22 Feb 2014

what it means to die? मरना क्या है?


मरने के अर्थ खोजें—दैहिक रूप से नहीं, क्योंकि जिस्म से तो एक दिन विदाई तय है . लेकिन उस सब के प्रति मरना जिसे हम जानते हैं... अपने परिवार के प्रति, अपनी लगावों के प्रति, उन सारी चीजों के प्रति मरना जो अपने जमा कर रखी हैं.. जो जानी गई हैं... जानी गई खुशियां, जाने गये भय. उस हर एक मिनिट के प्रति मरें तो आप जानेंगे कि मरने का अर्थ क्या होता है...ताकि मन त्वरित ताजा हो सके, नित युवा हो सके, निर्दोष मासूम हो सके, ताकि आपका पुर्नजन्म पुर्नअवतार हो सके किसी अगले जन्म में नहीं... बस इसी पल आज ही.

Find out what it means to die - not physically, that's inevitable - but to die to everything that is known, to die to your family, to your attachments, to all the things that you have accumulated, the known, the known pleasures, the known fears. Die to that every minute and you will see what it means to die so that the mind is made fresh, young, and therefore innocent, so that there is incarnation not in a next life, but the next day.

~ Jiddu Krishnamurti

7 Dec 2013

चयन चुनना या पसंद


चयन चुनना या पसंद होश में बाधक है क्योंकि पसंद हमेशा द्वंद्व का परिणाम होती है. जब आप किसी कमरे में प्रवेश करे तो, सारे फर्नीचर, कारपेट के होने या उसके ना होने को देखें.. ऐस ही बहुत कुछ.. बस देखें भर... इन सबके प्रति बिना किसी तरह के निर्णय के, अवलोकनपूर्ण भर रह पाना बहुत ही कठिन है. क्या आपने कभी कोशिश की किसी व्यक्ति, फूल, किसी विचार, किसी भाव को बिना पसंद—नापसंद.. बिना किसी निर्णयभाव से देखने की ?

Choice obviously prevents awareness because choice is always made as a result of conflict. To be aware when you enter a room, to see all the furniture, the carpet or its absence, and so on, just to see it, to be aware of it all without any sense of judgment is very difficult. Have you ever tried to look at a person, a flower, at an idea, an emotion, without any choice, any judgment?

25 Nov 2013

''सुख—आनंद'' का अनुसरण समाज की संरचना है


हम में से अधिकतर जाहिर या अप्रत्यक्ष रूप से सुख और आनंद के पीछे पड़े रहते हैं और यही सुख आनंद समाज की संरचना है। मैं सोचता हूं यह जानना महत्वपूर्ण है क्योंकि जन्म से लेकर मृत्यु तक, गहरे में, सबसे बचकर, शातिराना रूप से और स्पष्टत: दमखम ठोक कर भी हम खुशी—आनंद का अनुसरण करते हैं। वो चाहे भगवान के नाम पर हो या समाज के नाम पर या हमारी स्वयं की मांगों और त्वरित इच्छाओं के रूप में हो हम सुख—आनंद का पीछा करते हैं। और जब हम सुख आनंद का अनुसरण करते हैं, जो कि हम आसान आसानी से देख सकते हैं कि 'हम सब कर ही रहे हैं '' तो देखें अवलोकन करें कि इस अनुसरण पीछा करने में क्या निहित है...? मैं सुख चाहता हूं, मैं किसी सुख को पाना—पूरा करना चाहता हूं... अपनी महत्वाकांक्षा से, नफरत से, ईष्या—जलन से या ऐसे ही कई चीजों से— यदि यह मैं जानूं या अवलोकन करूं देखूं.. स्वयं अपने में--अपने लिए इस सुख—आनंद की प्रकृति क्या है... तब मुझमैं इसकी समझ आ सकेगी। अवलोकन करूं जब मैं इसे बहुत तार्किक रूप से, निर्दयतापूर्वक, पूर्णत: खुली आंखों से इसका अभिनय करूं...जिसमें कि महान भय और पीड़ा का मसौदा निहित है और वह अवस्था भी जहां मैं शांतिपूर्वक जी सकूं।

