20 Mar 2010

जे. कृष्णमूर्ति जी का परि‍चय





जे. कृष्णमूर्ति का जन्म 11 मई 1895 को आन्ध्रप्रदेश के एक छोटे से कस्बे मदनापल्ली में एक धर्म परायण परिवार में हुआ था। उनका पूरा नाम जिड्डू या जिद्दू कृष्णमूर्ति है।

विभिन्न धर्मग्रंथो में वर्णित इस मान्यता के अनुसार कि मानवता के उद्धार के लिए समय-समय पर परमचेतना मनुष्य रूप में अवतरित होती है, थियोसोफिकल सोसायटी के सदस्य पहले ही किसी विश्वगुरू के आगमन की भविष्यवाणी कर चुके थे। श्रीमती बेसेंट और थिऑस्फ़िकल सोसायटी के प्रमुखों को जे.कृष्णमूर्ति में वह विशिष्ट लक्षण दिखे जो कि एक विश्वगुरू में होते हैं। तो श्रीमती बेसेंट द्वारा किशोरवय में ही जे.कृष्णमूर्ति को गोद लेकर उनकी परवरिश पूर्णतया धर्म और आध्यत्म से ओतप्रोत परिवेश में की गई। उनकी संपूर्ण शिक्षा इंग्लैंड में हुई।

जे कृष्णमूर्ति ने किसी जाति, राष्ट्रयता अथवा धर्म में अपनी निष्ठा व्यक्त नहीं की ना ही वे किसी परंपरा से आबद्ध रहे।
सन् 1922 में श्री कृष्णमूर्ति किन्हीं गहरी आध्यात्मिक अनुभूतियों से होकर गुजरे और उन्हें उस करूणा का स्पर्श हुआ जिसके बारे में उन्होंने स्वयं कहा ”वो करूणा सारे दुख, कष्टों को हर लेती है“।

उन्होंने सत्य के मित्र और प्रेमी की भूमिका निभायी लेकिन स्वयं को कभी भी गुरू के रूप में नहीं रखा। उन्होंने जो भी कहा वह उनकी अन्तर्दृष्टि का संप्रेषण था। उन्होनंे दर्शनशास्त्र की किसी नई पद्धति या प्रणाली की व्याख्या नहीं की, बल्कि मनुष्य की रोज़मर्रा की जिन्दगी से ही - भ्रष्ट और हिंसापूर्ण समाज की चुनौतियों, मनुष्य की सुरक्षा और सुख की खोज, भय, दुख, क्रोध जैसे विषयों पर कहा। बारीकी से मानव मन की गुत्थियों को सुलझा कर लोगों के सामने रखा। दैनिक जीवन में ध्यान के यथार्थ स्वरूप, धार्मिकता की महत्ता के बारे में बताया। उन्होनंे विश्व के प्रत्येक मानव के जीवन में उस आमूलचूल परिवर्तन की बात कही जिससे मानवता की वास्तविक प्रगति की ओर उन्मुख हुआ जा सके।

उन्होंने हमेशा इस बात पर जोर दिया कि मनुष्य की वैयक्तिक और सामाजिक चेतना दो भिन्न चीजें नहीं, ”पिण्ड में ही ब्रम्हांड है“ इस को समझाया। उन्होंने बताया कि वास्तव में हमारी भीतर ही पूरी मानव जाति पूरा विश्व प्रतिबिम्बित है। प्रकृति और परिवेश से मनुष्य के गहरे रिश्ते और प्रकृति और परिवेश से अखण्डता की बात की। उनकी दृष्टि मानव निर्मित सारे बंटवारों, दीवारों, विश्वासों, दृष्टिकोणों से परे जाकर सनातन विचार के तल पर, क्षणमात्र में जीने का बोध देती है।
बुदधत्व उपरांत 65 वर्षों तक वे अनथक सारी दुनियां में भ्रमण करते हुए निज अर्न्तदृष्टि से उद्भूत सार्वजनिक वार्ताओं, साक्षात्कार, निजी विवेचनाओं, संवाद, लेखन और व्याख्यानों के माध्यम से सत्य के विभिन्न पहलुओं से लोगों को परिचित कराते रहे। उन्होंने बताया कि किसी भी गुरू, संगठित धर्म, राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक उपाय से मनुष्य में भलाई, प्रेम और करूणा नहीं पैदा की जा सकती।

