24 Oct 2009

सीखा तभी जा सकता है जब हम अनुभव से मुक्त हों।


अनुभवों से कभी भी नहीं सीखा जा सकता। सीखने के लिए चाहिए आजादी, उत्सुकता, जिज्ञासा। जब एक बच्चा कुछ सीखता है, तब वह उस बारे में उत्सुक होता है, वह जानना चाहता है, वह स्वतंत्र संवेग होता है ना कि किसी चीज को पकड़ने, उस पर काबिज होने की प्रक्रिया और उससे आगे बढ़ना।
हमारे पास अनन्त अनुभव होते हैं और मानव सभ्यता के पाँच हजार सालों से हम युद्धों के अनुभव ही तो इकट्ठे कर रहे हैं। हमने इनसे एक भी चीज नहीं सीखी सिवा इसके कि हमने एक दूसरे को मारने की और भी अत्याधुनिक मशीनरी खोज ली है।
यहाँ तक कि सीखा तभी जा सकता है जब हम अनुभव से मुक्त हों।

23 Oct 2009

रिश्ते दर्पण की तरह हैं।

रिश्ते दर्पण की तरह हैं जिनमें हम अपने आप को देख सकते हैं जैसे कि अभी हम हैं। इस पृथ्वी पर कोई भी ऐसी जिन्दा चीज नहीं जो किसी अन्य से सम्बंधित न हो। यहाँ तक की जंगल में अकेला बैठा सन्यासी भी अपने अतीत और अपने आसपास के लोगों से जुड़ा होता है। सम्बंधों से पलायन संभव ही नहीं है। यही संबंध एक दर्पण की तरह होते हैं जिनमें हम अपने आपको देख सकते हैं, हम यह खोज सकते हैं कि हम क्या हैं। इसी दर्पण में हम अपनी प्रतिक्रियाएं, पूर्वधारणाएं, गुस्सा, क्रोध, अपने भय, तनाव, विषाद, क्षोभ, अकेलापन, शोक, दर्द और दुख को देखते हैं। सम्बंधों के दर्पण में ही हम देख सकते हैं कि हम प्यार करते हैं या इस तरह की कोई चीज है ही नहीं। हमें रिश्तों संबंधी प्रश्नों की जाँच करनी चाहिए क्योंकि यही प्रेम का आधार हैं।

22 Oct 2009

प्रेम की सुगंध ही उसका परिचय है

जब आपका दिल, दिमाग की चीजों चालाकियों से नहीं भरा होता, तब प्रेम से भरा होता है। एकमात्र और अकेला प्रेम ही है जो निवर्तमान दुनियां के पागलपन, उसकी भ्रष्टता को खत्म कर सकता है। प्रेम के सिवा, कोई भी संकल्पना, सिद्धांत, वाद दुनियां को नहीं बदल सकते। आप तभी प्रेम कर सकते हैं जब आप आधिपत्य करने की कोशिश नहीं करते, ईष्र्यालु या लालची नहीं होते। जब आप में लोगों के प्रति आदर होता है, करूणा होती है, हार्दिक स्नेह उमड़ता है तब आप प्रेम में होते हैं। जब आप अपनी पत्नि, प्रेमिका, अपने बच्चों, अपने पड़ोसी, अपने बद्किस्मत सेवकों के बारे में सद्भावपूर्ण ख्यालों में होते हैं तब आप प्रेम में होते हैं। प्रेम ऐसी चीज नहीं जिसके बारे में सोचा विचारा जाये, कृत्रिम रूप से उसे उगाया जाये, प्रेम ऐसी चीज नहीं जिसका अभ्यास कर कर के सीखा जाये। प्रेम, भाईचारा आदि सीखना दिमागी बाते हैं प्रेम कतई नहीं। जब प्रेम, भाईचारा, विश्वबंधुत्व, दया, करूणा और समर्पण सीखना पूर्णतः रूक जाता है, बनावटीपन ठहर जाता है तब असली प्रेम प्रकट होता है। प्रेम की सुगंध ही उसका परिचय होता है।

