4 Dec 2009

क्या दिमाग को शांत किया जा सकता है?



ध्यान यह पता करना है कि क्या मस्तिष्क या दिमाग को, उसकी सभी गतिविधियों सहित, उसके सभी अनुभवों सहित, पूरी तरह शांत, खामोश किया जा सकता है? बलपूर्वक नहीं, क्योंकि जब जबर्दस्ती की जाती है, वहां द्वंद्व पैदा होता है।
स्वत्व, हमारी अपनी सत्ता कहती है ”मुझे अद्भुत अनुभव प्राप्त करना है, इसलिए मुझे अपने दिमाग को शांत रखना ही है।“, लेकिन हमारा स्वत्व ऐसा नहीं कर पाता। लेकिन यदि हम जिज्ञासा करें, अवलोकन करें, विचार की सारी गतिविधियों को सुनें, उसकी शर्तों, उसकी अपेक्षाओं लक्ष्यों, उसके भयों, उसके सुखों को देखें, यह देखें कि दिमाग किस तरह काम कर रहा है तब आप पाएंगे कि मस्तिष्क असाधारण रूप से शांत है। यह शांति, नीरवता नींद नहीं है अपितु यह अत्यंत सक्रियता है और इसलिए शांति है। एक बहुत बड़ा डायनेमो जो अच्छी तरह काम कर रहा हो वह बमुश्किल बहुत ही कम आवाज करता है, केवल तब जब घर्षण होता है, द्वंद्व होता है वहीं पर शोर होता है।

3 Dec 2009

अहं की गतिविधियाँ समझना



जब तक कि अहं की कोई भी गतिविधि है, ध्यान संभव नहीं। यह शाब्दिक रूप से नहीं बल्कि असलियत में जानना समझना बहुत ही जरूरी है। ध्यान मन को अहं की सारी गतिविधियों, स्व, मैं मेरे की सारी गतिविधियों से खाली करने की प्रक्रिया है। यदि आप अपने अहं की गविविधियों, क्रिया-कार्य-कलापों को नहीं समझते तो आपका ध्यान आपको आत्म वंचना (खुद ही अपने को ही धोखा देना) और विक्षिप्तता की ओर ले जायेगा। तो यह जानने के लिए कि ध्यान क्या है? आपको अपन अहं के क्रिया-कार्य-कलापों-गतिविधियों को समझना होगा।
आपके अहं या स्व के पास हजारों सांसारिक संवेदनाएं, अहसास, बौद्धिक अनुभव हैं पर यह इन सब से बोर हो चुका है क्योंकि इन सबका कोई अर्थ नहीं है। वृहत, अधिक विशाल, परा शक्तियों के अनुभवों से समृद्ध करने की इच्छा भी आपके ”अहं“ का ही एक हिस्सा है।

30 Nov 2009

प्रत्येक विचार की जड़ तक जाना



विचार को खत्म करने के लिए हमें सर्वप्रथम तो सोचने विचारने के मशीनी तरीके को समझना होगा। हमें अपने भीतर, गहरे तक विचार को ही पूरी तरह समझना होगा। हमें प्रत्येक विचार की जॉंच करनी होगी, किसी भी विचार को बिना समझे जाने दिये। कोई भी विचार ऐसा नहीं होना चाहिए जो बिना हमारी जॉंच, हमारे ज्ञान और समझ के बिना हमारे मन में हो। इसके लिए हमारा मस्तिष्क, मन और हमारा सम्पूर्ण अस्तित्व बहुत ही सावधान, सचेत होना चाहिए।
जब हम विचार की जड़ तक जाते हैं, पूरी तरह उसके अंत तक जाते हैं, उस समय हम देखेंगे कि विचार स्वयं के द्वारा ही समाप्त होता है। हमें इसके खात्मे के लिए कुछ अतिरिक्त नहीं करना होता क्योंकि विचार एक स्मृति या याद है। स्मृति अनुभव के छोड़े हुए निशान या चिन्ह हैं और जब कि कि अनुभव को पूरी तरह, सम्पूर्ण रूप से नहीं समझा गया होता, वह निशान छोड़ता है। यदि हम अनुभव को सम्पूर्णता में अनुभव करते हैं, जीते हैं तब उस पल अनुभव अपने पीछे कोई निशानी नहीं छोड़ता। तो यदि हम प्रत्येक विचार की जड़ तक जायें और देखें कि निशान हैं और यह निशान तथ्य रूप में हैं तो हमें इस तथ्य को उघाड़ना होगा, उसे खोलना होगा और उसकी विचार श्रंखला, विचार प्रक्रिया को समझकर उसके अंत तक जाना होगा, ताकि हमारे मन में प्रत्येक विचार, प्रत्येक अहसास हमारी अपने द्वारा समझा बूझा हुआ हो।