उन्होंने कहा कि मनुष्य को स्वबोध के जरिये, अपने आपसे परिचय करते हुए स्वयं को भय, पूर्वसंस्कारों, सत्ता प्रामाण्य और रूढ़िबद्धता से मुक्त करना होगा, यही मनुष्य में व्यवस्था और आमूलचूल मनोवैज्ञानिक परिवर्तनों का आधार हो सकता है।

हर तरह की आध्यात्मिक तथा मनोवैज्ञानिक दावेदारी को नकारना और उन्हें भी कोई गुरू या अथॉरिटी ना बना डाले इससे आगाह करना उनके चेतावनी वाक्य थे।

अपने कार्य के बारे में उन्होंने कहा ”यहां किसी विश्वास की कोई मांग या अपेक्षा नहीं है, यहां अनुयायी नहीं है, पंथ संप्रदाय नहीं है, व किसी भी दिशा में उन्मुख करने के लिए किसी तरह का फुसलाना प्रेरित करना नहीं है, और इसलिए हम एक ही तल पर, एक ही आधार पर और एक ही स्तर पर मिल पाते हैं, क्योंकि तभी हम सब एक साथ मिलकर मानव जीवन के अद्भुत घटनाक्रम का अवलोकन कर सकते हैं।”

जे कृष्णमूर्ति ने स्वयं तथा उनकी शिक्षाओं को महिमा मंडित होने से बचाने और उनकी शिक्षाओं की व्याख्या की जाकर विकृत होने से बचाने के लिए लिए अमरीका, भारत, इंग्लैंड, कनाडा और स्पेन में फाउण्डेशन स्थापित किये।
भारत, इंग्लैण्ड और अमरीका में विद्यालय भी स्थापित किये जिनके बारे में उनका दृष्टिबोध था कि शिक्षा में केवल शास्त्रीय बौद्धिक कौशल ही नहीं वरन मन-मस्तिष्क को समझने पर भी जोर दिया जाना चाहिये। जीवन यापन और तकनीकी कुशलता के अतिरिक्त जीने की कला कुशलता भी सिखाई जानी चाहिए।

17 फरवरी 1986 को जे कृष्‍णमूर्ति‍ जी का देहावसान हुआ।
जे कृष्णमूर्ति के मौलिक दर्शन ने पारंपरिक, गैरपरंपरावादी विचारकों, दार्शनिकों, शीर्ष शासन-संस्थाप्रमुखों, भौतिक और मनोवैज्ञानियों और सभी धर्म, सत्य और यथार्थपरक जीवन में प्रवृत्त सुधिजनों को आर्कर्षित किया और उनकी स्पष्ट दृष्टि से सभी आलोकित हुए हैं।

उनके साहित्य में सार्वजनिक वार्ताएं, प्रश्नोत्तर, परिचर्चाएं, साक्षात्कार, परस्पर संवाद, डायरी और उनका खुद का लेखन शामिल है जो कि अब तक 75 से अधिक पुस्तकों और 700 से अधिक ऑडियो और 1200 से अधिक वीडियो कैसेट्स सीडी के रूप में उपलब्ध है। उनका मूल साहित्य अंग्रेजी भाषा में है, जिसका कई मुख्य प्रचलित भाषाओं में अनुवाद किया गया है। वार्ताएं, प्रश्नोत्तर, परिचर्चाएं, साक्षात्कार, परस्पर संवाद, प्रवचनों के ऑडियो और वीडियो टेप भी उपलब्ध हैं।

उनसे जुड़ी प्रमुख वेबसाईट्स पते निम्नलिखित हैं:

Krishnamurti Foundation of India, 

Chennai, India : Vasanta Vihar, 124 Greenways Road, Madras 600 028

Tel: (91)(44) 24937803/24937596 Fax: (91)(44) 24952328
Email: publications@kfionline.org Web: www.kfionline.org

Fundación Krishnamurti Latinoamericana, Barcelona, Spain Tel: (34) 938 695 042

Web:www.kfa.orgE-mail: fkl@fkla.org Web: www.fkla.org

Krishnamurti Foundation Trust, Brockwood Park, Bramdean, England

Brockwood Park
Bramdean, Hampshire SO24 0LQ, England
Tel: +44 (0) 1962 771525 Fax: +44 (0) 1962 771159
Email: info@kfoundation.org Web: www.kfoundation.org

