11 Jan 2010

झूठ के सच को देखना



अनुभव की भूख या तृष्णा ही भ्रम का, माया का आरंभ है। जैसा कि अब आप जानते हैं, आपकी दृष्टि- आपकी पृष्ठभूमि या अतीत का प्रेक्षण या अनुमान है, या परिस्थितियों द्वारा संभावनाओं को देखना है, और यह ही वह अनुमान या संभावनाएं हें जो आपने अनुभव किये हैं। निश्चित ही यह ध्यान नहीं हैं। ध्यान का आरंभ वहां से होता है जब आप अपनी पृष्ठभूमि , अपने आपको समझना शुरू करते हैं। बिना अपनी पृष्ठभूमि को, बिना अपने आप को समझे आप जिसे ध्यान कहते हैं वो चाहे कितना ही आनंददायक या दुखदायक हो वो आत्म सम्मोहन है। आप आत्मनियंत्रण का अभ्यास करते हैं, विचारों में महारत हासिल करते हैं और अनुभवों में आगे बढ़ने के लिए ध्यान केन्द्रित करते हैं। यह आत्म स्व केन्द्रित धंधा है, यह ध्यान नहीं है और यह देखना जानना कि क्या ध्यान नहीं है यह ही ध्यान का आरंभ है। झूठ के सच को देख लेने पर ही मन असत्य से मुक्त होता है। झूठ से मुक्त होने की आकांक्षा से ही झूठ से आजादी नहीं मिल जाती, यह मुक्ति तब आती है जब हमें किसी सफलता, किसी निर्णय, परिणाम या अंत को उपलब्ध हो जाने से सरोकर नहीं होता। सारी खोजों पर विराम होने पर ही वह संभावना होती है... कि वो अस्तित्व में आये जो अनाम है।

8 Jan 2010

भलाई, प्यार और बुद्धिमानी



केवल एक ही बात मायने रखती है वो है -भलाई, प्रेम, बुद्धिमानी इत्यादि अमल में आये, कर्म भी हो। क्या भलाई वैयक्तिक और सामूहिक होती है?, क्या प्रेम वैयक्तिक और अवैयक्तिक होता है?, क्या बुद्धिमानी मेरी या तुम्हारी या और किसी की होती है? यदि यह मेरी या तुम्हारी है तो यह बुद्धिमानी या प्रेम या भलाई नहीं। यदि भलाई वैयक्तिक और सामूहिक रूप से किसी विशेष प्राथमिकता या निर्णय की तरह हो तो वह भलाई नहीं रह जायेगा। भलाई वैयक्तिक्ता या सामूहिकता के नाम पर घर के पिछवाड़े में फेंक देने जैसी चीज नहीं है, भलाई, वैयक्तिता या सामूहिकता, इन दोनों से स्वतंत्र रहकर फूलती-फलती है।

6 Jan 2010

क्या रूपान्तरण जैसी कोई चीज होती है? क्या है जो बदलता है?



जब आप अवलोकन करते हैं, सड़क पर धूल देखते हैं, यह देखते हैं कि राजनीतिज्ञ कैसा व्यवहार कर रहे हैं, अपनी पत्नि के प्रति... अपने बच्चों के प्रति अपना ही बर्ताव देखते हैं इसी तरह की अन्य बातें, तो यही रूपान्तरण होता है। क्या आप समझे? अपनी दिनचर्या को तरतीब देना, कार्यों में स्वरों को साध लेने-सा सामन्यीकरण ही रूपान्तरण है; कुछ ऐसा नहीं जो बहुत ही असामान्य या जो दुनिया के बाहर की बात हो। जब कोई ”स्पष्ट रूप से कुछ नहीं देख पाता“ और वह तर्क-युक्ति संगत रूप से इसके प्रति जागरूक हो जाता है और इसे बदलता है, अपनी आदत को तोड़ता है, अपनी अस्पष्टता को विराम देता है, यही रूपान्तरण है। यदि आपको ईष्र्या या जलन हो रही है तो इसे देखें, इसे फूलने-फलने का मौका दिये बिना इसे तुरन्त बदलें, यह रूपान्तरण होगा। जब आपको लोभ, हिंसा, महत्वाकांक्षा पकड़ लेते हैं, या जब आप खुद को किसी पवित्र आध्यात्मिक व्यक्ति की तरह बनाना चाहते हैं तो यह देखें कि आपकी ऐसी सोच. आपका ऐसा होना कितनी निरर्थक दुनियां की रचना कर रहा है। मुझे नहीं पता आप इस सब के प्रति जागरूक हैं या नहीं। प्रतियोगिता विश्व का विनाश कर रही है। दुनियां रोज ब रोज अधिकाधिक प्रतियोगी होती जा रही है, अधिकाधिक आक्रामक होती जा रही है और अगर आप अपनी यह प्रवृत्ति तुरन्त बदलते हैं तो यह रूपान्तरण है। यह आप इस समस्या में बहुत गहराई तक जाएं, तो आप स्पष्टतः पाएंगे कि विचार प्रेम को नकारता है। इसलिए किसी को भी यह प्रश्न उठाना चाहिए, तलाश या पता करना चाहिये कि क्या विचार का अन्त हो सकता है?, क्या समय का अन्त हो सकता है? हमें इन प्रश्नों पर दार्शनिक अंदाज में मुद्राएं नहीं बनानी हैं, इस पर चर्चाएं-बहसें नहीं करनी, पर यह ईमानदारी से पता करना है। वास्तव में सच्चे रूप में, यही रूपान्तरण है, जब आप रूपान्तरण की गहराई में जाते हैं तो आप पाएंगे की रूपान्तरण का मतलब है ‘‘किसी भी तरह के कुछ होने’’, ‘‘तुलना’’ के विचार का अभाव। यह है अस्तित्व का पूर्णतया नाकुछ हो रहना।