Pursuing every thought to the root
To end thought I have first to go into the mechanism of thinking. I have to understand thought completely, deep down in me. I have to examine every thought, without letting one thought escape without being fully understood, so that the brain, the mind, the whole being becomes very attentive. The moment I pursue every thought to the root, to the end completely, I will see that thought ends by itself. I do not have to do anything about it because thought is memory. Memory is the mark of experience; and as long as experience is not fully, completely, totally understood, it leaves a mark. The moment I have experienced completely, the experience leaves no mark. So if we go into every thought and see where the mark is and remain with that mark as a fact—then that fact will open and that fact will end that particular process of thinking, so that every thought, every feeling is understood.
[Krishnamurti on Education, pp 119-120]

28 Nov 2009

”जेकृष्णमूर्ति इन हिन्दी“ ब्‍लॉग, वेबदुनिया के विचारमंथन, ब्‍लॉग चर्चा में

रवीन्द्र व्यास जी ने इस बार अपनी ब्‍लॉग चर्चा में इस ब्‍लॉग सम्बन्धित सूचना को अपने पाठकों तक पहुंचाने का विषय बनाया है। कसी हुई भाषा में एक पृष्ठ की पाठ्य सामग्री में ही उन्होंने जे कृष्णमूर्ति के धारदार दर्शन का परिचय प्रदर्शित किया है। व्यास जी के इस प्रयास को साधुवाद, आभार, धन्यवाद! वेबदुनिया के विचारमंथन, ब्‍लॉग चर्चा का ये लिंक है



  • हि‍न्‍दी भाषा में उनकी अंग्रेजी पुस्‍तकों के अनुवाद तो मि‍लते हैं पर इन्‍टरनेट पर कोई वेबसाईट या ब्‍लॉग नहीं जो जे कृष्‍णमूर्ति‍ द्वारा कहे गये वांग्‍मय का परि‍चय हि‍न्‍दी में देता हो वो भी सरल सहज रूप में, ”जेकृष्णमूर्ति इन हिन्दी“ यह प्रथम प्रयास है।
  • ”जेकृष्णमूर्ति इन हिन्दी“ यह ब्‍लॉग उनके ही एक प्रेमी द्वारा अंग्रेजी से हि‍न्‍दी में सरल अनुवाद कर जीवन्‍त अस्‍ि‍त्‍तत्‍व में है, कि‍सी अनुवादि‍त पुस्‍तक के अंशों से नहीं ।
  • इस ब्‍लॉग पर टि‍प्‍पणि‍याँ इसलि‍ए नि‍ष्‍क्रय हैं क्‍योंकि‍ ये इस ब्‍लॉग का ध्‍येय नहीं ।

27 Nov 2009

खोज की समाप्ति End of search



आपको इस नीरवता की अवस्था में आना ही चाहिए अन्यथा आप वास्तव में धार्मिक व्यक्ति नहीं हैं, इसी अमित मौन के पार वह है जो पवित्र पावन है।
धार्मिक मन वह मन है जो अज्ञात में प्रवेश कर चुका है, और आप अज्ञात में छलांग लगाकर नहीं आ सकते, आप सावधानीपूर्वक गणित बैठाकर अज्ञात में प्रवेश नहीं कर सकते...
आप यह जानना ही चाहिये कि सत्य क्या है? क्योंकि यही वह चीज है जो महत्वपूर्ण और अर्थवान है, यह नहीं कि आप अमीर हैं या गरीब, आप खुशहाली शादीशुदा जिन्दगी जी रहे हैं या आपके बच्चे है या नहीं, क्यों वह सब समाप्त हो जायेगा, वहां निश्चित ही मृत्यु है। तो किसी भी विश्वास या मान्यता के किसी भी रूप के बगैर आपको सच खोजना ही पड़ेगा।
धर्म भलमनसाहत का अहसास है, वह प्रेम जो नदी की तरह है, जीवन्त, नित्य प्रवाहमान। इसी अवस्था में एक ऐसा क्षण आता है जिसमें आप पाएंगे कि अब कोई खोज शेष नहीं रही, और इस खोज की समाप्ति में ही उसकी शुरूआत है जो सर्वथा अनूठा है।

उस गड्ढे से निकलिये जो आपने अपने लिये स्वयं खोदा है...