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P.O.Box 1560, Ojai, CA 93024, USA. Tel: 805-646-2726 Fax: 805-646-6674

9 Mar 2010

ध्यान का अनूठापन


ध्यान, निस्तब्ध और सुनसान मार्ग पर इस तरह उतरता है जैसे पहाड़ियों पर सौम्य वर्षा। यह इसी तरह सहज और प्राकृतिक रूप से आता है जैसे रात। वहां किसी तरह का प्रयास या केन्द्रीकरण या विक्षेप विकर्षण पर किसी भी तरह का नियंत्रण नहीं होता। वहां पर कोई भी आज्ञा या नकल नहीं होती। ना किसी तरह का नकार होता है ना स्वीकार। ना ही ध्यान में स्मृति की निरंतरता होती है। मस्तिष्क अपने परिवेश के प्रति जागरूक रहता है पर बिना किसी प्रतिक्रिया के शांत रहता है, बिना किसी दखलंदाजी के, वह जागता तो है पर प्रतिक्रियाहीन होता है।
वहां नितांत शांति स्तब्धता होती है पर शब्द विचारों के साथ धंुधले पड़ जाते हैं। वहां अनूठी और निराली ऊर्जा होती है, उसे कोई भी नाम दें, वह जो भी हो उसका महत्व नहीं है, वह गहनतापूर्वक सक्रिय होती है बिना किसी लक्ष्य और उद्देश्य के। वह सृजित होता है बिना कैनवास और संगमरमर के... बिना कुछ तराशे या तोड़े। वह मानव मस्तिष्क की चीज नहीं होती, ना अभिव्यक्ति की.. कि अभिव्यक्त हो और उसका क्षरण हो जाये। उस तक नहीं पहुंचा जा सकता, उसका वर्गीकरण या विश्लेषण नहीं किया जा सकता। विचार और भाव या अहसास उसको जानने समझने के साधन नहीं हो सकते। वह किसी भी चीज से पूर्णतया असम्बद्ध है और अपने ही असीम विस्तार और अनन्तता में अकेली ही रहती है। उस अंधेरे मार्ग पर चलना, वहां पर असंभवता का आनंद होता है ना कि उपलब्धि का। वहां पहुंच, सफलता और ऐसी ही अन्यान्य बचकानी मांगों और प्रतिक्रियाओं का अभाव होता है। होता है तो बस असंभव असंभवता असंभाव्य का अकेलापन। जो भी संभव है वह यांत्रिक है और असंभव की परिकल्पना की जा सके तो कोशिश करने पर उसे उपलब्ध किये जा सकने के कारण वह भी यांत्रिक हो जायेगा। उस आनन्द का कोई कारण या कारक नहीं होता। वह बस सहजतः होती है, किसी अनुभव की तरह नहीं बस अपितु किसी तथ्य की तरह। किसी के स्वीकारने या नकारने के लिए नहीं, उस पर वार्तालाप या वादविवाद या चीरफाड़-विश्लेषण किये जायें इसके लिए भी नहीं। वह कोई चीज नहीं कि उसे खोजा जाये, उस तक पहुंचने का कोई मार्ग नहीं। सब कुछ उस एक के लिए मरता है; वहां मृत्यु और संहार प्रेम है। क्या आपने भी कभी देखा है - कहीं बाहर, गंदे मैले कुचैले कपड़े पहने एक मजदूर किसान को जो सांझ ढले... अपनी मरियल हड्डियों का ढांचा रह गई गाय के साथ घर लौटता है।