रेगिस्तान की तरह शुष्क आज के सभ्य विश्व में जहाँ भौतिक सुख और इच्छाएं ही प्रमुख हो गये हैं प्रेम नहीं बचा है। लेकिन फिर भी प्रेम के बिना जीवन का कोई अर्थ नहीं। आपके पास प्यार होगा ही नहीं जब तक सुन्दरता न हो। सुन्दरता वह नहीं जो आप बाहर देखते हैं - कोई सुन्दर वृक्ष, एक सुन्दर तस्वीर, एक भव्य सुन्दर इमारत या एक सुन्दर स्त्री बल्कि सुन्दरता आपका वह अन्तःकरण है जो आपकी आंख बाहर को प्रक्षेपित करती है। जब आपके दिल दिमाग जानते हैं कि प्रेम क्या है केवल तब ही सुन्दरता का अहसास हो सकता है। बिना प्रेम और सौन्दर्य बोध के किसी प्रकार की सच्ची नैतिकता का अस्तित्व ही नहीं हो सकता। आप और हम सभी ये अच्छी तरह जानते हैं कि बिना प्रेम के आप कुछ भी करें, समाज सुधार करें, भूखों को खिलायें आप और और अधिक पाखंड, वैषम्य और उलझनों में पड़ेंगे। प्रेम का आभाव ही हमारी कुरूपता, दिल और दिमाग की कंगाली का कारण है।

जब प्रेम और सौन्दर्य आपके मन में होता है तब आप जो भी करते हैं लयबद्ध होता है, विधिसम्मत होता है। यदि आप जानते हैं कि प्रेम कैसे करना है, तब आप कुछ भी करें यह अवश्य ही सभी समस्याओं का हल बन जाता है।

16 Oct 2009

कि‍सी व्‍यक्‍ि‍त या वस्‍तु से जुड़ाव की प्रक्रिया

  • क्या मैं जो हो रहा है उसे त्वरित रूप से या तुरंत देख सकता हूँ?
  • माना कि मैं किसी वस्तु या व्यक्ति से जुड़ गया हूँ। लेकिन क्या मैंने उस विषय, वस्तु या व्यक्ति से जुड़ने से एकदम पूर्व के हालातों को देखा? इस जुड़ने में क्या-क्या शामिल था? और यह जुड़ाव कैसे पैदा हुआ, क्यों हुआ? क्या मैंने इस जुड़ने की घटना की सम्पूर्ण प्रकृति को देखा?
  • क्या मैं किसी वस्तु या व्यक्ति से इसलिए जुड़ा क्योंकि मैं अकेला था, मैं सुविधा चाहता था, मैं किसी पर निर्भर होना चाहता था या, क्योंकि मैं अपने आप के साथ ही नहीं रह पा रहा था? मैं साहचर्य चाहता था, मैं चाहता था कि मुझसे कहे कि ”बहुत अच्छे! बरखुरदार तुमने बहुत अच्छा किया!“,  मैं चाहता था कि कोई मेरा हाथ थाम कर चले जब मैं विषाद या क्रोध में  होऊं। इसलिए मैं किसी पर निर्भर था जिसके परिणामस्वरूप यह जुड़ना या जुड़ाव हुआ। इस जुड़ाव से भय प्रकट हुआ, ईष्र्या और फिर गुस्सा पैदा हुआ।
  • वैसे ही ; जैसे आप कोई प्रेमिका पा लें और फिर उससे अलगाव से भयभीत हों, उसके किसी से बात करने पर ईष्र्या प्रकट करें, और उसका अन्य व्यक्ति से जुड़ाव होने पर आपको गुस्सा आये।
  • तो क्या आप इस पूरी जुड़ाव की प्रक्रिया को, जब यह चल ही रही....हो ही रही हो... तुरंत देख सकते हैं?
  • आप इस पूरी प्रक्रिया को बिल्कुल देख सकते हैं - यदि आप होश से भरे हों और आपको,,, मन की हरकतों के बारे में जानने समझने में रूचि हो।

23 Sept 2009

कोई अपने ही बारे में, छवि क्यों बनाता है?

