27 Oct 2009
आलोचना के बिना, जागरूक भर रहना
ध्यान ऐसी चीज नहीं है कि उसे करने के बारे में सोचा जाये या नियत समय सारणी बनायी जाये या मुहूर्त निकाला जाये। यह तंत्र-मंत्र-यंत्र जैसा नहीं कि जप-तप के लिए फलां-फलां जगह हो, कम्बल या किसी विशेष तरह का आसन हो, दिशा विशेष की ओर मुंह हो, ध्यान के सबंध में ये सारी बातें फालतू हैं। यह ऐसा ही है कि तुरंत अभी शुरू करना चाहिए। आसपास के वृक्षों को देखें, आसमान देखें, गिलहरी, चिड़िया, मछली को देखें, पत्ते पर पड़ते प्रकाश को देखें, किसी के परिधान के रंगों को, किसी का चेहरा,,, इसके बाद ही बात गहराई की ओर चलती है। धीरे-धीरे हम अन्दर की ओर खिसकते हैं। हम बाहरी चीजों को देखते हुए बिना पसंद-नापसंद के जागरूक हो सकते हैं, यह बहुत ही सरल है। लेकिन जब हम अन्दर, अपने भीतर की ओर जाते हैं तो बिना किसी आलोचना, बिना किसी निर्णय, बिना तुलना किये रहना ज्यादा मुश्किल हो जाता है। लेकिन हमें बस यह करना है कि हम अपने विश्वासों, डरों, झूठी मान्यताओं, भ्रमों , आशाओं, अवसादों, आकांक्षाओं और इसी तरह की अन्य सारी बातों के प्रति जागरूक रहें। इसी तरह हम परत-दर-परत अपने मन की ऊपरी सतहों और फिर गहरे तलों की यात्रा की शुरूआत कर सकते हैं।
26 Oct 2009
जो मन असाधारणरूप से शांत है, स्पष्टदृष्टा है उसे सीखने को शेष है भी क्या?
केवल देखने, सुनने के अतिरिक्त, सीखना क्या है?
सीखें पर किसी मनोवैज्ञानिक या विशेषज्ञ के कहे अनुसार नहीं। आप अपने आप को ही लें, अपने आप को ही देखें - बिना किसी आलोचना या प्रशंसा, निर्णय लेने के उद्देश्य से, या तुच्छता से अलग थलग पटक देने जैसे नहीं....बस.... मात्र देखें। उदाहरण के लिए देखें कि ”मैं घमंड करता हूं“ पर अब यह नहीं करना कि घमंड बुरी चीज है, या अच्छी, या गंदी चीज है... नजरिया बनाकर नहीं देखना है... बस केवल देखें। जैसे-जैसे हम निरपेक्ष, बिना किसी विक्षेप के यथावस्तु देखते हैं, हम सीखते हैं। देखना, मतलब सीखना कि अहं या घमंड में क्या-क्या शामिल है, यह जन्म कैसे लेता है, कैसे यह हमारे मन में गहरे कोनों में पैठा रहता है या सामने ही सामने फूलता-फलता है, और हमें ही इसकी फसल काटनी पड़ती है। जैसे हम अपने आप को ध्यानपूर्वक देखते हैं, तुरंत सीखते हैं। अब इसमें याद रखने और अनुभव करने जैसी कोई बात नहीं कि बाद में उससे सबक लेंगें।
तो यह बहुत कठिन है पर, यह केवल कुछ क्षणों 2-5 मिनट का काम है। ध्यानपूर्वक, जागरूक या सावधान-अवधानपूर्ण रहना बहुत कठिन है। हमारा मन बार-बार असावधान होता है तो उन क्षणों में जब आप असावधान हैं यह देखें-जाने कि असावधानता क्या है? हमें सावधान होने की कोशिश नहीं करनी, खुद से ही संघर्ष या लड़ना नहीं है पर यह देखना है कि यह असावधानता क्या है? ऐसा क्यों हो रहा है? इस असावधानता के प्रति पूरी तरह होशवान, सावधान रहें। यहीं ठहरें। यह ना कहें कि मैं अपना पूरा समय सावधान, होशपूर्ण रहने में ही लगाऊंगा। इससे ज्यादा गहराई में जाना जटिलता पैदा करेगा। यह हमारे मन का एक गुण है कि वह हर समय जागता है और देखता रहता है, और सीखना इसके अलावा कुछ है भी नहीं। जो मन असाधारणरूप से शांत है, स्पष्टदृष्टा है उसे सीखने को शेष है भी क्या?
