2 Sept 2009
31 Aug 2009
इस सजगता में एक ‘कुछ होने’ या ‘ना होने’ की इच्छारहित, एक विशेष विश्रांति, एक सकारात्मक जागरूकता होती है जिसमें मुक्ति की एक आश्चर्यजनक भावना चेतना में आती है।
यह अहसास केवल मिनिट भर के लिए, या केवल सेकंड भर के लिये ही हो सकता है पर काफी होता है। यह मुक्ति की भावना स्मृति से नहीं आती, यह एक जीवंत चीज है। लेकिन मन इसका स्वाद लेना चाहता है, इसका स्मृति में संचय करना, और बार-बार अधिक मात्रा में चाहता है।
इस पूरी प्रक्रिया के प्रति जागरूकता केवल आत्मज्ञान द्वारा ही संभव है। आत्मज्ञान आता है हमारे जीवन के क्षण-प्रति-क्षण को गहराई से देखने से - कि कैसे हम बोलते हैं, हमारे हावभाव, जिस तरह हम वातार्लाप करते हैं। इन सब चीजों को देखने से, अचानक इनके पीछे छिपे आशयों का ज्ञान होता है।
इसके बाद ही भय से मुक्त हुआ जा सकता है। जब तक भय है तब तक प्रेम नहीं हो सकता। भय हमारे जीवन को कलुषता से भर देता है, यह कलुषता किसी भी प्रार्थना, किसी भी आदर्श या गतिविधि से नहीं मिटाई जा सकती। इस भय का कारण ‘मैं’ ‘अहं’ का होना है। यह ‘मैं’ अपनी इच्छाओं, माँगों, लक्ष्यों सहित बहुत ही जटिल है।
हमारे मन को इस सारी प्रक्रिया को समझना है और यह समझ चुनावरहित चौकन्नेपन(जागरूकता) से आती है।
29 Aug 2009
इस सबसे हमारी अपनी विचारधारा की बंधी-बंधाई दशाएं अनावृत होती हैं, तो क्या यह बहुत जरूरी नहीं है कि हम इस पूरी प्रक्रिया के प्रति जागरूक रहें।
पल-दर-पल सत्य क्या है इसकी जागरूकता से उस समयातीत, आत्म की खोज की जा सकती है। आत्मज्ञान के बिना आपका अंतःकरण, आत्म कुछ भी नहीं। जब हम अपने आपको नहीं जानते तब तक ‘आत्मा’, ‘अन्तःकरण’ शब्दमात्र होते हैं। ये एक इशारा, आश्चर्य, एक पाखण्ड, एक विश्वास और एक भ्रम होता है जिसमें मन पलायन कर सकता है। जब कोई ‘मैं’ को समझना शुरू करता है, जब कोई अपनी दिन-प्रति-दिन की सारी भिन्न-भिन्न गतिविधियों को देखता-समझता है, उनके प्रति जागरूक रहना आरंभ करता है तो इस समझ में अनायास ही उस नामातीत, समयातीत का अभ्युदय होता है, अस्तित्व में आता है। पर इससे यह नहीं समझ लेना चाहिए कि वो नामातीत आत्मज्ञान की परिलब्धि होता है। नामातीत आत्मज्ञान की परिलब्धि नहीं है। उसके बाद अंतःकरण में ‘स्व’ नहीं दिखता, मन मस्तिष्क उसे नहीं पा सकते। वह तभी अस्तित्व में होता है जब मन शांत होता है। (कुछ लोग किसी की मृत्यु पर भी कहते हैं कि ‘‘वो शांत हो गया’’ ) मन के शांत, होने पर वह अस्तित्व में होता है। मन जब सहज रहता है, भंडारगृह की तरह अनुभवों, स्मृतियों के संचय, मूल्यांकन करने में नहीं लगा होता, तब वह सहज मन उस पूर्ण यथार्थ को समझ पाता है, वह मन नहीं जो मात्र शब्दों, ज्ञान, सूचनाओं से भरा हुआ हो।
24 Aug 2009
विचार के हर क्षण में एक निर्बाध जिज्ञासा
अपनेआप को जानने के लिए अमित अन्वेषण, अत्यंत श्रम की आवश्यकता है। उतनी मेहनत से भी ज्यादा जो आप जीवननिर्वाह के लिए करते हैं, जो दिनचर्या मात्र है। यहाँ विचार के प्रत्येक क्षण में अद्भुत जागरूकता और सतत प्रेक्षण की माँग होती है।
जिस क्षण से आप विचार प्रक्रिया में जिज्ञासा प्रारंभ करते हैं, जिसमें प्रत्येक विचार को अलग करना और उसके बारे में अंत तक सोचना है, तब आप जानते हैं कि यह कितना कठिन है। यह एक आलसी आदमी का आनन्द नहीं है। यह करना आवश्यक है क्योंकि यह केवल मन ही है जो स्वयं को पुरानी स्मृतियों, पुरानी विचलितताओं, उलझनों, परस्पर-आत्म-विरोध से खुद को रिक्त कर सकता है। और यह मन ही है जो यथार्थ के सृजनात्मक संवेग के साथ नयापन लिये रहता है, तब मन खुद ही कर्मों का सृजन करता है जो उसके अस्तित्व को अनूठे आयाम के साथ समग्रता से संबंधित करता है। इसके बिना किसी भी तरह के सामाजिक सुधार या पुर्ननिर्माण, जो कितने ही जरूरी हों, कितने ही लाभदायक हों किसी भी तरह शांत और खुशहाल विश्व नहीं दे सकते।