केवल अबोधता, निर्दोषता ही चावपूर्ण और शौकिया हो सकती है। निर्दोषता के पास ही दुख नहीं होता, ना रोग-बीमारी हालांकि उसके पास इनके हजारों अनुभव होते हैं। अनुभव मन को भ्रष्ट नहीं करते लेकिन वो जो पीछे छोड़ जाते हैं, अवशिष्ट, खरोंचे और यादें, इनसे मन भ्रष्ट होता है। यह सब एक के ऊपर एक जमते जाते हैं और तब शुरू होता है दुख। यह दुख, समय होता है। जहां समय हो, वहां निर्दोषता सरलता नहीं होती। चाव, शौक से दुख पैदा नहीं हो सकता। दुख अनुभव है, अनुभव प्रतिदिन के जीवन का, पीड़ा से भरे जीवन और क्षणिक सुखों के अनुभव, भयों और निश्चितताओं के अनुभव। आप अनुभवों से पलायन नहीं कर सकते, उनसे बच नहीं सकते लेकिन इनकी जड़ें आपके मन में गहरे घर कर जायें इसकी आवश्यकता भी नहीं है। इनकी जड़ें ही अन्य समस्याओं, वैषम्यताओं द्वंद्वों और निरंतर संघर्षों को पालती-पोसती हैं। इनसे बाहर आने का कोई उपाय नहीं है सिवा इसके कि आप रोज-ब-रोज, कल-आज-कल की की तरह मरते जायें। केवल और अकेला स्पष्ट मन ही शौक और चाव से भरा हो सकता है। बिना शौक और चाव के आप पतों पर जमी ओस और पानी पर पड़ती सूर्य की किरणों को नहीं देख सकते। मन की मौज, शौक और चाव के बिना प्रेम भी नहीं होता।
19 Jan 2010
18 Jan 2010
अकेले खड़े हो रहने में, सम्पूर्ण आजादी है
बिना किसी से जुड़े या बंधे हुए और निडर होकर, इच्छा को समझकर उससे मुक्त रहने..... इच्छा, जो कि भ्रमों की जननी है, उससे मुक्त रहने में आजादी है। अकेले रहने में ही असली और अनन्त शक्ति है। ज्ञान से ठुंसा हुआ, बंधनों में जकड़ा, नियोजित दिमाग कभी भी अकेला नहीं होता। जो धार्मिक या वैज्ञानिक या तकनीकी रूप से नियोजित हो वह सदैव सीमित होता है। सीमितता ही द्वंद्व का मुख्य घटक है। इच्छाओं में जकड़े आदमी के लिये सौन्दर्य एक खतरनाक चीज है।
प्रकृति से सम्बन्ध
किसी मनुष्य की मौत से अलग, ...अंततः किसी पेड़ की मौत बहुत ही खूबसूरत होती है। किसी रेगिस्तान में एक मृत वृक्ष, उसकी धारियों वाली छाल, सूर्य की रोशनी और हवा से चमकी हुई उसकी देह, स्वर्ग की ओर उन्मुख नंगी टहनियां और तने.... एक आश्चर्यजनक दृश्य होता है। एक सैकड़ों साल पुराना विशाल पेड़ बागड़ बनाने, फर्नीचर या घर बनाने या यूं ही बगीचे की मिट्टी में खाद की तरह इस्तेमाल करने के लिए मिनटों में काट कर गिरा दिया जाता है। सौन्दर्य का ऐसा साम्राज्य मिनटों में नष्ट हो जाता है। मनुष्य चरागाह, खेती और निवास के लिए बस्तियां बनाने के लिए जंगलों में गहरे से गहरे प्रवेश कर उन्हें नष्ट कर चुका है। जंगल और उनमें बसने वाले जीव लुप्त होने लगे हैं। पर्वत श्रंखलाओं से घिरी ऐसी घाटियां जो शायद धरती पर सबसे पुरानी रही हों, जिनमें कभी चीते, भालू और हिरन दिखा करते थे अब पूरी तरह खत्म हो चुके हैं, बस आदमी ही बचा है जो हर तरफ दिखाई देता है। धरती की सुन्दरता तेजी से नष्ट और प्रदूषित की जा रही है। कारें और ऊंची बहुमंजिला इमारतें ऐसी जगहों पर दिख रही हैं जहां उनकी उम्मीद भी नहीं की जा सकती थी। जब आप प्रकृति और चहुं और फैले वृहत आकाश से अपने सम्बन्ध खो देते हैं, आप आदमी से भी रिश्ते खत्म कर चुके होते हैं।
Relationship with Nature
The death of a tree is beautiful in its ending, unlike man's. A dead tree in the desert, stripped of its bark, polished by the sun and the wind, all its naked branches open to the heavens, is a wondrous sight. A great redwood, many, many hundreds of years old, is cut down in a few minutes to make fences, seats, and build houses or enrich the soil in the garden. The marvellous giant is gone. Man is pushing deeper and deeper into the forests, destroying them for pasture and houses. The wilds are disappearing. There is a valley, whose surrounding hills are perhaps the oldest on earth, where cheetahs, bears and the deer one once saw have entirely disappeared, for man is everywhere. The beauty of the earth is slowly being destroyed and polluted. Cars and tall buildings are appearing in the most unexpected places. When you lose your relationship with nature and the vast heavens, you lose your relationship with man.
