृत्यु, पीड़ा, चिन्ता, दुख, एकाकीपन, हताशा - इन तमाम भयावह स्थितियों से मैं गुजरता हूं - क्या स्थान है इनका मेरे जीवन में? तमाम तीव्र पीड़ाओं से अपने जीवन में आदमी गुजरता है, बस यही है हमारी जिन्दगी? मैं पूछ रहा हूं: क्या आपकी जिन्दगी बस इतनी ही है?

यही है आपका जीवन। आपकी चेतना जिन अन्तर्वस्तुओं से निर्मित है, वे हैं आपकी सोच, आपकी परंपरा, आपकी शिक्षा, आपकी जानकारी, आपका भय, आपका अकेलापन। आप सावधानी से गौर करके देख लीजिए। यही हैं आप। आपकी व्यथा, आपका दर्द, आपकी चिन्ता, आपका अकेलापन, आपका ज्ञान- यह सब प्रत्येक मनुष्य की साझा अवस्था है। यह एक तथ्य है। पृथ्वी का हर आदमी, पीड़ा, कष्ट, चिन्ता, झगड़े, प्रलोभन, इसकी कामना, इसकी उपेक्षा आदि से गुजरता है। अतः आप एक व्यक्ति नहीं हैं। आप एक पृथक प्राण, एक प्रथक आत्मा नहीं हैं। आपकी चेतना वही है- शारीरिक रूप में ही नहीं, वरन मनोवैज्ञानिक रूप में - जो संपूर्ण मानवजाति की चेतना है।

हम पता लगाने की, छानबीन करने की कोशिश कर रहे हैं कि जीवन क्या है। हम कह रहे हैं कि जब तक किसी भी प्रकार का भय है, कोई भी दूसरी चीज अस्तित्व में नहीं आयेगी। अगर किसी भी प्रकार की आसक्ति है, दूसरा अस्तित्व में आयेगा ही नहीं और वह दूसरा है प्रेम। यानि किसी भी प्रकार की आसक्ति हो तो प्रेम असंभव है।

अतः हम गौर करने जा रहे हैं कि संसार क्या है, और मृत्यु क्या है। हम इनक पता लगा रहे हैं। हम सभी मृत्यु से इस कदर भयभीत क्यों हैं। आप जानते हैं मरने का क्या अर्थ है। क्या आपने दर्जनों लोगों को मरते, घायल होते नहीं देखा है? क्या कभी आपने गहराई से पता लगाया है कि मृत्यु क्या है? यह प्रश्न बड़ा ही महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण जितना कि यह प्रश्न कि जीवन क्या है? हम लोगों ने कहा कि जीवन है यही सब व्यर्थ की बातें-जानकारी, प्रतिदिन नौ बजे आफिस जाना आदि, विवाद, संघर्ष, इसको नहीं चाहना, उसकी कामना रखना। जीवन क्या है शायद हम जानते हैं, हमने गंभीरतापूर्वक कभी भी यह पता नहीं लगाया कि मरण क्या है?

क्या है मरण? निश्चित ही मृत्यु एक असाधारण चीज होनी चाहिए। प्रत्येक चीज आपसे ले ली जाती है: आपकी आसक्ति, आपका पैसा, आपकी पत्नी, आपके बच्चे, आपका देश, आपके अन्धविश्वास, आपके तमाम गुरू, आपके समस्त भगवान। आपकी यह कामना हो सकती है कि कि आप इन सभी को दूसरी दुनिया में लेते जाएं, पर आप ऐसा कर ही नहीं सकते। अतः मृत्यु कहती है: पूर्णतया अनासक्त हो जाएं। मृत्यु जब आती है तो ठीक यही होता - किसी भी व्यक्ति पर आप निर्भर नहीं रहते - कुछ भी नहीं रह जाता। फिर भी, आप शरीर धारण करेंगे, ऐसा आप विश्वास करते हैं। यह कल्पना बहुत ही आराम पहुंचाने वाली है, पर यह यथार्थ नहीं है।
हम लोग पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं, जीवित रहते हुए मरने का क्या अर्थ है - आत्महत्या कर लेना नहीं; उस तरह की मूर्खता के संबंध में मैं बात नहीं कर रहा। मृत्यु का क्या अर्थ है , मैं खुद ही पता लगाने की कोशिश कर रहा हूं। जिसका आशय है, क्या खुद अपने समेत आदमी ने जो कुछ भी निर्मित किया है - उस सब से आदमी पूरी तरह मुक्त हो सकता है?