किसी भी व्यक्ति की अपने बारे में एक संकल्पना, खुद का ही छविचिन्ह या छवि होती है - कि उसे क्या होना चाहिए, क्या है, या यह कि उसे क्या नहीं होना चाहिए।
आईये जाने कोई भी व्यक्ति अपने बारे में छवि क्यों बनाता है? क्योंकि वो इसका अध्ययन कभी नहीं करता कि वह वास्तव में वो क्या है, यथार्थतः क्या है? हम सोचते हैं कि हमें यह होना चाहिए या वह होना चाहिए, आदर्श, नायकों, या कल्पना या इतिहास के उदाहरण पुरूषों की तरह।

हम जब भी जागरूक होते हैं हमारी अपने ही बारे में कल्पना, आदर्श हम पर हमला करते हैं। हमारा अपने ही बारे में जो खयाल है वह, हम जो तथ्यरूप.. वास्तव में हैं उससे.. पलायन बन जाता है। लेकिन जब आप स्वयं को तथ्य रूप में देखतें हैं जो कि आप वास्तव में हैं, तब कोई भी आपको दुख नहीं पहुंचा सकता। तब यदि कोई व्यक्ति झूठा है और उसे कोई झूठा कहता है तो इसका मतलब यह नहीं कि झूठा कहने वाला उसे दुख पहुंचा रहा है, क्योंकि यह तो तथ्य ही है। लेकिन यदि आपका अपने बारे में यह खयाल है कि आप झूठे व्यक्ति नहीं हैं, और कोई कहता है कि आप झूठें हैं तो आप गुस्सा हो जाते हैं, हिंसक हो जाते हैं।

हम लोग हमेशा एक आदर्शलोक में जीते हैं, कल्पनालोक में जीते हैं... मिथकों में जीते हैं उस जगत में नहीं जो यथार्थतः है। जो वास्तव में है उसे देखने के लिए... उसका जांच पूछ परख, यथार्थ से परिचय के लिये - हमें पूर्वाग्रह, पूर्व में ही निर्णय, मूल्यांकन, उसके बारे में भय आदि बिल्कुल नहीं होना चाहिए।

22 Sept 2009

हम अकेले नही रह सकते

अब देखिये: जब आप सुनते हैं, यदि आप सुन रहें हैं, जब आप क्या कहा जा रहा है, यह सुनते हैं और उसमें हाजिर रहते हैं, न कि ये कि आप जो कहा जा रहा है उसे समझने की कोशिश करते हैं, हाजिर होने में मात्र जागरूकता होती है आप नहीं। वह क्षण जब आप जागरूक नहीं होते, आप एक केन्द्र होते हैं, आपका अहं या केन्द्र होता है। यह केन्द्र ही समस्याएं पैदा करता है। आपने जाना? नहीं? महानुभाव यह बहुत ही गंभीर बात है अगर आप इसमें गहरे जाएं। अगर एक ऐसा मन चाहिए जो समस्यारहित हो, और इसलिए अनुभव रहित भी तो यह बहुत ही गंभीर बात है। वह क्षण जब आप कुछ अनुभव करते हैं, और आप अनुभव को संचित करना, सहेजना चाहते हैं तब यह अनुभव एक स्मृति या या याद बन जाता है और आप इसे और अधिक मात्रा में चाहते हैं। तो वह मन जिसको कोई समस्या नहीं होगी, कोई अनुभव भी नहीं होगा। ओह! आप नहीं जानते कि इसमें कितनी सुन्दरता है।
क्या मैं आपसे आदरपूर्वक कह सकता हूं कि आप कृपया किसी के भी अनुयायी न बनें, अनुसरण न करें। लेकिन आप इसमें सहायता नहीं करते।
महोदय, इसका कारण जाने: हम अकेले नही रह सकते, हम सपोर्ट सम्बल चाहते हैं, हम दूसरों की ताकत चाहते हैं, हम चाहते हैं कि हमें एक समूह के रूप में पहचाना जाए, एक संस्थान के साथ। यह संस्थान (अब, कृष्णमूर्ति फाउंडेशन) उस तरह का संस्थान नहीं है, यह केवल पुस्तकें आदि प्रकाशित करने के लिए है। आप इसका अनुसरण नहीं कर सकतेे, क्योंकि आप किताबें नहीं छाप रहे, आप स्कूलों को नहीं चला रहे। पर संकल्पना है कि हम किसी चीज का हिस्सा बनें, ठीक? और किसीसे सम्बद्ध होना या अनुसरण ताकत देता है, ठीक? अगर मैं भारत में हूं और कहता हूं कि मैं हिन्दू नहीं हूं तो लोग मुझे जिस दृष्टि से देखेंगे वह खतरनाक होगी।