1 Jan 2010

सम्पूर्ण प्रयोगशाला आपके भीतर ही है



जबकि सम्पूर्ण प्रयोगशाला आपके भीतर ही है तो आप किसी अन्य आदमी का अध्ययन क्यों करना चाहते हैं? अपने आप का अध्ययन करें, आप ही सारी मानवता हैं, वृहत दूरूहपन द्वंद्वात्मकता, अत्यंतिक संवेदना आप ही हैं। आप इस बात का अध्ययन क्यों करना चाहते हैं कि कोई अन्य आदमी के बारे में क्या कहता है। और आप ही तो हैं जो अन्य आदमी से संबंधित हैं, यही तो समाज है। आपने ही तो यह भयावह, कुरूप दुनिया गढ़ी है जो अब पूरी तरह अर्थहीन होती जा रही है, यही तो वजह है कि दुनियां भर के युवा विद्रोही हो रहे हैं। मेरे लिये यह एक अर्थहीन जीवन है। आदमी ने जो यह दुनियां गढ़ी है उसकी अपनी ही मांगों का निक्षेप या फल है, उसकी अपनी ”तुरन्त चाहिये” तात्कालिक प्राथमिकताओं, आदतों, महत्वाकांक्षाओं, लाभ और ईष्र्या का निचोड़ है। आप सोचते हैं कि आप मानव के संबंध में सभी पुस्तकों का अध्ययन कर लेंगे और समाज में जाएंगें तो आप अपने आपको समझ सकेंगे। लेकिन क्या यह ज्यादा सरल और सहज नहीं है कि आप अपने से ही शुरूआत करें?

30 Dec 2009

अन्य लोगों से अपनी तुलना करना छोड़ें



जब मैं अपनी तुलना अन्य लोगों से नहीं करता तब मैं समझ सकता हूं कि ”मैं क्या हूं?“ जीवन भर, बचपने से.. स्कूली उम्र से लेकर हमारे मरने तक, हमें सिखाया जाता है कि हम अपनी तुलना अन्य लोगों से करें, जबकि जब भी मैं किसी से अपनी तुलना करता हूं तो मैं अपने आप को ही नष्ट कर रहा होता हूं। स्कूल में, एक साधारण स्कूल में भी जहां कई लड़के होते हैं उनमें जो कक्षा में माॅनीटर है... वह असल में क्या है? आप लड़के को नष्ट कर रहे हैं। यही सब हम जिन्दगी भर करते हैं। तो अब... क्या हम बिना तुलना किये जी सकते हैं - बिना अन्य किसी से भी तुलना किये? इसका मतलब है अब कुछ भी ऊंचा या नीचा नहीं होगा, अब ऐसा नहीं होगा कि आपकी नजर में कोई एक श्रेष्ठ हो उच्च हो और कोई एक, हीन और निकृष्ट। आप वास्तव में वही हैं, जो कि आप हैं और ”जो आप हैं“ उसे जानने के लिए यह तुलना करने का तरीका आपको छोड़ना होगा, यह प्रक्रिया अनिवार्यतः समाप्त करनी होगी। यदि मैं हमेशा अपने को किसी संत या किसी शिक्षक या किसी बिजनेसमेन, लेखक, कवि या अन्य लोगों से तुलना में रखूं, तो मेरे साथ क्या होगा? मैं क्या कर रहा हूं? मैं इनसे तुलना कर रहा हूं ... कुछ पाने के अनुक्रम में, किसी उपलब्धि की दिशा में या कुछ होने के चक्कर में और यदि मैं किसी से अपनी तुलना नहीं करता तो... तब मैं यह जानना शुरू करता हूं कि वास्तव में ”मैं क्या हूं“। मैं क्या हूं, यह जानने की शुरूआत अधिक मोहक है, ज्यादा रूचिकर है और अपने को जानना, सभी मूर्खतापूर्ण बेवकूफी भरी तुलनाओं के पार ले जाता है।

29 Dec 2009

हमारा ”स्व“ या “आत्म” कई खण्डों वाली पुस्तक है




अपने आप को जानने-समझने के लिए धैर्य, सहनशीलता, जागरूकता चाहिये क्योंकि हमारा स्व या आत्म अनेक खण्डों वाले महाग्रंथ के समान है जो केवल एक ही दिन में नहीं पढ़ा जा सकता लेकिन यदि आप पढ़ना शुरू करें तो आपको इसका प्रत्येक शब्द, प्रत्येक वाक्य, प्रत्येक पैराग्राफ अपरिहार्य रूप से पढ़ना चाहिये क्योंकि इसके प्रत्येक शब्द, वाक्य और प्रत्येक पैराग्राफ में आपकी सम्पूर्णता के बारे में इशारे हैं। इसकी शुरूआत ही इसका अंत भी है। यदि आप जानते हैं कि कैसे पढ़ा जाता है तो आप परमज्ञान, परम समझदारी पा सकते हैं।