Meditation

Meditation, along that quiet and deserted road came like a soft rain over the hills; it came as easily and naturally as the coming night. There was no effort of any kind and no control with its concentrations and distractions; there was no order and pursuit; no denial or acceptance nor any continuity of memory in meditation. The brain was aware of its environment but quiet without response, uninfluenced but recognizing without responding. It was very quiet and words had faded with thought. There was that strange energy, call it by any other name, it has no importance whatsoever, deeply active, without object and purpose; it was creation, without the canvas and the marble, and destructive; it was not the thing of human brain, of expression and decay. It was not approachable, to be classified and analysed, and thought and feeling are not the instruments of its comprehension. It was completely unrelated to everything and totally alone in its vastness and immensity. And walking along that darkening road, there was the ecstasy of the impossible, not of achievement, arriving, success and all those immature demands and responses, but the aloneness of the impossible. The possible is mechanical and the impossible can be envisaged, tried and perhaps achieved which in turn becomes mechanical. But the ecstasy had no cause, no reason. It was simply there, not as an experience but as a fact, not to be accepted or denied, to be argued over and dissected. It was not a thing to be sought after for there is no path to it. Everything has to die for it to be, death, destruction which is love. A poor, worn-out labourer, in torn dirty clothes, was returning home with his bone-thin cow.

Krishnamurti s Notebook Part 6 Madras 3rd Public Talk 29th December 1979

2 Mar 2010

वि‍चार का अन्‍त - ध्‍यान है

मन और मस्तिष्क की गुणवत्ता, ध्यान में महत्वपूर्ण है। यह महत्वपूर्ण नहीं है कि आपने क्या उपलब्ध किया या उपलब्धि के बारे में आप क्या कह रहे हैं, बल्कि मन का वह गुण है जो निर्दोष और अतिसंवेदनशील है। नकार के द्वारा सकारात्मक अवस्था तक पहुंचा जाता है। हम समूह में रहें या अपने में, अनुभव के द्वारा, ध्यान की शुद्धता को नकारते हैं। किसी अन्त पर पहुंचना ध्यान का ध्येय नहीं है। यह ध्येय भी है और साथ ही उसकी समाप्ति भी। अनुभव के द्वारा मन को कदापि निर्दोष या शुद्ध नहीं बनाया जा सकता। अनुभव को नकारने पर ही निर्दोषता की सकारात्मक अवस्था तक पहुंचा जाता है जो कि विचार द्वारा नहीं गढ़ी जा सकती। विचार कभी भी निर्दोष नहीं होता। ध्यान विचार की समाप्ति है, पर ध्यान करने वाले के द्वारा नहीं, ध्यान करने वाले के लिए ध्यान है। यदि ध्यान नहीं है तो प्रकाश और रंगों के अति सुन्दर विश्व में जैसे आप एक अंधे आदमी की तरह हैं। आप कभी सागर किनारे भटकें तो ध्यान के ये गुण आपके पास आते हैं। यदि कभी ऐसा होता है तो उनका पीछा ना करें। यदि आप उनका अनुसरण करते हैं तो यह आपकी स्मृति का सक्रिय होना है जो अतीत होता है और ....जो है उसकी मृत्यु अतीत है। या जब आप जंगलों पहाड़ों में विचरण कर रहे हों तो अपने आस-पास के सम्पूर्ण वातावरण को, सब कुछ को जीवन के सौन्दर्य और पीड़ाओं को आपसे कहने दें ताकि आप भी अपने दुख के प्रति जागरूक हो सकें और ये दुख खत्म हो सकें।
ध्यान जड़ है, ध्यान पौधा है। ध्यान फूल है और ध्यान फल है। यह शब्द ही हैं जो फल, फूल, पौधे और जड़ को अलग अलग कर देते या बांट देते हैं। इस बंटवारे में कोई भी कर्म भलेपन तक नहीं पहुंचता और सद्गुण या भलाई सम्पूर्ण दृष्टि से ही जन्मते हैं।


Meditation in the ending of thought

What is important in meditation is the quality of the mind and the heart. It is not what you achieve, or what you say you attain, but rather the quality of a mind that is innocent and vulnerable. Through negation there is the positive state. Merely to gather, or to live in, experience, denies the purity of meditation. Meditation is not a means to an end. It is both the means and the end. The mind can never be made innocent through experience. It is the negation of experience that brings about that positive state of innocency which cannot be cultivated by thought. Thought is never innocent. Meditation is the ending of thought, not by the meditator, for the meditator is the meditation. If there is no meditation, then you are like a blind man in a world of great beauty, light and colour. Wander by the seashore and let this meditative quality come upon you. If it does, don't pursue it. What you pursue will be the memory of what it was - and what was is the death of what is. Or when you wander among the hills, let everything tell you the beauty and the pain of life, so that you awaken to your own sorrow and to the ending of it. Meditation is the root, the plant, the flower and the fruit. It is words that divide the fruit, the flower, the plant and the root. In this separation action does not bring about goodness: virtue is the total perception.
The Second Penguin Krishnamurti Reader Talks in Europe 1968