Pleasure is the structure of society

Most of us are pursuing, outwardly and inwardly, pleasure, and pleasure is the structure of society. I think it is important to find this out, because from childhood till death, deeply, surreptitiously, cunningly and also obviously, we are pursuing pleasure, whether it be in the name of God, in the name of society, or in the name of our own demands and urgencies. And if we are pursuing pleasure, which most of us are, which we can observe very simply, what is implied in that pursuit? I may want pleasure, I may want the fulfilment of that pleasure, through ambition, through hate, through jealousy, and so on—if I know, or observe, for myself, the nature and structure of pleasure then in the understanding of it I can either pursue it logically, ruthlessly, acting with fully open eyes though it involves a great deal of fear and pain—or come upon a state in which I can live in peace.
Talks & Dialogues Saanen 1967, p 48



24 Feb 2013

डर

Picture with thanks from google..

अंदरूनी और बाहरी डर
हमें डर लगता है, केवल बाहरी कारणों से ही नहीं, अपने अंदर से भी। नौकरी-धंधा छूट जाने का डर, भोजन-पानी से महरूम रहने का डर, किसी पद पर बैठे हैं तो उसे गंवा देने का डर, अपने से ऊँचे पद पर बैठे अफसरों के वजह-बेवजह फटकारे-लताड़े जाने का डर..यानि तरह-तरह के बाहरी डर बने ही रहते हैं।

इसी तरह हम अंदर से भी डरे रहते हैं - हमेशा ना रह पाने..या मर जाने का डर, सफल न हो पाने का डर, मौत का डर, अकेलेपन का डर, कोई प्यार नहीं करता इसका डर, बहुत ही ऊब भरी वही रोजाना की घिसी-पिटी रूटीन जिंदगी का डर आदि।

हमारा शारीरिक डर वैसा ही है जैसे किसी पशु की प्रतिक्रिया
तो सबसे पहले शारीरिक डर आता है जो कि एक दैहिक प्रतिक्रिया है। चूंकि हममें बहुत कुछ पशुओं जैसा ही विरासत में है, हमारी दिमागी संरचना का एक बड़ा हिस्सा किसी पशु के दिमाग जैसा ही है। यह एक वैज्ञानिक तथ्य है। यह कोई कपोल कल्पित मत या संकल्पना नहीं वरन तथ्य है। पशु लोलुप होता है, उसे पुचकारा जाना, थपथपाया जाना अच्छा लगता है, ऐसा ही हम मनुष्यों के साथ भी है। पशु समूह में रहना पसंद करते हैं, मनुष्य भी। पशुओं की अपनी एक सामाजिक संरचना होती है, मनुष्य की भी। हम और भी विस्तार में जा सकते हैं पर यह प्राथमिक रूप से जानना पर्याप्त है कि हममे बहुत कुछ अभी भी पशुवत ही है।
अब प्रश्न उठता है कि - क्या हम पशु से विरासत में पाये प्रभाव और मानवीय समाज की सभ्यता-संस्कृति से अपने पर पड़े प्रभावों से, मुक्त हो सकते हैं? क्या यह संभव है कि हम पशु वृत्तियों से ऊपर उठ पाएं एक जुबानी जिज्ञासा के समाधान के रूप में ही नहीं बल्कि यथार्थ में यह खोज पाएं कि क्या हमारा मन उस समाज के प्रभाव से, उस संस्कृति के प्रभाव से परे जा सकता है जिसमें हम पले बढ़े हैं। क्योंकि जो है उससे बिल्कुल भिन्न आयाम किसी स्थिति की संभावना के लिए भयमुक्त होना आवश्यक है।
बुद्धिसंगत डर और काल्पनिक डर
यह बात साफ है कि आत्मरक्षा अपनी देह की रक्षा के लिए की गई प्रतिक्रिया डर नहीं होती। रोटी, कपड़ा और मकान यह हम सभी की जरूरत है, केवल अमीर या बड़े लोगों की ही नहीं। यह धरती पर रहने वाले प्रत्येक मनुष्य की जरूरत है। यह डर तो बुद्धिसंगत हैं... समस्या वो डर हैं जो इनसे इतर होते हैं, दिमागी फितूर होते हैं।

