18 Nov 2009

मंत्र शब्द के अर्थ खो गये हैं





ध्यान क्या है? क्‍या यह दुनियाँ के शोर शराबे से पलायन है? क्‍या एक चुप्‍पा मन, एक शांति पूर्ण मन पाने की कोशिश है? इन सब प्रश्‍नों के बजाय.....आप पद्यतियों, विधियों का अभ्यास करते हैं जागरूक होने के लिए, अपने विचारों को नियंत्रण में रखने के लिए। आप आलथी-पालथी मार कर बैठ जाते हैं और किसी मंत्र को जपते हैं। ‘मंत्र’ शब्द का मूल अर्थ है कि ”कुछ होने का विचार मात्र भी न करना“, ”कुछ हो जाने के विचार मात्र से मुक्‍त रहना“,यह एक अर्थ है। ‘‘र्निदोष हो जाना’’ भी इसका अन्य अर्थ है, यानि सारी आत्मकेन्द्रित गतिविधियों को एक तरफ रख देना। यह मंत्र शब्द के मूल और वास्तविक अर्थ हैं। लेकिन हम दोहराते हैं, दोहराते हैं,.... अपने अहंकारपूर्ण उद्देश्यों, अपने स्वार्थों को सिद्ध करने के लिए जपे जाते हैं इस लिए मंत्र शब्द का अर्थ खो गया है।

16 Nov 2009

ध्‍यान न प्रार्थना, है न समर्पण



प्रार्थना शायद परिणाम देती हो अन्यथा करोड़ों लोग प्रार्थना नहीं करते। और शायद प्रार्थना मन को शांत भी बनाती है, किन्हीं विशेष शब्दों को दोहराते रहने से मन शांत हो जाता है। और इस शांति में कुछ पूर्वाभास, कुछ नजर आना, कुछ जवाब मिलना जैसा भी होता होगा। लेकिन ये सब मन की ही चालाकियाँ और कारगुजारियाँ हैं, क्योंकि इस सब के बावजूद इस प्रकार की तंद्रावस्था को गढ़ने वाले आप ही हैं, जिसके द्वारा आपने मन को शांत किया गया है। इस शांत अवस्था में कुछ छिपी हुई प्रतिक्रियाऐं आपके अचेतन और चेतना के बाहर से उठती हैं। लेकिन इस सब के बावजूद भी ये एक वैसी ही अवस्था है जिसमें समझबूझ नहीं होती।
न ही ध्यान समर्पण है - किसी सिद्धांत के प्रति समर्पण, किसी छवि, किसी विचार के प्रति समर्पण क्योंकि मन की बातें वही आदर्शवादी, मूर्ति-चिन्ह-विचार पूजक, दोहराव-पूजक होती हैं।
कोई मूर्ति की पूजा नहीं करता ये सोचते हुए कि वो मूर्तिपूजा कर रहा है और ये मूर्खता है, अंधविश्वास है अपितु बहुत से लोगों की तरह हर व्यक्ति अपने मन में पैठी बातों, आदर्शों की पूजा करता है वो भी आदर्शपूजन ही है न। यह एक छवि, एक विचार, एक सिद्धांत के प्रति समर्पण है यह ध्यान नहीं है। जाहिर है कि ये अपने आप से ही पलायन का एक तरीका है, यह बहुत ही सुविधाजनक पलायन है, लेकिन अंततः पलायन ही है न।

14 Nov 2009



आप अपनी जिन्दगी को ही एक पर्यवेक्षक के दृष्टिकोण से देखते हैं, किसी ऐसे व्यक्ति के रूप में जो आपकी जिन्दगी से अलग है। इस प्रकार आप खुद को दो हिस्सों - पर्यवेक्षक यानि देखने वाले और पर्यवेक्षण यानि देखे जाने वाले के बीच बांट लेते हैं। यूं अपने आपको दो हिस्सों में बांट लेना, आपके सभी द्वंद्वों, संघर्षों, दुखों, भयों, निराशाओं की जड़ बन जाता है।
इसी प्रकार आपकी ये बांटने की प्रवृत्ति इंसान इंसान को, राष्ट्रों, धर्मों, समाजिक बंटवारों का कारण बनती है - और जहां भी बंटवारा होगा, वहां संघर्ष भी होगा। यह नियम है, यह कारण है, तर्क है। एक तरफ पाकिस्तान एक तरफ भारत यूं तो ये संघर्ष कभी खत्म नहीं होगा, बाह्रम्ण और अ-ब्राम्ह्रण... इस बंटवारे में नफरत पलती है। इस प्रकार समस्त संघर्षों के साथ बाहरी तौर पर बंटवारे उसी प्रकार के हैं जिस प्रकार आप आन्तरिक रूप से अपने आपको पर्यवेक्षक ओर पर्यवेक्षण में बांट लेते हैं। क्या आप इस बात को समझ रहे हैं? यदि आप इस बात को नहीं समझ रहे हैं तो आप आगे नहीं जा सकते। एक ऐसा मन जो सतत संघर्ष वैषम्य में हो वो वैसे ही एक सताया हुआ मन होता है, संत्रास झेलता हुआ मन होता है, मुड़ा तुड़ा और विक्षिप्त मन होता है वो वैसा ही होता है जैसे कि वर्तमान में हम हैं।