J. Krishnamurti Krishnamurti Foundation Trust Bulletin 56, 1989
Relationship with Nature
The death of a tree is beautiful in its ending, unlike man's. A dead tree in the desert, stripped of its bark, polished by the sun and the wind, all its naked branches open to the heavens, is a wondrous sight. A great redwood, many, many hundreds of years old, is cut down in a few minutes to make fences, seats, and build houses or enrich the soil in the garden. The marvellous giant is gone. Man is pushing deeper and deeper into the forests, destroying them for pasture and houses. The wilds are disappearing. There is a valley, whose surrounding hills are perhaps the oldest on earth, where cheetahs, bears and the deer one once saw have entirely disappeared, for man is everywhere. The beauty of the earth is slowly being destroyed and polluted. Cars and tall buildings are appearing in the most unexpected places. When you lose your relationship with nature and the vast heavens, you lose your relationship with man.
J. Krishnamurti Krishnamurti Foundation Trust Bulletin 56, 1989
13 Jan 2010
वास्तव में जागरूकता है क्या ?
प्रश्न: आपने हमें बताया कि अपने दैनिक जीवन में गतिविधियों कार्यव्यवहार का अवलोकन करें लेकिन वह क्या या कौन सा अस्तित्व है जो यह तय करेगा कि किसका अवलोकन करना है और कब? कौन तय करेगा कि उसे अवलोकन करना चाहिये?
कृष्णमूर्ति: क्या आपने तय किया है कि अवलोकन करना है? या आप केवल अवलोकन कर रहे हैं? क्या आपने यह फैसला लिया, तय किया है और कहा है कि ”मैं अवलोकन करने और सीखने जा रहा हूँ?“ तब वहां प्रश्न हो सकता है कि कौन तय कर रहा है? तब वहां पर कहा ये जा रहा है कि ‘मैं जरूर करूंगा?’ और जब वह असफल रहता है, तब वह अपने आपको दंडात्मक भाषा में बार-बार कहता है -मैं करूंगा ही, मुझे करना ही है, तब वहां पर संघर्ष होता है तो मन-मस्तिष्क की वह अवस्था जब ‘‘अवलोकन करना’’ फैसला लिया जाकर, तय किया जाता है... वह कतई, कहीं से भी अवलोकन नहीं है। आप सड़क पर चले जा रहें है और आपके बगल से गुजरा आपने उसे देखा और और खुद से कहा - कैसा गंदा है वह, कैसी बदबू मार रहा है, मैं कामना करता हूं कि वह ऐसा और वैसा ना हो। जब आप अपने बगल से गुजरने वाले पर अपनी प्रतिक्रियाओं के प्रति जागरूक रहते हैं, जब आप इस बात के प्रति जागरूक रहते हैं कि आप कोई फैसला दे रहें हैं, आलोचना कर रहें या किसी चीज को न्यायोचित ठहराने की कोशिश कर रहें हैं - तब आप अवलोकन कर रहे हैं। तब आप यह नहीं कहते कि मुझे फैसला नहीं करना है, मुझे न्यायोचित नहीं ठहराना है। जब कोई आपकी प्रतिक्रियाओं के प्रति जागरूक होता है तब किसी तरह का निर्णय नहीं होता। आपने देखा होगा किसी ने कल आपकी बेइज्जती की... तुरन्त आपकी मांसपेशियां फड़कने लगती हैं, आप असहज और गुस्सा हो सकते हैं, आप उसे नापसंद करना शुरू कर देते हैं; तो उस नापसंदगी के प्रति जागरूक रहना है, उन सारी प्रतिक्रियाओं के प्रति जागरूक रहें, यह फैसला ना करें कि आपको