रोटी, कपड़ा और मकान प्रत्येक मनुष्य की आवश्यकता है लेकिन इसका हल राजनेताओं के पास नहीं। राजनेताओं ने सारी दुनियां को देशों में विभाजित कर दिया है। इन देशों की अपनी अपनी प्रभुतासंपन्न सरकारें हैं, अपनी सेना होती है और राष्ट्रवाद जैसी तमाम तरह की जहरीली मूर्खताएं होती हैं। राजनीतिक समस्या केवल एक है और वह है मनुष्य और मनुष्य के बीच में एकता लाना और वह तक नहीं लायी जा सकती जब तक आप अपने राष्ट्रीय या जातीय विभाजन से चिपके हुए हैं। अगर आपका घर जल रहा हो तो आप यह नहीं पूछते कि पानी कौन ला रहा है? जिस व्यक्ति ने घर में आग लगाई उसके बालों का रंग भी नहीं पूछते.. आपको तो बस आग बुझाने के लिए पानी का इंतजाम करना होता है। जैसे धर्मों ने मनुष्यों को विभाजित कर दिया है वैसे ही राष्ट्रीयता ने भी मनुष्यों को बांट दिया है। राष्ट्रीयताओं और धार्मिक विश्वासों ने मनुष्य को मनुष्य के खिलाफ खड़ा कर दिया है, एक दूसरे का दुश्मन बना दिया है। लेकिन यह कोई भी देख सकता है कि ऐसा क्यों हो पा रहा है वो इसलिए कि हम कूपमंडूक बने रहना चाहते हैं।

इसलिए मनुष्य को इन डरों से मुक्त होना होगा, परंतु यह बहुत ही दुष्कर कार्यों में से एक है। अधिकांशतः तो हम जान ही नहीं पाते कि हम डरे हुए हैं, ना ही यह जानते हैं कि हम किस बात से डरें हैं। यदि हम जान भी जायें कि हम डरें हुए हैं तो यह नहीं जानते कि तब करें क्या? अतः हम जो हैं उससे दूर भागने लगते हैं, पलायन करने लगते हैं.. जबकि डर तो हम खुद ही हैं, भाग कर जहां भी जायेंगे डर और बढ़ा हुआ मिलेगा। और दुर्भाग्यवश हमने पलायनों का एक जाल फैला लिया है।

डर का जन्म
डर पैदा कैसे होता है - आने वाले कल का डर, रोजी-रोटी छूट जाने का डर, रोगग्रस्त हो जाने का डर, दर्द का डर। डर में बीते हुए और आने वाले समय के विषय में विचारों कि एक प्रतिक्रिया समाई रहती है। अतीत का कुल जमा जोड़ ”मैं“ भविष्य में ‘क्या होगा’ इससे डरा रहता है। तो डर आता कैसे है? डर का हमेशा किसी ना किसी चीज से संबंध होता है- वरना डर होता ही नहीं। इसलिए हम आने वाले कल से, जो हो गया है उससे, या जो होने वाला है उससे डरे रहते हैं। इस डर को लाया कौन? क्या डर को लाने वाला -विचार- ही नहीं है?