13 Nov 2009



क्या हमारी रोजमर्रा की जिन्दगी में कोई ऐसा तरीका हो सकता है जिसमें हम हर तरह के मनोवैज्ञानिक नियन्त्रण को मात्र अपने होने भर पर ही समाप्त कर दें? क्योंकि नियंत्रण का अर्थ है कोशिश - प्रयास जिसका मतलब है हमारा स्वयं को ही ‘‘नियंत्रक’’ और ‘‘नियंत्रित’’ के बीच में बांट देना। मैं गुस्से में हूं तो मुझे गुस्से पर काबू करना चाहिए, मैं सिगरेट पीता हूं तो मुझे सिगरेट नहीं पीनी चाहिए। हम कुछ और ही कहते हैं जो कि हमारे द्वारा ही गलत समझा जाता है और हमारे ही द्वारा शायद अस्वीकार भी किया जाता है और ये चीजें एकसाथ चलती हैं क्योंकि यह एक सामान्य सी उक्ति हो गया है कि सारी जिन्दगी एक निंयत्रण है- यदि आप नियंत्रण नहीं करते हैं तो आप अपने आप को ही बहुत छूट दे रहे हैं, आप असंवेदनशील हैं, आपके होने का कोई मतलब नहीं है, इसलिए आपको अपने पर काबू करना चाहिए। धर्म, दर्शन, शिक्षक, आपका परिवार, माँ बाप ये सब आपको प्रेरित करते हैं कि आपको अपने पर निंयत्रण करना चाहिए। हम कभी भी ये प्रश्न नहीं करते - कि ये नियंत्रक कौन है?   ................. आप खुद ही तो न।

11 Nov 2009

पहला कदम, ही आखिरी कदम है



पहला कदम है जानना, बूझना, समझना, महसूस करना।
यह समझना कि आप क्या सोचते हैं, अपनी महत्वाकांक्षाओं को समझना, अपने गुस्से को, अपने अकेलेपन, अपनी निराशा, अपने दुख की असामान्यता को समझना... इन सब बातों को बिना आलोचना किये, बिना न्यायसंगत ठहराये, इन्हें बदलने की इच्छा किये बिना समझना, बूझना, महसूस करना, जानना ही पहला कदम है। इन्हें हमें जैसा का तैसा जानना और समझना है। जब आप इन्हें जैसे हैं वैसा का वैसा देखते-समझते जान जाते हैं तब एक अलग ही तरह का सहज कर्म आपसे स्वमेव ही होता है और यह निर्णायक होता है। यानि जब आप किसी चीज को सही जानते हैं तो वह सही और गलत जानते हैं वह अन्तिम रूप से गलत होती है, यह समझ-बूझ-जानने से उठा कर्म ही तत्संबंधी अंतिम कर्म होता है।
देखिये यदि मैं जान जाता हूं कि किसी का अनुकरण करना गलत है, किसी के निर्देशों का अनुसरण करना गलत है फिर चाहे वह कोई भी हो, कृष्ण, बुद्ध या जीसस कोई भी हो यह मुद्दा नहीं कि वह कौन है? तो मैंने यह सच देखा कि किसी का भी अनुकरण करना, नकल करना गलत है। क्योंकि मैंने अपने तर्क, चेतना आदि अपने सम्पूर्ण अस्तित्व से यह जाना कि यह गलत है तो यह जानना इस संबंध में निर्णायक चरण है। मैं यह जानता हूं और अनुकरण करना छोड़ देता हूं, उसे विस्मृत कर देता हूं क्योंकि उसके बाद जाना जाने वाला सर्वथा नूतन है और वह पुनः एक निर्णायक चरण है।

9 Nov 2009


चि‍त्र संपादन-राजेशा

यह आश्चर्यजनक रूप से सुन्दर और रूचिकर है कि जब आप में अर्न्‍तदृष्‍टि‍ होती है तो विचार किस प्रकार अनुपस्थित हो जाते हैं। विचारों की कोई अर्न्‍तदृष्‍टि‍ नहीं होती। केवल तब ही जब आप विचार के ढांचे में, मन को यांत्रिक रूप से इस्तेमाल नहीं करते तब ही अर्न्‍तदृष्‍टि‍ होती है। अर्न्‍तदृष्‍टि‍ के होने के उपरांत ही विचार उस अर्न्‍तदृष्‍टि‍ के आधार पर एक निर्णय या आशय की रूपरेखा बनाता है। और तब विचार कर्म करता है, जो यांत्रिक होता है। तो हमें यह पता लगाना है कि क्या हममें कोई ऐसी अर्न्‍तदृष्‍टि‍ हो सकती है, जो दुनियां से सरोकार रखती हो, लेकिन जो निर्णय न देती हो, क्या ऐसा संभव है?
यदि हम एक निर्णय या निष्कर्ष निकाल लेते हैं, तो हम उसकी संकल्पना के आधार पर कर्म करने लगते हैं, हम एक छवि, एक चिन्ह के अनुरूप काम करने लगते हैं, जो कि विचार की संरचना है, तो चीजें जैसी हैं उन्हें यथार्थतः वैसा का वैसा ही समझने से बचने के लिए हम निरंतर अपने आपको अर्न्‍तदृष्‍टि‍ सम्पन्न होने से बचाते रहते हैं?