6 Jan 2010

क्या रूपान्तरण जैसी कोई चीज होती है? क्या है जो बदलता है?



जब आप अवलोकन करते हैं, सड़क पर धूल देखते हैं, यह देखते हैं कि राजनीतिज्ञ कैसा व्यवहार कर रहे हैं, अपनी पत्नि के प्रति... अपने बच्चों के प्रति अपना ही बर्ताव देखते हैं इसी तरह की अन्य बातें, तो यही रूपान्तरण होता है। क्या आप समझे? अपनी दिनचर्या को तरतीब देना, कार्यों में स्वरों को साध लेने-सा सामन्यीकरण ही रूपान्तरण है; कुछ ऐसा नहीं जो बहुत ही असामान्य या जो दुनिया के बाहर की बात हो। जब कोई ”स्पष्ट रूप से कुछ नहीं देख पाता“ और वह तर्क-युक्ति संगत रूप से इसके प्रति जागरूक हो जाता है और इसे बदलता है, अपनी आदत को तोड़ता है, अपनी अस्पष्टता को विराम देता है, यही रूपान्तरण है। यदि आपको ईष्र्या या जलन हो रही है तो इसे देखें, इसे फूलने-फलने का मौका दिये बिना इसे तुरन्त बदलें, यह रूपान्तरण होगा। जब आपको लोभ, हिंसा, महत्वाकांक्षा पकड़ लेते हैं, या जब आप खुद को किसी पवित्र आध्यात्मिक व्यक्ति की तरह बनाना चाहते हैं तो यह देखें कि आपकी ऐसी सोच. आपका ऐसा होना कितनी निरर्थक दुनियां की रचना कर रहा है। मुझे नहीं पता आप इस सब के प्रति जागरूक हैं या नहीं। प्रतियोगिता विश्व का विनाश कर रही है। दुनियां रोज ब रोज अधिकाधिक प्रतियोगी होती जा रही है, अधिकाधिक आक्रामक होती जा रही है और अगर आप अपनी यह प्रवृत्ति तुरन्त बदलते हैं तो यह रूपान्तरण है। यह आप इस समस्या में बहुत गहराई तक जाएं, तो आप स्पष्टतः पाएंगे कि विचार प्रेम को नकारता है। इसलिए किसी को भी यह प्रश्न उठाना चाहिए, तलाश या पता करना चाहिये कि क्या विचार का अन्त हो सकता है?, क्या समय का अन्त हो सकता है? हमें इन प्रश्नों पर दार्शनिक अंदाज में मुद्राएं नहीं बनानी हैं, इस पर चर्चाएं-बहसें नहीं करनी, पर यह ईमानदारी से पता करना है। वास्तव में सच्चे रूप में, यही रूपान्तरण है, जब आप रूपान्तरण की गहराई में जाते हैं तो आप पाएंगे की रूपान्तरण का मतलब है ‘‘किसी भी तरह के कुछ होने’’, ‘‘तुलना’’ के विचार का अभाव। यह है अस्तित्व का पूर्णतया नाकुछ हो रहना।

1 Jan 2010

सम्पूर्ण प्रयोगशाला आपके भीतर ही है



जबकि सम्पूर्ण प्रयोगशाला आपके भीतर ही है तो आप किसी अन्य आदमी का अध्ययन क्यों करना चाहते हैं? अपने आप का अध्ययन करें, आप ही सारी मानवता हैं, वृहत दूरूहपन द्वंद्वात्मकता, अत्यंतिक संवेदना आप ही हैं। आप इस बात का अध्ययन क्यों करना चाहते हैं कि कोई अन्य आदमी के बारे में क्या कहता है। और आप ही तो हैं जो अन्य आदमी से संबंधित हैं, यही तो समाज है। आपने ही तो यह भयावह, कुरूप दुनिया गढ़ी है जो अब पूरी तरह अर्थहीन होती जा रही है, यही तो वजह है कि दुनियां भर के युवा विद्रोही हो रहे हैं। मेरे लिये यह एक अर्थहीन जीवन है। आदमी ने जो यह दुनियां गढ़ी है उसकी अपनी ही मांगों का निक्षेप या फल है, उसकी अपनी ”तुरन्त चाहिये” तात्कालिक प्राथमिकताओं, आदतों, महत्वाकांक्षाओं, लाभ और ईष्र्या का निचोड़ है। आप सोचते हैं कि आप मानव के संबंध में सभी पुस्तकों का अध्ययन कर लेंगे और समाज में जाएंगें तो आप अपने आपको समझ सकेंगे। लेकिन क्या यह ज्यादा सरल और सहज नहीं है कि आप अपने से ही शुरूआत करें?