सीखें पर किसी मनोवैज्ञानिक या विशेषज्ञ के कहे अनुसार नहीं। आप अपने आप को ही लें, अपने आप को ही देखें - बिना किसी आलोचना या प्रशंसा, निर्णय लेने के उद्देश्य से, या तुच्छता से अलग थलग पटक देने जैसे नहीं....बस.... मात्र देखें। उदाहरण के लिए देखें कि ”मैं घमंड करता हूं“ पर अब यह नहीं करना कि घमंड बुरी चीज है, या अच्छी, या गंदी चीज है... नजरिया बनाकर नहीं देखना है... बस केवल देखें। जैसे-जैसे हम निरपेक्ष, बिना किसी विक्षेप के यथावस्तु देखते हैं, हम सीखते हैं। देखना, मतलब सीखना कि अहं या घमंड में क्या-क्या शामिल है, यह जन्म कैसे लेता है, कैसे यह हमारे मन में गहरे कोनों में पैठा रहता है या सामने ही सामने फूलता-फलता है, और हमें ही इसकी फसल काटनी पड़ती है। जैसे हम अपने आप को ध्यानपूर्वक देखते हैं, तुरंत सीखते हैं। अब इसमें याद रखने और अनुभव करने जैसी कोई बात नहीं कि बाद में उससे सबक लेंगें।
तो यह बहुत कठिन है पर, यह केवल कुछ क्षणों 2-5 मिनट का काम है। ध्यानपूर्वक, जागरूक या सावधान-अवधानपूर्ण रहना बहुत कठिन है। हमारा मन बार-बार असावधान होता है तो उन क्षणों में जब आप असावधान हैं यह देखें-जाने कि असावधानता क्या है? हमें सावधान होने की कोशिश नहीं करनी, खुद से ही संघर्ष या लड़ना नहीं है पर यह देखना है कि यह असावधानता क्या है? ऐसा क्यों हो रहा है? इस असावधानता के प्रति पूरी तरह होशवान, सावधान रहें। यहीं ठहरें। यह ना कहें कि मैं अपना पूरा समय सावधान, होशपूर्ण रहने में ही लगाऊंगा। इससे ज्यादा गहराई में जाना जटिलता पैदा करेगा। यह हमारे मन का एक गुण है कि वह हर समय जागता है और देखता रहता है, और सीखना इसके अलावा कुछ है भी नहीं। जो मन असाधारणरूप से शांत है, स्पष्टदृष्टा है उसे सीखने को शेष है भी क्या?
24 Oct 2009
सीखा तभी जा सकता है जब हम अनुभव से मुक्त हों।
अनुभवों से कभी भी नहीं सीखा जा सकता। सीखने के लिए चाहिए आजादी, उत्सुकता, जिज्ञासा। जब एक बच्चा कुछ सीखता है, तब वह उस बारे में उत्सुक होता है, वह जानना चाहता है, वह स्वतंत्र संवेग होता है ना कि किसी चीज को पकड़ने, उस पर काबिज होने की प्रक्रिया और उससे आगे बढ़ना।
हमारे पास अनन्त अनुभव होते हैं और मानव सभ्यता के पाँच हजार सालों से हम युद्धों के अनुभव ही तो इकट्ठे कर रहे हैं। हमने इनसे एक भी चीज नहीं सीखी सिवा इसके कि हमने एक दूसरे को मारने की और भी अत्याधुनिक मशीनरी खोज ली है।
यहाँ तक कि सीखा तभी जा सकता है जब हम अनुभव से मुक्त हों।
हमारे पास अनन्त अनुभव होते हैं और मानव सभ्यता के पाँच हजार सालों से हम युद्धों के अनुभव ही तो इकट्ठे कर रहे हैं। हमने इनसे एक भी चीज नहीं सीखी सिवा इसके कि हमने एक दूसरे को मारने की और भी अत्याधुनिक मशीनरी खोज ली है।
यहाँ तक कि सीखा तभी जा सकता है जब हम अनुभव से मुक्त हों।
23 Oct 2009
रिश्ते दर्पण की तरह हैं।