22 Feb 2010

आमूलचूल क्रांति‍

क्या आप कोई ऐसी क्रांति चाहते हैं जो आपकी सारी संकल्पनाओं, विश्वासों, मूल्यों, आपकी नैतिकता, आपकी सम्मानीयता, आपके ज्ञान को तहस-नहस कर दे। इस प्रकार तहस नहस कर दे कि आप अत्यंतिक सम्पूर्ण रूप से नाकुछ हो जायें, यहां तक कि आपका कोई चरित्र ही न बचे। वो व्यक्ति ही न बचे जो खोजी है, जो आदमी फैसले करता है, जो क्रोधी और अक्रोधी है। आप पूर्णतः कुछ भी होने से खाली हो जायें, जो भी ‘‘आप’’ हैं।
यह खालीपन अपने चरम तप सहित परम सौन्दर्य होता है जिसमें कठोरता या आक्रामकता का दावा करती कोई चिंगारी नहीं होती। यही उस भेद का अर्थ है जो बाद में वहां होता है। वहा आश्चर्यजनक समझ बोध होता ही है, ना कि सूचना और सीखना। यही विवेक या समझ बोध सर्वदा रहता है, आप चाहे सो रहे हों या जाग रहे हों। इसलिए हम कहते हैं कि वहां केवल अन्दर और बाहर का अवलोकन होना चाहिए जो कि बुद्धि मस्तिष्क को तीक्ष्ण करता है। मस्तिष्क की यह तीक्ष्णता उसे शांत बनाती है। मस्तिष्क की इस संवेदनशीलता और समझ बोधपरकता ही विचार को संचालित करती है जब उसकी आवश्यकता हो, अन्य समय मस्तिष्क सोया नहीं रहता पर द्रष्टा हो शांत हो रहता है। इसलिए मस्तिष्क या दिमाग अपनी प्रतिक्रियाओं से संघर्ष नहीं पैदा करता। यह बिना किसी जूझने के, इसलिए बिना किसी विक्षिप्तता या विक्षेप के काम करता है। तब करना और होना या किया जाना और अमल में होना तुरत एकसाथ होता है, वैसे ही जैसे कभी आप खतरे में पड़ें और जो बन पड़े तुरन्त सम्पन्न कर दें। इसलिए वहां पर हमेशा संकल्पनात्मक चीजों से मुक्ति रहती है। यह संकल्पनात्मक चीजें ही हैं जो अवलोकनकर्ता, मैं, अहं हो जाती हैं, जो बांटती हैं, प्रतिरोध करती हैं और अवरोध बनाती हैं। जब ‘मैं’ नहीं होता, तो सफलता, फल या परिणाम का कोई भेद नहीं रहता तब सम्पूर्ण जीवन, सौन्दर्य को जीना होता है। तब सम्बंधों में भी सौन्दर्य होता है बिना किसी एक छवि को दूसरी छवि से प्रतिस्थापित किये। तभी अनन्त महानता का अवतरण संभव होता है।


Is this really what you are seeking? Is it really what you want? If you do, there must be the total revolution of your being. Is this what you want? Do you want a revolution that shatters all your concepts, your values, your morality, your respectability, your knowledge - shatters you so that you are reduced to absolute nothingness, so that you no longer have any character, so that you no longer are the seeker, the man who judges, who is agressive or perhaps non-aggressive, so that you are completely empty of everything that is you? This emptiness is beauty with its extreme austerity in which there is not a spark of harshness or agressive assertion. That is what breakthrough means and is that what you are after? There must be astonishing intelligence, not information or learning. This intelligence operates all the time, whether you are asleep or awake. That is why we said there must be the observation of the inner and the outer which sharpens the brain. And this very sharpness of the brain makes it quiet. And it is this sensitivity and intelligence that make thought operate only when it has to; the rest of the time the brain is not dormant but watchfully quiet. And so the brain with its reactions doesn't bring about conflict. It functions without struggle and therefore without distortion. Then the doing and the acting are immediate, as when you are in danger. Therefore there is always a freedom from conceptual accumulations. It is this conceptual accumulation which is the observer, the ego, the "me" which divides, resists and builds barriers. When the "me" is not, the breakthrough is not, then there is no breakthrough; then the whole of life is in the beauty of living, the beauty of relationship, without substituting one image for another. Then only the infinitely greater is possible.
 