30 Dec 2009

अन्य लोगों से अपनी तुलना करना छोड़ें



जब मैं अपनी तुलना अन्य लोगों से नहीं करता तब मैं समझ सकता हूं कि ”मैं क्या हूं?“ जीवन भर, बचपने से.. स्कूली उम्र से लेकर हमारे मरने तक, हमें सिखाया जाता है कि हम अपनी तुलना अन्य लोगों से करें, जबकि जब भी मैं किसी से अपनी तुलना करता हूं तो मैं अपने आप को ही नष्ट कर रहा होता हूं। स्कूल में, एक साधारण स्कूल में भी जहां कई लड़के होते हैं उनमें जो कक्षा में माॅनीटर है... वह असल में क्या है? आप लड़के को नष्ट कर रहे हैं। यही सब हम जिन्दगी भर करते हैं। तो अब... क्या हम बिना तुलना किये जी सकते हैं - बिना अन्य किसी से भी तुलना किये? इसका मतलब है अब कुछ भी ऊंचा या नीचा नहीं होगा, अब ऐसा नहीं होगा कि आपकी नजर में कोई एक श्रेष्ठ हो उच्च हो और कोई एक, हीन और निकृष्ट। आप वास्तव में वही हैं, जो कि आप हैं और ”जो आप हैं“ उसे जानने के लिए यह तुलना करने का तरीका आपको छोड़ना होगा, यह प्रक्रिया अनिवार्यतः समाप्त करनी होगी। यदि मैं हमेशा अपने को किसी संत या किसी शिक्षक या किसी बिजनेसमेन, लेखक, कवि या अन्य लोगों से तुलना में रखूं, तो मेरे साथ क्या होगा? मैं क्या कर रहा हूं? मैं इनसे तुलना कर रहा हूं ... कुछ पाने के अनुक्रम में, किसी उपलब्धि की दिशा में या कुछ होने के चक्कर में और यदि मैं किसी से अपनी तुलना नहीं करता तो... तब मैं यह जानना शुरू करता हूं कि वास्तव में ”मैं क्या हूं“। मैं क्या हूं, यह जानने की शुरूआत अधिक मोहक है, ज्यादा रूचिकर है और अपने को जानना, सभी मूर्खतापूर्ण बेवकूफी भरी तुलनाओं के पार ले जाता है।

29 Dec 2009

हमारा ”स्व“ या “आत्म” कई खण्डों वाली पुस्तक है




अपने आप को जानने-समझने के लिए धैर्य, सहनशीलता, जागरूकता चाहिये क्योंकि हमारा स्व या आत्म अनेक खण्डों वाले महाग्रंथ के समान है जो केवल एक ही दिन में नहीं पढ़ा जा सकता लेकिन यदि आप पढ़ना शुरू करें तो आपको इसका प्रत्येक शब्द, प्रत्येक वाक्य, प्रत्येक पैराग्राफ अपरिहार्य रूप से पढ़ना चाहिये क्योंकि इसके प्रत्येक शब्द, वाक्य और प्रत्येक पैराग्राफ में आपकी सम्पूर्णता के बारे में इशारे हैं। इसकी शुरूआत ही इसका अंत भी है। यदि आप जानते हैं कि कैसे पढ़ा जाता है तो आप परमज्ञान, परम समझदारी पा सकते हैं।

28 Dec 2009

क्या मैं स्वयं ही जाग्रत हो सकता हूँ ?