रिश्ते दर्पण की तरह हैं जिनमें हम अपने आप को देख सकते हैं जैसे कि अभी हम हैं। इस पृथ्वी पर कोई भी ऐसी जिन्दा चीज नहीं जो किसी अन्य से सम्बंधित न हो। यहाँ तक की जंगल में अकेला बैठा सन्यासी भी अपने अतीत और अपने आसपास के लोगों से जुड़ा होता है। सम्बंधों से पलायन संभव ही नहीं है। यही संबंध एक दर्पण की तरह होते हैं जिनमें हम अपने आपको देख सकते हैं, हम यह खोज सकते हैं कि हम क्या हैं। इसी दर्पण में हम अपनी प्रतिक्रियाएं, पूर्वधारणाएं, गुस्सा, क्रोध, अपने भय, तनाव, विषाद, क्षोभ, अकेलापन, शोक, दर्द और दुख को देखते हैं। सम्बंधों के दर्पण में ही हम देख सकते हैं कि हम प्यार करते हैं या इस तरह की कोई चीज है ही नहीं। हमें रिश्तों संबंधी प्रश्नों की जाँच करनी चाहिए क्योंकि यही प्रेम का आधार हैं।
22 Oct 2009
प्रेम की सुगंध ही उसका परिचय है
जब आपका दिल, दिमाग की चीजों चालाकियों से नहीं भरा होता, तब प्रेम से भरा होता है। एकमात्र और अकेला प्रेम ही है जो निवर्तमान दुनियां के पागलपन, उसकी भ्रष्टता को खत्म कर सकता है। प्रेम के सिवा, कोई भी संकल्पना, सिद्धांत, वाद दुनियां को नहीं बदल सकते। आप तभी प्रेम कर सकते हैं जब आप आधिपत्य करने की कोशिश नहीं करते, ईष्र्यालु या लालची नहीं होते। जब आप में लोगों के प्रति आदर होता है, करूणा होती है, हार्दिक स्नेह उमड़ता है तब आप प्रेम में होते हैं। जब आप अपनी पत्नि, प्रेमिका, अपने बच्चों, अपने पड़ोसी, अपने बद्किस्मत सेवकों के बारे में सद्भावपूर्ण ख्यालों में होते हैं तब आप प्रेम में होते हैं। प्रेम ऐसी चीज नहीं जिसके बारे में सोचा विचारा जाये, कृत्रिम रूप से उसे उगाया जाये, प्रेम ऐसी चीज नहीं जिसका अभ्यास कर कर के सीखा जाये। प्रेम, भाईचारा आदि सीखना दिमागी बाते हैं प्रेम कतई नहीं। जब प्रेम, भाईचारा, विश्वबंधुत्व, दया, करूणा और समर्पण सीखना पूर्णतः रूक जाता है, बनावटीपन ठहर जाता है तब असली प्रेम प्रकट होता है। प्रेम की सुगंध ही उसका परिचय होता है।
रेगिस्तान की तरह शुष्क आज के सभ्य विश्व में जहाँ भौतिक सुख और इच्छाएं ही प्रमुख हो गये हैं प्रेम नहीं बचा है। लेकिन फिर भी प्रेम के बिना जीवन का कोई अर्थ नहीं। आपके पास प्यार होगा ही नहीं जब तक सुन्दरता न हो। सुन्दरता वह नहीं जो आप बाहर देखते हैं - कोई सुन्दर वृक्ष, एक सुन्दर तस्वीर, एक भव्य सुन्दर इमारत या एक सुन्दर स्त्री बल्कि सुन्दरता आपका वह अन्तःकरण है जो आपकी आंख बाहर को प्रक्षेपित करती है। जब आपके दिल दिमाग जानते हैं कि प्रेम क्या है केवल तब ही सुन्दरता का अहसास हो सकता है। बिना प्रेम और सौन्दर्य बोध के किसी प्रकार की सच्ची नैतिकता का अस्तित्व ही नहीं हो सकता। आप और हम सभी ये अच्छी तरह जानते हैं कि बिना प्रेम के आप कुछ भी करें, समाज सुधार करें, भूखों को खिलायें आप और और अधिक पाखंड, वैषम्य और उलझनों में पड़ेंगे। प्रेम का आभाव ही हमारी कुरूपता, दिल और दिमाग की कंगाली का कारण है।
