14 Nov 2009



आप अपनी जिन्दगी को ही एक पर्यवेक्षक के दृष्टिकोण से देखते हैं, किसी ऐसे व्यक्ति के रूप में जो आपकी जिन्दगी से अलग है। इस प्रकार आप खुद को दो हिस्सों - पर्यवेक्षक यानि देखने वाले और पर्यवेक्षण यानि देखे जाने वाले के बीच बांट लेते हैं। यूं अपने आपको दो हिस्सों में बांट लेना, आपके सभी द्वंद्वों, संघर्षों, दुखों, भयों, निराशाओं की जड़ बन जाता है।
इसी प्रकार आपकी ये बांटने की प्रवृत्ति इंसान इंसान को, राष्ट्रों, धर्मों, समाजिक बंटवारों का कारण बनती है - और जहां भी बंटवारा होगा, वहां संघर्ष भी होगा। यह नियम है, यह कारण है, तर्क है। एक तरफ पाकिस्तान एक तरफ भारत यूं तो ये संघर्ष कभी खत्म नहीं होगा, बाह्रम्ण और अ-ब्राम्ह्रण... इस बंटवारे में नफरत पलती है। इस प्रकार समस्त संघर्षों के साथ बाहरी तौर पर बंटवारे उसी प्रकार के हैं जिस प्रकार आप आन्तरिक रूप से अपने आपको पर्यवेक्षक ओर पर्यवेक्षण में बांट लेते हैं। क्या आप इस बात को समझ रहे हैं? यदि आप इस बात को नहीं समझ रहे हैं तो आप आगे नहीं जा सकते। एक ऐसा मन जो सतत संघर्ष वैषम्य में हो वो वैसे ही एक सताया हुआ मन होता है, संत्रास झेलता हुआ मन होता है, मुड़ा तुड़ा और विक्षिप्त मन होता है वो वैसा ही होता है जैसे कि वर्तमान में हम हैं।

13 Nov 2009



क्या हमारी रोजमर्रा की जिन्दगी में कोई ऐसा तरीका हो सकता है जिसमें हम हर तरह के मनोवैज्ञानिक नियन्त्रण को मात्र अपने होने भर पर ही समाप्त कर दें? क्योंकि नियंत्रण का अर्थ है कोशिश - प्रयास जिसका मतलब है हमारा स्वयं को ही ‘‘नियंत्रक’’ और ‘‘नियंत्रित’’ के बीच में बांट देना। मैं गुस्से में हूं तो मुझे गुस्से पर काबू करना चाहिए, मैं सिगरेट पीता हूं तो मुझे सिगरेट नहीं पीनी चाहिए। हम कुछ और ही कहते हैं जो कि हमारे द्वारा ही गलत समझा जाता है और हमारे ही द्वारा शायद अस्वीकार भी किया जाता है और ये चीजें एकसाथ चलती हैं क्योंकि यह एक सामान्य सी उक्ति हो गया है कि सारी जिन्दगी एक निंयत्रण है- यदि आप नियंत्रण नहीं करते हैं तो आप अपने आप को ही बहुत छूट दे रहे हैं, आप असंवेदनशील हैं, आपके होने का कोई मतलब नहीं है, इसलिए आपको अपने पर काबू करना चाहिए। धर्म, दर्शन, शिक्षक, आपका परिवार, माँ बाप ये सब आपको प्रेरित करते हैं कि आपको अपने पर निंयत्रण करना चाहिए। हम कभी भी ये प्रश्न नहीं करते - कि ये नियंत्रक कौन है?   ................. आप खुद ही तो न।

11 Nov 2009

पहला कदम, ही आखिरी कदम है



पहला कदम है जानना, बूझना, समझना, महसूस करना।
यह समझना कि आप क्या सोचते हैं, अपनी महत्वाकांक्षाओं को समझना, अपने गुस्से को, अपने अकेलेपन, अपनी निराशा, अपने दुख की असामान्यता को समझना... इन सब बातों को बिना आलोचना किये, बिना न्यायसंगत ठहराये, इन्हें बदलने की इच्छा किये बिना समझना, बूझना, महसूस करना, जानना ही पहला कदम है। इन्हें हमें जैसा का तैसा जानना और समझना है। जब आप इन्हें जैसे हैं वैसा का वैसा देखते-समझते जान जाते हैं तब एक अलग ही तरह का सहज कर्म आपसे स्वमेव ही होता है और यह निर्णायक होता है। यानि जब आप किसी चीज को सही जानते हैं तो वह सही और गलत जानते हैं वह अन्तिम रूप से गलत होती है, यह समझ-बूझ-जानने से उठा कर्म ही तत्संबंधी अंतिम कर्म होता है।
देखिये यदि मैं जान जाता हूं कि किसी का अनुकरण करना गलत है, किसी के निर्देशों का अनुसरण करना गलत है फिर चाहे वह कोई भी हो, कृष्ण, बुद्ध या जीसस कोई भी हो यह मुद्दा नहीं कि वह कौन है? तो मैंने यह सच देखा कि किसी का भी अनुकरण करना, नकल करना गलत है। क्योंकि मैंने अपने तर्क, चेतना आदि अपने सम्पूर्ण अस्तित्व से यह जाना कि यह गलत है तो यह जानना इस संबंध में निर्णायक चरण है। मैं यह जानता हूं और अनुकरण करना छोड़ देता हूं, उसे विस्मृत कर देता हूं क्योंकि उसके बाद जाना जाने वाला सर्वथा नूतन है और वह पुनः एक निर्णायक चरण है।