अवलोकन करना है। अवलोकन करें, उस अवलोकन में कोई भी अवलोकनकर्ता नहीं होता, ना ही ‘अवलोक्य’ यानि ‘देखने वाला‘ और ‘देखा जा रहा’ अलग नहीं होते, तब केवल अवलोकन मात्र ही होता है। अवलोकनकर्ता तब पैदा होता है, जब आप अवलोकन में हेर-फेर या जोड़ना घटाना शुरू करते हैं। देखे गये को इकट्ठा कर उस पर नियंत्रण या कब्जा करने की कोशिश करते हैं। जब आप कहते हैं, वह मेरा मित्र है क्योंकि वह मुझे प्रसन्न करता है या वह मेरा मित्र नहीं है क्योंकि उसने मेरे बारे में बुरा गंदा कहा, या आपके बारे में कुछ सच ही कहा जो आप पसंद नहीं करते। तो अवलोकन को जमा, इकट्ठा या संग्रह करने वाला उसमें हेर फेर की गुंजाइश रखने वाला ही अवलोकनकर्ता है। जब आप बिना संग्रह करने या बिना हेर-फेर की इच्छा के अवलोकन करते हैं, तब कोई भी फैसला या निर्णय नहीं करते। आप सारा समय यही करते हैं इस अवलोकन में निसर्गतः प्राकृतिक रूप से विशेष निश्चित निर्णय प्राकृतिक परिणाम के रूप में आतें हैं पर यह वह निर्णय नहीं होते जो अवलोकनकर्ता, अवलोक्य या अवलोकन को इकट्ठा, जमा या संग्रह कर उन पर नियंत्रण या कब्जा कर, या उनमें हेर-फेर कर करता है।
Do you decide to observe? Or do you merely observe? Do you decide and say, `I am going to observe and learn'? For then there is the question: `Who is deciding?' Is it will that says, `I must'? And when it fails, it chastises itself further and says, `I must, must, must; in that there is conflict; therefore the state of mind that has decided to observe is not observation at all. You are walking down the road, somebody passes you by, you observe and you may say to yourself, `How ugly he is; how he smells; I wish he would not do this or that'. You are aware of your responses to that passer-by, you are aware that you are judging, condemning or justifying; you are observing. You do not say, `I must not judge, I must not justify'. In being aware of your responses, there is no decision at all. You see somebody who insulted you yesterday. Immediately all your hackles are up, you become nervous or anxious, you begin to dislike; be aware of your dislike, be aware of all that, do not `decide' to be aware. Observe, and in that observation there is neither the `observer' nor the `observed' - there is only observation taking place. The `observer' exists only when you accumulate in the observation; when you say, `He is my friend because he has flattered me', or, `He is not my friend, because he has said something ugly about me, or something true which I do not like,. That is accumulation through observation and that accumulation is the observer. When you observe without accumulation, then there is no judgement. You can do this all the time; in that observation naturally certain definite decisions are natural results, not decisions made by the observer who has accumulated.