मरने का अर्थ क्या है? प्रत्येक चीज का परितयाग। मृत्यु अत्यधिक तेज छुरे से काटकर आपको तमाम आसक्तियों से, आपके ईश्वर से, देवताओं से, अन्धविश्वासों से, आराम की कामना से, अगले जीवन आदि से बिलकुल अलग कर देती है। मैं पता लगाने जा रहा हूं कि मरण का अर्थ क्या है? क्योंकि यह उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि जीवन। तो हम किस प्रकार पता लगाएंगे, सचमुच में, सैद्धांतिक रूप में नहीं, क्या अर्थ है मरण का? मैं सचमुच पता लगाना चाहता हूं, वैसे ही जैसे आप पता लगाना चाहते हैं कि। मैं आपके लिए बोल रहा हूं, अतः सो मत जाइए। मरण का क्या अर्थ है? यह प्रश्न कीजिए अपने आप से। हम युवा हैं या अधिक वृद्ध यह प्रश्न सदैव कायम है। इसका अर्थ है पूरी तरह से मुक्त हो जाना, आदमी ने जो भी गढ़ा है उन सबों से पूरी तरह अनासक्त हो जाना। कोई आसक्ति नहीं, कोई भविष्य नहीं, कोई अतीत नहीं। जीवित रहते हुए मृत जो जाना - इसके सौन्दर्य को, इसकी श्रेष्ठता को, इसकी असाधारण शक्ति को आप नहीं देख रहे हैं। इसका अर्थ क्या है, आप समझ रहे हैं? आप जीवित हैं, लेकिन प्रत्येक क्षण आपका मरण हो रहा है और इस प्रकार पूरे जीवन में आप किसी भी चीज से आसक्त नहीं।  यही है अर्थ मरण का।
इस प्रकार का मरण है जीवन। आप समझ रहे हैं? जीवित होने का अर्थ है प्रत्येक दिन अपनी आसक्ति की प्रत्येक चीज का परित्याग करते जा रहे हैं। क्या आप यह कर सकते हैं? बड़ा ही स्पष्ट, सरल यथार्थ है, पर विस्मयकारी हैं इसके गूढ़ार्थ। इस प्रकार प्रत्येक दिन नया दिन है। प्रत्येक दिन आपकी मृत्यु हो रही है और आप पुर्नजीवित हो रहे हैं। इसमें विस्मयकारी ओजस्विता है, उर्जा है, क्योंकि आप अब किसी भी चीज से भयभीत नहीं हैं। ऐसी कोई भी चीज नहीं जो आपको आहत कर सके। आहत होने का अस्तित्व ही नहीं ।
आदमी ने जो कुछ भी गढ़ा है, उन सबों का पूर्णतया परित्याग करना होगा। यही है मरण का अर्थ। क्या आप ऐसा कर सकते हैं? क्या आप ऐसा प्रयास करेंगे? क्या आप इसक प्रयोग करेंगे? महज एक दिन नहीं, वरन प्रत्येक दिन। नहीं, श्रीमान, आप ऐसा नहीं कर पाएंगे, इसके लिए आपका मस्तिष्क प्रशिक्षित नहीं है, क्योंकि आपकी शिक्षा, आपकी परंपराओं, आपकी पुस्तकांे और आपके प्रोफेसरों द्वारा आपका मस्तिष्क गहराई से प्रशिक्षित है, गंभीर रूप से संस्कारित है। इसके लिए यह पता लगाना आवश्यक है कि प्रेम क्या हे। प्रेम और मरण बिलकुल साथ साथ कार्यशील हैं। मृत्यु कहती है, मुक्त हो जाओ, मुक्त हो जाओ आसक्ति से, आप अपने साथ कुछ भी नहीं ले जा सकते। और प्रेम कहता है, प्रेम कहता है - इसके लिए कोई शब्द नहीं है। प्रेम का अस्तित्व मुक्त अवस्था में ही है। आपको पत्नी से, नयी लड़की से, अथवा नये पति से मुक्ति नहीं वरन विपुल शक्ति, ओजस्विता, पूर्ण मुक्ति की उर्जा की अनुभूति।

जे कृष्णमूर्ति  पुस्तक: अन्तिम वार्ताएं अध्याय: मद्रास वार्ता, 1 जनवरी, 1986 पृष्ठ: 129 से 135