वो चाहे खुशगवार हों या पीड़ाजनक, अपने आपको जागृत रखने के लिए हम अनुभवों पर निर्भर रहते हैं; किसी भी प्रकार की चुनौती हो हम अपने आपको जागा हुआ रखना चाहते हैं। जब कोई यह सच जान जाता है कि चुनौतियों और अनुभवों पर निर्भरता, दिमाग को केवल और ज्यादा कुंद या जड़ बनाती है और यह निर्भरता हमें जागे रहने नहीं रहने देती..... जब कोई यह समझ जाता है कि हमने हजारों युद्ध लड़ें हैं और एक बात भी नहीं सीखी कि हम अपने पड़ोसी को कल किसी क्षणिक सी उत्तेजना पर कत्ल कर सकते हैं... तब कोई कह सकता है कि जागे जागृत रहने के लिए यह अनुभव और चुनौतियों पर निर्भरता हम क्यों चाहते हैं? और क्या यह संभव है कि बिना किसी चुनौती के हम होशपूर्ण-जागृत-जागे रह सकें? यह ही मुख्य-असली प्रश्न है। हम चुनौतियों, अनुभवों पर यह सोच कर निर्भर रहते हैं कि ये हमें रोमांच, ज्यादा जिन्दापन, और ज्यादा त्वरितता देंगे, इनसे हमारा दिमाग और तेज होगा, पर इनसे ऐसा नहीं होता। तो यदि संभव हो तो मैं अपने आप से कहूं सम्पूर्ण रूप से जागृत-सचेत-होशपूर्ण के लिए.... आंशिक या टुकड़ों में नहीं या अपने अस्तित्व के कुछ बिन्दुओं पर ही नहीं... पर पूरी तरह जागृति, क्या बिना किसी चुनौती के, बिना किसी अनुभव के द्वारा। इसका मतलब ये भी है कि क्या मैं खुद ही प्रबुद्ध हो सकता हूँ, खुद को ही जगाये रह सकता हूँ बिना किसी बाहरी प्रकाश पर निर्भर हुए? इसका मतलब यह नहीं है कि यदि मैं किसी संवेदना उत्तेजना पर निर्भर नहीं रहकर, निरर्थक हो रहूंगा। क्या मैं कोई ऐसी रोशनी हो सकता हूँ जो बाह्य-उन्मुखी ना हो? यह सब जानने समझने के लिए हमें अपने में ही बहुत गहरे जाना होगा, मुझे खुद को ही पूरी तरह जानना होगा, सम्पूर्णतः.... अपने भीतर का एक-एक कोना मेरा जाना समझा होना चाहिये, कोई भी ऐसा कोना नहीं होना चाहिए जो दबा, ढंका, छिपा या रहस्यपूर्ण हो। सब कुछ खुला होना चाहिए। हमें अपने स्व, अपनत्व के, हमारेपन के सम्पूर्ण क्षेत्र के प्रति जागृत होना चाहिये, जो कि हमारी वैयक्तिता और हमारी सामाजिकता की चेतना है। यह जागरण केवल तब हो सकता है जब हमारा मन, वैयक्तिक और सामाजिक चेतना की परिधि के पार जाये तभी कोई संभावना है कि कोई अस्तित्व स्वतः प्रबुद्ध हो सके और बाह्य-उन्मुखी न हो।

24 Dec 2009

कर्म क्‍या है ?




वास्तव में इस तरह की कोई चीज नहीं, जिसे कि हम कर्म कहते हैं। कारण और प्रभाव दो अलग या भिन्न चीजें नहीं हैं। आज का प्रभाव ही कल का कारण है। ऐसा कोई अलग-थलग पड़ा हुआ ”कारण जैसा कुछ“ नहीं होता जो प्रभाव पैदा करे, कारण और प्रभाव अन्र्तसंबंधित हैं। ”कारण और प्रभाव के नियम“ जैसी कोई चीज वास्तव में नहीं होती, जिसका मतलब यह भी है कि ऐसी भी कोई चीज नहीं होती जिसे कर्म कहें। हमारे लिये, कर्म का मतलब है एक परिणाम जिसके पीछे पहले कोई कारण रहा हो, पर प्रभाव और कारण के बीच के अन्तराल में जो होता है वो है समय। इस समय अन्तराल में अनन्त प्रकार के भारी बदलाव होते रहते हैं जिससे हमें हर बार एक सा ही प्रभाव प्राप्त नहीं होता। और प्रभाव निरंतर नये कारण पैदा करते रहते हैं जो कि मात्र प्रभाव का परिणाम ही नहीं होते। अतः यह ना कहें कि मैं कर्म में विश्वास नहीं करता, हमारा यह सब कहने का यह दृष्टिकोण नहीं है। कर्म का आशय है, बहुत ही सहज रूप से, एक ऐसा कृत्य जिससे एक परिणाम भी जुड़ा हुआ है, और यह परिणाम पुनश्च एक कारण की तरह भी है। यदि आम की गुठली को देखें उसमें आम का वृक्ष होना निहित है लेकिन मानव मन के साथ ऐसा ही कुछ नहीं है। मानव मन में अपने आप में रूपान्तरण और तत्काल समझबूझ की सामथ्र्य उसे किसी भी कारण से हमेशा अलग रख सकती है।