विचार है डर का मूल
तो विचार है डर का जन्मदाता। मैं अपनी नौकरी-कामधंधा छूट जाने के बारे में या इसकी आशंका के बारे में सोचता हूं और यह सोचना, यह विचार डर को जन्म देता है। इस प्रकार विचार खुद को समय में फैला देता है, क्योंकि विचार समय ही है। मैं कभी किसी समय जिस रोग से ग्रस्त रहा.. मैं उस विषय में सोचता हूं, क्योंकि उस समय का दर्द .. बीमारी का अहसास मुझे अच्छा नहीं लगता इसलिए मैं डर जाता हूं कि मुझे फिर वही बीमारी ना हो जाये। दर्द का एक अनुभव मुझे हो चुका है, उसके विषय में विचारना और उसे ना पसंद करना डर पैदा कर देता है। डर का सुख-विलासिता से करीबी रिश्ता है, निकट का संबंध है। हममें से अधिकांश लोग सुख-विलास से प्रेरित रहते हैं, संचालित रहते हैं। किसी पशु की भांति एैन्द्रिक सुख हमारे लिए सर्वोच्च महत्व रखते हैं। यह सुख विचार का ही एक हिस्सा होता है। जिस चीज से सुख मिला हो उसके बारे में सोचने से सुख मिलता है.. सुख बढ़ जाता है, है ना? क्या आपने इस सब पर ध्यान दिया है? आपको किसी ऐसा सुख का कोई अनुभव हुआ हो- किसी सुंदर सूर्यास्त का या यौन संबंध का... और आप उसके बारे में सोचते हैं। उसके बारे में सोचना, उस सुख को बढ़ा देता है, जैसे आपके द्वारा अनुभूत किसी पीड़ा के बारे में सोचना,, डर पैदा कर देता है.. डरा देता है। अतएव विचार ही मन में पैदा होने वाले सुख का या डर का जनक है, है न? विचार ही सुख की मांग करने और उसकी निरंतरता चाहने के लिए जिम्मेदार है, वह भय को जन्म देने के लिए, डर का कारण बनने के लिए जिम्मेदार है। यह बात एकदम साफ है, प्रयोग करके देखा जा सकता है।

तब मैं खुद से पूछता हूं... जबकि मैं यह सब जानता हूं... तब क्या ऐसा संभव है कि सुख या दुःखदर्द के बारे में मैं सोचूं ही ना? क्या यह संभव है कि जब विचारणा की जरूरत हो तब ही सोचा जाए, अन्यथा बिल्कुल नहीं? महोदय, जब आप किसी दफ्तर में काम करते हैं, आजीविका में लगे होते हैं, तब विचार जरूरी होता है वरना आप कुछ कर नहीं सकेंगे। जब आप बोलते हैं, लिखते हैं, बात करते हैं, कार्यालय जाते हैं तब विचार जरूरी होता है। वहां विचार को ऐन सही ढंग से, निर्वैयक्तिक रूप से काम करना होता है। वहां उसे किसी रूझान या आदत के हिसाब से नहीं चलना होता। वहां विचार सार्थक है। परंतु क्या किसी भी अन्य क्रिया के क्षेत्र में विचार आवश्यक है?

कृपया इसे समझें। हमारे लिए विचार अत्यंत महत्वपूर्ण है। हमारे पास यही तो एकमात्र उपकरण है। यह विचार उस स्मृति की प्रतिक्रिया है जो अनुभव, ज्ञान और परंपराओं द्वारा संचित कर ली गयी है। स्मृति होती है समय का परिणाम, पशुता से मिली विरासत। इसी पृष्ठभूमि से हम प्रतिक्रिया करते हैं। यह प्रतिक्रया विचारगत होती है। विचार कुछ निश्चिित स्तरों पर तो जरूरी होता है परंतु जब यह बीते हुए और आने वाले समय में, अतीत और भविष्य में स्वयं को मानसिक तौर पर फैलाने लगता है तब यह डर पैदा करता है और सुख भी परंतु इस प्रक्रिया में मन मंद हो जाता है और इसी वजह से अपरिहार्यतः अकर्मण्यता आ जाती है। डर ख़याल की पैदाइश है। तो क्या विचार मनोवैज्ञानिक रूप से, आत्मरक्षात्मक रूप से या भविष्य के विषय में सोचना बंद कर सकता है?
चीजों, व्यक्तियों और विचारों पर निर्भरता भय को जन्म देती है। निर्भरता उपजती है अज्ञान से, खुद को ना जानने के कारण, अंदरूनी गरीबी के कारण, खुद के बारे में ही कोई अता-पता ना होने से। डर, दिल दिमाग की अनिश्चितता का कारक बनता है और यह अनिश्चितता संप्रेषण और समझ-बूझ मंे बाधक बनती है। स्व के प्रति सजगता द्वारा हम खोजना शुरू करते हैं और इससे डर की वजह को समझ पाते हैं - केवल सतही डरों को ही नहीं बल्कि गहरे कारणजात और सदियों से इकट्ठे डरांे को भी। डर अंदर से भी पैदा होता है और बाहर से भी आता है। यह अतीत से जुड़ा होता है। अतः अतीत से विचार भावना को मुक्त करने के लिए अतीत को समझा जाना आवश्यक है और वह भी वर्तमान के माध्यम से। अतीत सदैव वर्तमान को जन्म देने को आतुर रहता है जो ‘मुझे’, ‘मेरे’ और ‘मैं’ की तद्रूप स्मृति बन जाता है। यह सारे भय का मूल है।