ईश्वर की खोज, सत्य की खोज, सम्पूर्ण रूप से भले हो जाने के अहसास की खोज धर्म है - ना कि अच्छाई, नम्रता आदि गढ़ना विकसित करना धर्म है। मन की खोजों और चालाकियों से परे, किसी अनाम का अहसास, उसमें जीना, वही आपका अस्तित्व होना - यही सच्चा धर्म है। लेकिन आप यह तभी कर सकते हैं जब आप उस गड्ढे से निकले जो आपने अपने लिये खोदा है और जीवन की नदी की तरफ बढ़ें, तब जीवन के पास आपको संभालने का अपना आश्चर्यजनक तरीका है, क्योंकि तब आप खुद की संभाल की जिम्मेदारी अपने पास नहीं रखते। जीवन अपनी इच्छा से आपको जहां चाहे वहां ले जाता है क्योंकि आप उसी का हिस्सा हैं, तब आपको सुरक्षा की समस्या नहीं रहती, तब आपको यह समस्या नहीं रहती कि कौन आपके बारे में क्या कहता है और क्या नहीं कहता, और यही जीवन का सौन्दर्य है।

26 Nov 2009

हमारा जीवन Our Life






प्रश्न # किसी बात की सम्पूर्णता देखने से क्या आशय है? क्या यह कभी संभव है कि हम किसी गतिमान चलायमान चीज की सम्पूर्णता को महसूस कर सकें?


क्या आप इस प्रश्न को समझ रहे हैं? यह एक अच्छा प्रश्न है? तो क्या हम और आप मिलकर इस प्रश्न को बूझने की कोशिश करें?

जैसा कि हमने पहले प्रश्न की खोजबीन में कहा कि हमारी चेतना की सम्पूर्णता, जो चेतना ‘‘मैं’’ के रूप में केन्द्रीकृत है, स्व आत्म के रूप में, अहंवादी गतिविधि में, स्वकेन्द्रित कार्यव्यवहार में चलाय मान है, जो हमारी चेतना की सम्पूर्णता है। ठीक? अब क्या हमे इसे पूरी तरह से देख सकते है? बिल्कुल, हम देख सकते हैं। क्या यह कठिन है? तो बात ये है कि किसी की भी चेतना से ही उसके सभी पक्ष बनते हैं। ठीक? तो यह स्पष्ट हुआ?


तो मेरी ईर्ष्‍या मेरी राष्ट्रीयता, मेरे विश्वास मान्यताएं, मेरे अनुभव और इत्यादि आदि, यही उसके पक्ष या तत्व हैं जिसे चेतना कहते हैं।

इसके मूल में मैं हूं, आत्म हूं। ठीक? तो इस बात को अब पूरी तरह से देखते हैं। क्या आप ऐसा कर सकते हैं? बिल्कुल, आप ऐसा कर सकते हैं। जिसका मतलब है कि उसे पूरी अवधानता या, होश से देखना।


पुनः हम कदाचित ही किसी बात पर पूरा ध्यान देते हैं। तो अब हम एक दूसरे से कह रहे हैं कि: इस पक्षों इन तत्वों पर पूर्ण ध्यान देते हुए देखें। इस आत्म पर, इस स्व या मैं पर जो कि इसका निचोड़ है, मूल है इसे अवधान पूर्वक देखें, तो आप सम्पूर्णत्व देख पायेंगे।

इसके साथ ही प्रश्नकर्ता ने यह भी कहा है कि, जो कि रूचिकर भी है कि क्या यह कभी संभव है कि किसी चलायमान चीज की सम्पूर्णता को जाना समझा, महसूस किया जा सकता है? तो क्या आपकी चेतना के तत्व चलायमान हैं? यह अपनी ही सीमाओं में चल रहे हैं।