कृष्णमूर्ति: क्या आपने तय किया है कि अवलोकन करना है? या आप केवल अवलोकन कर रहे हैं? क्या आपने यह फैसला लिया, तय किया है और कहा है कि ”मैं अवलोकन करने और सीखने जा रहा हूँ?“ तब वहां प्रश्न हो सकता है कि कौन तय कर रहा है? तब वहां पर कहा ये जा रहा है कि ‘मैं जरूर करूंगा?’ और जब वह असफल रहता है, तब वह अपने आपको दंडात्मक भाषा में बार-बार कहता है -मैं करूंगा ही, मुझे करना ही है, तब वहां पर संघर्ष होता है तो मन-मस्तिष्क की वह अवस्था जब ‘‘अवलोकन करना’’ फैसला लिया जाकर, तय किया जाता है... वह कतई, कहीं से भी अवलोकन नहीं है। आप सड़क पर चले जा रहें है और आपके बगल से गुजरा आपने उसे देखा और और खुद से कहा - कैसा गंदा है वह, कैसी बदबू मार रहा है, मैं कामना करता हूं कि वह ऐसा और वैसा ना हो। जब आप अपने बगल से गुजरने वाले पर अपनी प्रतिक्रियाओं के प्रति जागरूक रहते हैं, जब आप इस बात के प्रति जागरूक रहते हैं कि आप कोई फैसला दे रहें हैं, आलोचना कर रहें या किसी चीज को न्यायोचित ठहराने की कोशिश कर रहें हैं - तब आप अवलोकन कर रहे हैं। तब आप यह नहीं कहते कि मुझे फैसला नहीं करना है, मुझे न्यायोचित नहीं ठहराना है। जब कोई आपकी प्रतिक्रियाओं के प्रति जागरूक होता है तब किसी तरह का निर्णय नहीं होता। आपने देखा होगा किसी ने कल आपकी बेइज्जती की... तुरन्त आपकी मांसपेशियां फड़कने लगती हैं, आप असहज और गुस्सा हो सकते हैं, आप उसे नापसंद करना शुरू कर देते हैं; तो उस नापसंदगी के प्रति जागरूक रहना है, उन सारी प्रतिक्रियाओं के प्रति जागरूक रहें, यह फैसला ना करें कि आपको अवलोकन करना है। अवलोकन करें, उस अवलोकन में कोई भी अवलोकनकर्ता नहीं होता, ना ही ‘अवलोक्य’ यानि ‘देखने वाला‘ और ‘देखा जा रहा’ अलग नहीं होते, तब केवल अवलोकन मात्र ही होता है। अवलोकनकर्ता तब पैदा होता है, जब आप अवलोकन में हेर-फेर या जोड़ना घटाना शुरू करते हैं। देखे गये को इकट्ठा कर उस पर नियंत्रण या कब्जा करने की कोशिश करते हैं। जब आप कहते हैं, वह मेरा मित्र है क्योंकि वह मुझे प्रसन्न करता है या वह मेरा मित्र नहीं है क्योंकि उसने मेरे बारे में बुरा गंदा कहा, या आपके बारे में कुछ सच ही कहा जो आप पसंद नहीं करते। तो अवलोकन को जमा, इकट्ठा या संग्रह करने वाला उसमें हेर फेर की गुंजाइश रखने वाला ही अवलोकनकर्ता है। जब आप बिना संग्रह करने या बिना हेर-फेर की इच्छा के अवलोकन करते हैं, तब कोई भी फैसला या निर्णय नहीं करते। आप सारा समय यही करते हैं इस अवलोकन में निसर्गतः प्राकृतिक रूप से विशेष निश्चित निर्णय प्राकृतिक परिणाम के रूप में आतें हैं पर यह वह निर्णय नहीं होते जो अवलोकनकर्ता, अवलोक्य या अवलोकन को इकट्ठा, जमा या संग्रह कर उन पर नियंत्रण या कब्जा कर, या उनमें हेर-फेर कर करता है।
Q:You tell us to observe our actions in daily life but what is the entity that decides what to observe and when? Who decides if one should observe?
Krishnamurti: Do you decide to observe? Or do you merely observe? Do you decide and say, `I am going to observe and learn'? For then there is the question: `Who is deciding?' Is it will that says, `I must'? And when it fails, it chastises itself further and says, `I must, must, must; in that there is conflict; therefore the state of mind that has decided to observe is not observation at all. You are walking down the road, somebody passes you by, you observe and you may say to yourself, `How ugly he is; how he smells; I wish he would not do this or that'. You are aware of your responses to that passer-by, you are aware that you are judging, condemning or justifying; you are observing. You do not say, `I must not judge, I must not justify'. In being aware of your responses, there is no decision at all. You see somebody who insulted you yesterday. Immediately all your hackles are up, you become nervous or anxious, you begin to dislike; be aware of your dislike, be aware of all that, do not `decide' to be aware. Observe, and in that observation there is neither the `observer' nor the `observed' - there is only observation taking place. The `observer' exists only when you accumulate in the observation; when you say, `He is my friend because he has flattered me', or, `He is not my friend, because he has said something ugly about me, or something true which I do not like,. That is accumulation through observation and that accumulation is the observer. When you observe without accumulation, then there is no judgement. You can do this all the time; in that observation naturally certain definite decisions are natural results, not decisions made by the observer who has accumulated.