9 Nov 2009


चि‍त्र संपादन-राजेशा

यह आश्चर्यजनक रूप से सुन्दर और रूचिकर है कि जब आप में अर्न्‍तदृष्‍टि‍ होती है तो विचार किस प्रकार अनुपस्थित हो जाते हैं। विचारों की कोई अर्न्‍तदृष्‍टि‍ नहीं होती। केवल तब ही जब आप विचार के ढांचे में, मन को यांत्रिक रूप से इस्तेमाल नहीं करते तब ही अर्न्‍तदृष्‍टि‍ होती है। अर्न्‍तदृष्‍टि‍ के होने के उपरांत ही विचार उस अर्न्‍तदृष्‍टि‍ के आधार पर एक निर्णय या आशय की रूपरेखा बनाता है। और तब विचार कर्म करता है, जो यांत्रिक होता है। तो हमें यह पता लगाना है कि क्या हममें कोई ऐसी अर्न्‍तदृष्‍टि‍ हो सकती है, जो दुनियां से सरोकार रखती हो, लेकिन जो निर्णय न देती हो, क्या ऐसा संभव है?
यदि हम एक निर्णय या निष्कर्ष निकाल लेते हैं, तो हम उसकी संकल्पना के आधार पर कर्म करने लगते हैं, हम एक छवि, एक चिन्ह के अनुरूप काम करने लगते हैं, जो कि विचार की संरचना है, तो चीजें जैसी हैं उन्हें यथार्थतः वैसा का वैसा ही समझने से बचने के लिए हम निरंतर अपने आपको अर्न्‍तदृष्‍टि‍ सम्पन्न होने से बचाते रहते हैं?

7 Nov 2009



जब हम अन्दर से कंगाल होते हैं तभी हम हर तरह के अमीरी, ताकत और प्रभुत्व जैसे बाहरी दिखावों में संलग्न होते हैं। जब हमारा मन भिखारी सा खाली होता है तभी हम बाहरी चीजें इकट्ठी करते हैं। अगर खरीदने में सक्षम हैं तो हम अपने आपको चारों और से ऐसी जी चीजों से घेर लेते हैं जो हम सोचते हैं कि वो सुन्दर हैं, और चूंकि हम ही इन चीजों से जुड़ते, इन्हें इतना महत्व देते हैं इसलिए हम ही और भी ज्यादा दुर्गति और विध्वंस के जिम्मेदार भी होते हैं।
कब्जे की भावना सुन्दरता के प्रति प्रेम नहीं है, यह सुरक्षा की आकांक्षा से ही उपजती है और सुरक्षित होने में असंवेदनशीलता है, जड़ता है।
कोई भी प्रवृत्ति या प्रतिभा जो अलगाव का कारण बनती है, अपनी पहचान बनाने का कोई भी तरीका, चाहे वह कितना भी उत्तेजक क्यों न हो, संवेदनशीलता की अभिव्यक्ति को तोड़ता-मरोड़ता है और असंवेदनशीलता में ले जाता है।
”मैं पेंटिंग करता हूं”, ”मैं लिखता हूं”, ”मैंने खोज की है” - वह संवेदनशीलता मरी सी होती है जो वैयक्तिकता की भेंट चढ़ी हो, जहाँ ‘मैं‘ ‘मेरे’ को अहमियत दी गई हो। जब हम लोगों, चीजों और प्रकृति से अपने संबंधों के दौरान अपने हर विचार, हर अहसास के हर गुजरते क्षण में साक्षी होते हैं तब हमारा मन खुला होता है, मृदु होता है, आत्मसुरक्षा की मांग और आशय से संकुचित नहीं होता; और तभी कुरूप और सुन्दर के प्रति संवेदनशीलता, हमारा चेतन निर्बाध रूप से स्वमेव ही प्रकट करता है।
सुन्दरता और कुरूपता के प्रति संवेदनशीलता उनके प्रति लगाव या अलगाव से नहीं आती यह आती है प्रेम से, वहां जहां कोई भी आत्मकेन्द्रित संघर्ष न हो।

6 Nov 2009

अनवधान के प्रति जागरूक होना



हमारा देखना और सुनना, अवधान... ध्यान का ही एक प्रकार है और ध्यान की कोई सीमा नहीं, कोई प्रतिरोध नहीं इसलिए यह असीम है। ध्यान के लिए अथाह ऊर्जा लगती है जो एक ही बिन्दु पर टिकी न हो। इस अवधान में पुनरावृत्ति करने वाले कोई भी क्षण नहीं, यह यांत्रिक नहीं। इसलिए इस प्रकार का कोई प्रश्न ही पैदा नहीं होता कि अवधान या ध्यान को कैसे संभाला या जारी रखा जाये, और जब कोई देखने और सुनने के कला सीख लेता है यह ध्यान या अवधान स्वतः ही अपने को किसी पेज पर, किसी भी शब्द पर फोकस करने में समर्थ होता है। इसमें किसी प्रकार का प्रतिरोध नहीं होता जो कि एकाग्रता की गतिविधि में होता है। अनवधान को परिष्कृत करके अवधान में नहीं बदला जा सकता। अनवधान के प्रति जागरूकता यानि अनवधान का अंत न कि अनवधान, अवधान हो जायेगा। इस समाप्ति में ही निरंतरता नहीं रहती। अतीत अपने आपको भविष्य में बदल लेता है - कुछ हो जाने की निरंतरता में, और हम निरंतरता में ही सुरक्षितता ढूंढते हैं, समाप्ति में नहीं। तो ध्यान या अवधान में निरंतरता का गुण नहीं होता। जो भी निरंतर चलता रहता है वह यांत्रिक है। यह होना यांत्रिक है और इसमें समय लागू होता है। ध्यान में समय का गुण भी नहीं है। यह सब एक अत्यंत जटिल विषय है। कोई भी इसमें बड़े होले-होले, धीरे-धीरे ही गहराई तक जा सकता है।