Meeting Life Early Works, circa 1930 

20 Feb 2010

कुछ भी समझने के लिए आपको उसके साथ जीना होगा



कुछ भी जानने समझने के लिए आपको उसके साथ जीना होगा, उसका अवलोकन करना ही होगा, आपको उसके सभी पहलू, उसकी सारी अंर्तवस्तु, उसकी प्रकृति, उसकी संरचना, उसकी गतिविधियां जाननी होंगी। क्या आपने कभी अपने ही साथ जीने की कोशिश की है? यदि कि है तो आपने यह देखना भी शुरू किया होगा कि आप एक स्थिर अवस्था में ही नहीं रहते, मानव जीवन एक ताजा और जिन्दा चीज है। और जिन्दा चीज के साथ रहने के लिए आपका मन भी उसी तरह ही ताजा और जिन्दा होना चाहिये। मन कभी भी जिन्दा नहीं रह सकता जब तक कि विचारों, फैसलों और मूल्यों में जकड़ा हुआ हो। अपने मन, दिलदिमाग की गतिविधियों, अपने सम्पूर्ण अस्तित्व के अवलोकन की दिशा में अनिवार्य रूप से आपके पास एक मुक्त मन होना चाहिये। वो मन नहीं - जो सहमत या असहमत होता हो, कोई पक्ष ले लेता हो और उन पर टीका टिप्पणियां या वाद विवाद करता हो, मात्र शब्दों के विवाद में ही उलझा रहता हो। बल्कि एक ऐसा मन हो जिसका ध्येय समझ-बूझ का अनुसरण करना हो क्योंकि हम में से अधिकतर लोग यह जानते ही नहीं कि हम अपने ही अस्तित्व की ओर कैसे देखें, कैसे उसे सुनें.... तो हम यह उम्मीद कैसे कर सकते हैं कि हम किसी बहती नदी के सौन्दर्य को देख पायेंगे या पेड़ों के बीच से गुजरती हवा को सुन पायेंगे।
जब हम आलोचना करते हैं या किसी चीज के बारे में किसी तरह के फैसले करने लगते हैं तो हम उसे स्पष्ट रूप से नहीं देख पाते, ना ही उस समय जब हमारा दिल दिमाग बिना रूके बक-बक में ही लगा रहता है। तब हम ’‘जो है’’ उसका वास्तविक अवलोकन नहीं कर पाते, हम अपने बारे में अपने पूर्वाभास/पूर्वानुमान ही देख पाते हैं जो अपने बारे में स्वयं हमने ही बनाये हैं। हममें से प्रत्येक ने अपने बारे में एक छवि बना रखी है कि हम क्या सोचते हैं या हमें क्या होना है और यह छवि या चित्र ही हमें हम जो यथार्थ में हैं, हमारी वास्तविकता के दर्शनों से परे रखता है, बचाता है। किसी चीज को सहज रूप से जैसी वो है वैसी ही देखना, यह संसार में सर्वाधिक कठिन चीजों में से एक है। क्योंकि हमारे दिलदिमाग बहुत ही जटिल हैं, हमने सहजता का गुण खो दिया है। यहां मेरा आशय कपड़ों और भोजन, केवल एक लंगोट पहनकर काम चलाने या उपवास व्रतों का रिकार्ड तोड़ने वाले अपरिपक्व कार्यों और मूर्खताओं से नहीं है जिन्हें तथाकथित संतो ने सम्पन्न किया है, मेरा आशय है उस सहजता से जो किसी चीज को सीधे-सीधे वैसा ही देख पाती है बिना किसी भय के। वो सरलता जो हमारी ओर उस तरह देख सके जैसे कि वास्तव में हम हैं बिना किसी विक्षेप के - जब हम झूठे बोलें, तो झूठ कहे... उसे ढंके छुपाये नहीं ना ही उससे दूर भाग जाये। अपने को समझने के अनुक्रम में हमें अत्यंत विनम्रता की आवश्यकता भी है। जब आप यह कहते हुए शुरूआत करते हैं कि ‘मैं खुद को जानता हूं‘ आप अपने बारे में सीखने समझने को तुरन्त ही बन्द कर चुके होते हैं। या यदि आप कहते हैं कि ‘‘मेरे अपने बारे में जानने समझने लायक कुछ नहीं है क्योंकि मैं केवल स्मृतियों,संकल्पनाओं, अनुभवों और परंपराओं का एक गट्ठर मात्र हूं’’ तो भी आप अपने को सीखने समझने की प्रक्रिया को ठप्प कर चुके होते हैं।
उस क्षण जब आप कुछ उपलब्ध करते हैं तो आप अपनी सहजता, सरलता और विनम्रता के गुणों पर विराम लगा देते हैं। उस क्षण जब आप किसी निर्णय पर पहुंचते हैं या ज्ञान से जॉंचपरख की शुरूआत करते हैं तो आप खत्म हो चुके होते हैं, उसके बाद आप हर जिन्दा चीज का पुरानी चीजों के सन्दर्भ अनुवाद करना शुरू कर देते हैं।
जबकि यदि आप पैरों पर खड़े न हों, आपकी जमीन पर पकड़ ना हो, यदि कोई निश्चितता ना हो, कोई उपलब्धि ना हो तो देखने और उपलब्ध करने की आजादी होती है। और जब आप आजाद होकर देखना शुरू करते हैं तो जो भी होता है हमेशा नया होता है। आश्वस्त या आत्मविश्वास से भरा हुआ आदमी, एक मृत मनुष्य होता है।