12 Jan 2010
देखिये-समझिये और सहज सरल रहिये
निश्चित ही जो खुद को सांसारिक राजनीति में खपा कर खो चुके हैं उनके लिये खुद को भीड़ से अलग करना ही नहीं समस्या नहीं अपितु जीवन में वापस लौटना, प्रेम में उतरना, सहज-सरल होना भी मुख्य कार्य है। प्रेम के बिना आप कुछ भी करें, आप कर्म की सम्पूर्णता को नहीं जान सकते, अकेला प्रेम ही आदमी को बचा सकता है। यही सत्य है श्रीमन हम लोग प्रेम में नहीं है, हम वास्तव में उतने सहज सरल नहीं रह गये हैं जितना हमें होना चाहिए क्यों? क्योंकि आप दुनियां को सुधारने, संवारने, जिम्मेदारियों, प्रतिष्ठा, सामने वाले से कुछ हटकर करने से, कुछ विशेष होने से सरोकार रखे हुए हैं। दूसरों के नाम पर आप अपने स्वार्थों के गर्त में डूबे हैं, आप अपने ही घोंघेनुमा कवच में समाए हैं। आप समझते हैं कि आप ही इस सुन्दर संसार का केन्द्र हैं। किसी वृक्ष, किसी फूल या बहती हुई नदी को देखने के लिए आप कभी भी नहीं ठहरते, और अगर कभी ठहर भी जाते हैं तो आपकी आंखों में मन में चलते हुए कई विचार, स्मृतियाँ और जाने क्या-क्या उतर आता है, बस आपकी आंखों में सौन्दर्य और प्रेम ही नहीं उमड़ता। पुनश्च यही सत्य है लेकिन एक व्यक्ति के करने के लिये क्या है? बस देखें-समझें और सहज-सरल रहें?
11 Jan 2010
झूठ के सच को देखना
अनुभव की भूख या तृष्णा ही भ्रम का, माया का आरंभ है। जैसा कि अब आप जानते हैं, आपकी दृष्टि- आपकी पृष्ठभूमि या अतीत का प्रेक्षण या अनुमान है, या परिस्थितियों द्वारा संभावनाओं को देखना है, और यह ही वह अनुमान या संभावनाएं हें जो आपने अनुभव किये हैं। निश्चित ही यह ध्यान नहीं हैं। ध्यान का आरंभ वहां से होता है जब आप अपनी पृष्ठभूमि , अपने आपको समझना शुरू करते हैं। बिना अपनी पृष्ठभूमि को, बिना अपने आप को समझे आप जिसे ध्यान कहते हैं वो चाहे कितना ही आनंददायक या दुखदायक हो वो आत्म सम्मोहन है। आप आत्मनियंत्रण का अभ्यास करते हैं, विचारों में महारत हासिल करते हैं और अनुभवों में आगे बढ़ने के लिए ध्यान केन्द्रित करते हैं। यह आत्म स्व केन्द्रित धंधा है, यह ध्यान नहीं है और यह देखना जानना कि क्या ध्यान नहीं है यह ही ध्यान का आरंभ है। झूठ के सच को देख लेने पर ही मन असत्य से मुक्त होता है। झूठ से मुक्त होने की आकांक्षा से ही झूठ से आजादी नहीं मिल जाती, यह मुक्ति तब आती है जब हमें किसी सफलता, किसी निर्णय, परिणाम या अंत को उपलब्ध हो जाने से सरोकर नहीं होता। सारी खोजों पर विराम होने पर ही वह संभावना होती है... कि वो अस्तित्व में आये जो अनाम है।
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