देखिये, चेतना में क्या चलायमान है? मोह, जुड़ाव, किसी से न जुड़ने का भय, वह भय कि मैं किसी से न जुड़ा तो कया होगा? जो क्या है? अपनी ही परिधि में गतिविधि, अपने ही सीमित क्षेत्र में गतिमान रहना। जो आप देख ही रहे हैं, जिसका आप निरीक्षण कर रहे हैं। तो आप देख सकते हैं जो सीमित ही है। अगर हम इसमें और जरा गहरे जायें, तो चैंकियेगा मत। तो क्या हमारी चेतना ही अपने तत्वों के साथ जी रही है? क्या आप मेरे प्रश्न को समझे? क्या मेरे विचार, ख्याल ही जिन्दा हैं? आपकी मान्यताएं ही जी रही हैं? तो क्या जी रहा है? क्या आप इस सब को समझ बूझ रहे हैं? किसी ने अनुभव किया, खुशी, दुख, भला, बुरा, तथाकथित बुद्धत्व - आपके पास सत्य का अनुभव या बुद्धत्व का अनुभव नहीं है.... ये अप्रासंगिक है। तो क्या वह अनुभव है जो आप जी रहे हैं? या उस अनुभव की याद है जो आप जी रहे हैं? ठीक? तो याद, न कि तथ्य। तथ्य यथार्थ तो जा चुका है। लेकिन वो जो स्मृति की गतिविधि... यादों का चलना है उसे हम जीना कह रहे हैं। तो अनुभव जो चले गये हैं बीत चुके हैं, निश्चित ही वही याद किये जा रहे होते हैं, और इस याद करने को ही हम जिन्दगी जीना कह रहे हैं। यह आप देख सकते हैं, पर वो नहीं जो बीत ही चुका है। मुझे आश्चर्य होगा यदि आप यह देख पायें?

तो हम जिसे जीना कह रहे हैं वो, वो चीज है जो हो चुका है, जा चुका है। देखिये श्रीमन्, आप क्या कर रहे हैं। जो कि जा चुका है और मृत है, हमारा मन बहुत ही मरा हुआ है, और इस सब की यादों को हम जीवन कह रहे हैं। यह हमारे जीवन की त्रासदी है। मुझे वो दोस्त याद है जो मेरा हुआ करता था, जो चला गया है, भाई, बहन, पत्नी, स्‍वर्गवासी माँ, ये सब याद हैं। तो क्या यह यादें जो उनके चित्रों को देखने से मैं याद कर रहा हूं यही जीना है। क्या आप समझे श्रीमन्? और यही है जिसे हम जीना या जीवन कहते हैं।

QUESTION: What does it mean to see the totality of something?  Is it ever possible to perceive the totality of something which is moving?

You understand the question?  A good question?  Shall we do it together?

As we said in the previous question in going into it, to perceive the totality of our consciousness, that consciousness is centred as the 'me', the self, the egotistic activity, self-centred movement, which is the totality of our consciousness. 

Right?  Now can we see that completely?  Of course we can. Is that difficult?  That is, one's consciousness is made up of all its content.  Right?  Is that clear? 

That is, my jealousy, my nationality, my beliefs, my experiences and so on and so on and so on, that is the content of this thing called consciousness. 
The core of that is me, the self. Right?  To see this thing entirely now. Right, sir?  Can you do it?  Of course you can.  Which means giving complete attention to it. 
Again we rarely give complete attention to anything. Now we are asking each other: give complete attention to this content which is at the very core of the self.  The self, the 'me', is the essence of that, and give attention to it, and you see the whole, don't you?

Now the questioner says also, which is interesting, which is, is it ever possible to perceive the totality of something which is moving?  Is the self moving?  Is the content of your consciousness moving?  It is moving within the limits of itself.  Right sir?  Are you following all this?  Am I talking to myself?

Sir, look, what is moving in consciousness?  Attachment, the fear of not being attached, the fear of what might happen if I am not attached?  Which is what?  Moving within its own radius, within its own limited area.  That you can observe.  So you can observe that which is limited.  I want to go into this a little bit, don't be shocked.  Is our consciousness with its content living?  You understand my question?  Are my ideas living?  Your belief living? So what is living?  Are you following this?  One has an experience, pleasant, unpleasant, noble, ignoble, so-called enlightened - you cannot have experience of truth, of enlightenment - that's irrelevant.  So is the experience that you have had living?  Or the remembrance of that experience is living?  Right?  The remembrance, not the fact.  The fact has gone.  But the movement of remembrance is called what is living.  You follow?  Come on, sirs, move.  So the experience, which has gone, of course, that is remembered, that remembrance is called living.  That you can watch, but not that which is gone.  I wonder if you see this?
So what we call living is that which has happened and gone.  See, sir, what you are doing.  That which has gone and dead, our minds are so dead, and the remembrance of all that is called living.  That is the tragedy of our life.  I remember the friends we have had, they have gone, the brothers, the sisters, the wives that are dead, the mothers, I remember.  The remembrance is identified with the photograph and the constant looking at it, remembering it, is the living.  You understand, sir?  And that is what we call living.