18 Feb 2010

जीवन का लक्ष्य


अब यह कुछ ऐसी वास्तविकता है जिसे मैं निश्चित होकर कह सकता हूं कि मैंने उपलब्ध किया है। मेरे लिये, यह कोई सैद्धांतिक संकल्पना नहीं है। यह मेरे जीवन का अनुभव है,.... सुनिश्चित, वास्तविक और ठोस। इसलिए मैं इसकी उपलब्धि के लिए क्या आवश्यक है, यह कह सकता हूं। और मैं कहता हूं कि पहली चीज यह है कि हम जो है उसे वैसा का वैसा ही पहचाने यानि अपनी पूर्णता में कोई इच्छा क्या हो जायेगी, और तब प्रत्येक क्षण के अवलोकन में स्वयं को अनुशासित करें, जैसे कोई अपनी इच्छाओं को खुद ही देखे, और उन्हें उस अवैयक्तिक प्रेम की ओर निर्दिष्ट करे, जो कि उसकी स्वयं की निष्पत्ति हो। जब अप निरंतर जागरूकता का अनुशासन स्थापित कर लेते हैं। उन सब चीजों का जो आप सोचते हैं, महसूस करते हैं और करते है (अमल में लाते हैं) का निरंतर अवलोकन हम में से अधिकतर के जीवन में उपस्थित दमन, ऊब, भ्रम से मुक्त कर , अवसरों की श्रंखला ले आता है जो हमें संपूर्णता की ओर प्रशस्त करती है। तो जीवन का लक्ष्य कुछ ऐसा नहीं जो कि बहुत दूर हो, जो कि दूर कहीं भविष्य में उपलब्ध करना है अपितु पल पल की, प्रत्येक क्षण की वास्तविकता, हर पल का यथार्थ जानने में है जो अभी अपनी अनन्तता सहित हमारे सामने साक्षात ही है।

The goal of life

Now this reality is something which I assert that I have attained. For me, it is not a theological concept. It is my own life-experience, definite, real, concrete. I can, therefore, speak of what is necessary for its achievement, and I say that the first thing is the recognizing exactly what desire must become in order to fulfil oneself, and then to discipline oneself so that at every moment, one is watching one's own desires, and guiding them towards that all-inclusiveness of impersonal love which must be their true consummation. When you have established the discipline of this constant awareness, this constant watchfulness upon all that you think and feel and do, then life ceases to be the tyrannical, tedious, confusing thing that it is for most of us, and becomes but a series of opportunities towards that perfect fulfillment. The goal of life is, therefore, not something far off, to be attained in the distant future, but it is to be realised moment by moment in that now which is all eternity.

Early Works, circa 1930