एक प्रश्नकर्ता ने कहा है कि जब वह एक चिन्हविशेष पर केन्द्रित होते हैं तो ताकत का अहसास करते हैं। हम सभी चिन्हों से जुड़े हैं। ईसाई जगत चिन्हांे से भरा पड़ा है। ठीक? सारा ईसाईजगत धार्मिक चिन्ह, छवियों, संकल्पनाओं, विश्वास, आदर्शों, रिवाजों से आच्छादित है इसी तरह का माहौल भारत में भी है बस नामकरण अलग है। जब कोई किसी विशाल समूह से सम्बद्ध रहता है जो समूह एक ही चिन्ह में श्रद्धा रखता है, वह एक अनन्य शक्ति प्राप्ति का अहसास करता है, यह प्राकृतिक है या बहुत ही आप्राकृतिक? यह आपमें जोश बनाये रखता है। यह आपमें यह अहसास बनाये रखता है कि आप कम से कम उसे चिन्ह से कुछ ज्यादा ही जानते समझते हैं।

पहले तो आप एक चिन्ह की खोज करते हैं - आप देखिये कि आपका मन कैसे काम करता है? पहले तो हम एक चिन्ह खोजते हैं, चर्च या मन्दिर मंे एक छवि, या यदि आप मस्जिद में हैं तो कोई अक्षर हम सब खोजते गढ़ते हैं और फिर उनकी पूजा शुरू कर देते हैं। हम उस सब की पूजा करते हैं जो हमने ही गढ़ा रचा या बनाया खोजा है यह मानकर कि वो हमारे अपने विचार से परे है.. जो हमें ताकत देता है शक्ति देता है।

तो क्या होता है? अब जबकि चिन्ह या संकेत या छवि जो कि वास्तविक नहीं है। पर चिन्ह या छवि हमें संतुष्टि देते हैं। चिन्हों को देखने, सोचने, उनके साथ रहने से हमें जोश, जीवनी शक्ति मिलती है। निश्चित ही जो विचार से सृजित हैं, मनोवैज्ञानिक रूप से वह संभ्रम और कल्पनाएं ही होंगे, क्या नहीं?

आप मुझे गढ़ सकते हैं, मैं आशा करता हूं कि आप ऐसा न करें, पर आप मुझे अपने गुरू के रूप में गढ़ लेते हैं। मैंने गुरू बनना सदा अस्वीकार किया है, यह एक बहुत ही बेहूदा चीज है क्योंकि मैंने देखा है कि किस तरह अनुयायी या शिष्य गुरू को और गुरू शिष्यों अनुयायियों को बर्बाद करते हैं। आप यह सब समझ रहें हैं न। मैंने यह देखा है। मेरे लिये यह सारी बात एक वीभत्सता है। क्षमा करें में रूक्ष भाषा का प्रयोग कर रहा हूं। पर जैसे आप मेरी एक गुरू की छवि बनाते हैं, वक्ता की छवि बनाते हैं, तो सारा गुरूघंटालों का धंधा अभी यहीं शुरू हो जाता है।
तो सर्वप्रथम यदि मैं कुछ इंगित करना चाहता हूं तो ये कि इन सब बातों में दिग्भ्रमित करने वाले चर्च और मन्दिर हैं, मस्जिदें हैं जो कि सच नहीं हैं, वास्तविक नहीं हैं। यह सब मन्दिर, मस्जिद, चर्च - पुजारियों के द्वारा, विचारों के द्वारा, हमारे डर के द्वारा, हमारी चिंता, भविष्य के प्रति अनिश्चितता से गढ़े गये हैं। आप समझें। हम एक संकेत या छवि बनाते हैं और उसी में फंस जाते, जकड़ जाते हैं। तो सर्वप्रथम हमें यह वास्तविकता जाननी होगी कि विचार वो चीज पैदा करता है जो हमं मनोवैज्ञानिक रूप से संतुष्टि प्रदान करती है, खुशी देती है। ठीक? वो हमें सुविधा देती है। ये संकेत या छवियां हमें अत्यंतिक सुविधा देती है। यह कुलमिलाकर संभ्रम है पर यह मुझे सुविधा देता है इसलिए मैं इससे परे कुछ देखता ही नहीं।