25 Sept 2012

ध्यान का स्वरूप क्या हो?


लतें या आदतें और ध्यान साथ-साथ नहीं टिके रह सकते।
ध्यान कभी भी एक आदत नहीं बनाया जा सकता, ध्यान कभी भी उस ढर्रे का अनुगमन नहीं करता जो किसी विचार द्वारा गढ़ा गया हो और जो आदत बन जाए। ध्यान है विचार का विध्वंस। 
ध्यान ये बात है कि, विचार अपनी ही उलझनों, कल्पनाओं और अपनी ही निर्थकता का अनुगमन ना करे। 
जब विचार अपनी ही निरर्थकता के विरूद्ध जाकर खुद को ही विखंडित करने लग जाये, चकनाचूर करने लग जाये...तब ध्यान का विस्फोट होता है। इस ध्यान का अपनी ही गति होती है....दिशा रहित और इसलिए कारणरहित भी।
जेकृष्णमूर्ति, नोटबुक, पेज 213


"Habit and meditation can never abide together; meditation can never become a habit; meditation can never follow the pattern laid down by thought which forms habit. Meditation is the destruction of thought and not thought caught in its own intricacies, visions and its own vain pursuits. Thought shattering itself against its own nothingness is the explosion of meditation. This meditation has its own movement, directionless and so is causeless. "
- J. Krishnamurti's Notebook, p.213


9 Apr 2012

खुद को जानना और बदलना


बातों, तर्क-वितर्क और व्याख्याओं का कोई अन्त नहीं होता। लेकिन व्याख्याएं, तर्क वितर्क और बातें, हमें किसी सीधी कार्यवाही तक नहीं ले जाते क्योंकि सीधी कार्यवाही, सीधे तुरन्त कर्म तक पहुंचने के लिए हमें मौलिक और आधारभूत रूप से बदलने की आवश्कता होती है। यदि शब्दों की गहराई से सोचें तो इसके लिए किसी भी तर्कवितर्क, लफ्फाजी, ना बहलाने-फुसलाने, ना किसी सूत्र, ना किसी से प्रभावित होने की आवश्यकता होती है.. कि हम मूलभूत रूप से बदल सकें। हममें बदलाव की आवश्कता तो है, लेकिन किसी विशेष संकल्पना या सिद्धांत के अनुसार नहीं, क्योंकि जब हमारे पास किसी कर्म के बारे में कोई विचार या धारणा होती है, तो कर्म चुक जाता है। कर्म और विचार या धारणा के बीच एक समय अन्तराल होता है, एक स्थगन/देरी होती है और इस समय अंतराल में उस विचार/धारणा के प्रति या तो प्रतिरोध होता है, या सुनिश्चितता या किसी विचार या धारणा की नकल/अनुकरण और उसे कर्म में परिणित करने की कोशिश। यही तो वह सब है जो हम में से अधिकतर लोग, हमेशा करते रहते हैं। हम जानते हैं कि हमें बदलना है, न केवल बाहरी तौर पर बल्कि गहरे तक--मनोवैज्ञानिक रूप से।