जब प्रेम और सौन्दर्य आपके मन में होता है तब आप जो भी करते हैं लयबद्ध होता है, विधिसम्मत होता है। यदि आप जानते हैं कि प्रेम कैसे करना है, तब आप कुछ भी करें यह अवश्य ही सभी समस्याओं का हल बन जाता है।
रेगिस्तान की तरह शुष्क आज के सभ्य विश्व में जहाँ भौतिक सुख और इच्छाएं ही प्रमुख हो गये हैं प्रेम नहीं बचा है। लेकिन फिर भी प्रेम के बिना जीवन का कोई अर्थ नहीं। आपके पास प्यार होगा ही नहीं जब तक सुन्दरता न हो। सुन्दरता वह नहीं जो आप बाहर देखते हैं - कोई सुन्दर वृक्ष, एक सुन्दर तस्वीर, एक भव्य सुन्दर इमारत या एक सुन्दर स्त्री बल्कि सुन्दरता आपका वह अन्तःकरण है जो आपकी आंख बाहर को प्रक्षेपित करती है। जब आपके दिल दिमाग जानते हैं कि प्रेम क्या है केवल तब ही सुन्दरता का अहसास हो सकता है। बिना प्रेम और सौन्दर्य बोध के किसी प्रकार की सच्ची नैतिकता का अस्तित्व ही नहीं हो सकता। आप और हम सभी ये अच्छी तरह जानते हैं कि बिना प्रेम के आप कुछ भी करें, समाज सुधार करें, भूखों को खिलायें आप और और अधिक पाखंड, वैषम्य और उलझनों में पड़ेंगे। प्रेम का आभाव ही हमारी कुरूपता, दिल और दिमाग की कंगाली का कारण है।
जब प्रेम और सौन्दर्य आपके मन में होता है तब आप जो भी करते हैं लयबद्ध होता है, विधिसम्मत होता है। यदि आप जानते हैं कि प्रेम कैसे करना है, तब आप कुछ भी करें यह अवश्य ही सभी समस्याओं का हल बन जाता है।
16 Oct 2009
किसी व्यक्ित या वस्तु से जुड़ाव की प्रक्रिया
- क्या मैं जो हो रहा है उसे त्वरित रूप से या तुरंत देख सकता हूँ?
- माना कि मैं किसी वस्तु या व्यक्ति से जुड़ गया हूँ। लेकिन क्या मैंने उस विषय, वस्तु या व्यक्ति से जुड़ने से एकदम पूर्व के हालातों को देखा? इस जुड़ने में क्या-क्या शामिल था? और यह जुड़ाव कैसे पैदा हुआ, क्यों हुआ? क्या मैंने इस जुड़ने की घटना की सम्पूर्ण प्रकृति को देखा?
- क्या मैं किसी वस्तु या व्यक्ति से इसलिए जुड़ा क्योंकि मैं अकेला था, मैं सुविधा चाहता था, मैं किसी पर निर्भर होना चाहता था या, क्योंकि मैं अपने आप के साथ ही नहीं रह पा रहा था? मैं साहचर्य चाहता था, मैं चाहता था कि मुझसे कहे कि ”बहुत अच्छे! बरखुरदार तुमने बहुत अच्छा किया!“, मैं चाहता था कि कोई मेरा हाथ थाम कर चले जब मैं विषाद या क्रोध में होऊं। इसलिए मैं किसी पर निर्भर था जिसके परिणामस्वरूप यह जुड़ना या जुड़ाव हुआ। इस जुड़ाव से भय प्रकट हुआ, ईष्र्या और फिर गुस्सा पैदा हुआ।
- वैसे ही ; जैसे आप कोई प्रेमिका पा लें और फिर उससे अलगाव से भयभीत हों, उसके किसी से बात करने पर ईष्र्या प्रकट करें, और उसका अन्य व्यक्ति से जुड़ाव होने पर आपको गुस्सा आये।
- तो क्या आप इस पूरी जुड़ाव की प्रक्रिया को, जब यह चल ही रही....हो ही रही हो... तुरंत देख सकते हैं?
- आप इस पूरी प्रक्रिया को बिल्कुल देख सकते हैं - यदि आप होश से भरे हों और आपको,,, मन की हरकतों के बारे में जानने समझने में रूचि हो।
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