बाहरी बदलाव तो बहुत से हैं। वे हमें किसी कार्य प्रणाली/किसी तौर तरीके के अनुसार सुनिश्चित होने के लिए या कहें कि एक ढर्रे पर चलने के लिए बाध्य करते हैं, लेकिन रोजमर्रा की जिन्दगी की चुनौतियों का सामना करने के लिए हममें गहन क्रंाति की आवष्यकता होती है। हममें से अधिकांष लोगों के पास कोई न कोई पूर्वनिर्धारित विचार या धारणा होती है कि हमें क्या होना चाहिए, परंतु हम कभी बुनियादी तौर से नहीं बदल पाते। हमें क्या होना चाहिए-इस संबंध में विचार और मनोभाव हममें कोई परिवर्तन नहीं ला पाते। हम तभी बदलते हैं जब यह नितंात आवष्यक हो जाता है, क्योंकि हम परिवर्तन की आवश्यकता को कभी सीधे-सीधे अपने सामने, साक्षात् नहीं देख पाते। हम कभी बदलना भी चाहते हैं, तो हममें भारी द्वंद्व और प्रतिरोध खड़ा हो जाता है और हम प्रतिरोध करने में, अवरोध खड़े करने में अपनी विपुल ऊर्जा व्यर्थ कर देते हैं ...

एक भला समाज बनाने के लिये मानव जाति को स्वयं में बदलाव लाना होगा। मन के इस आमूल परिवर्तन के लिये आपको और मुझे ऊर्जा, संवेग और जीवन-शक्ति तलाशनी होगी, पर्याप्त ऊर्जा के बिना यह संभव नहीं है। स्वयं में बदलाव लाने के लिये हमें विपुल ऊर्जा चाहिए, परंतु हम अपनी यह ऊर्जा द्वंद्व, प्रतिरोध, अनुकरण, स्वीकरण और अनुपालन में व्यर्थ गवंते हैं, किसी ढर्रे का अनुकरण करना अपनी ऊर्जा व्यर्थ गवांना है। अपनी ऊर्जा को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिये हमें स्वयं के प्रति सजग रहना होगा, अपनी ऊर्जा का हम कैसे-कैसे अपव्यय करते हैं इसके प्रति सजग रहना होगा।  यह युग-युगांतकारी समस्या है, क्योंकि अधिकांषतः मनुष्य अकर्मण्य होते हैं। वे स्वीकार करने, अनुपालन करने और अनुसरण करने को प्राथमिकता देते हैं। यदि हम इस अकर्मण्यता और गहराई तक अपनी जड़ें जमाये हुए आलस्य को जान लें और अपने मन-मस्तिष्क में प्रयासपूर्वक स्फूर्ति ले आएं तो इसकी प्रबलता पुनः एक द्वंद्व बन जाती है और यह भी ऊर्जा का अपव्यय ही है।

हमारी अनेक समस्याएं हैं और उनमें से एक है कि ऊर्जा का संरक्षण कैसे किया जाए--उस ऊर्जा का संरक्षण जो चेतना के प्रस्फुटन के लिये आवष्यक होती है-वह प्रस्फुटन नहीं जो सुनियोजित होता है या जो विचार द्वारा गढ़ी गई, एक जुगाड़ होता है, बल्कि वह प्रस्फुटन जो इस ऊर्जा का अपव्यय न किये जाने पर स्वमेव घटता है... हम अपनी चेतना में एक आमूल क्रंाति लाने के लिये संपूर्ण ऊर्जा को एकत्र करने की जरूरत पर बात कर रहे हैं, क्योंकि हमारे पास एक नया ताजा मन होना ज़रूरी है; तो, हमें जीवन को एक नितंात भिन्न दृष्टि से देखना होगा।