5 Nov 2009
आदतों में जकड़ा मन असंवेदनशील होता है
बहुत से लोग शारीरिक रूप से असंवेदनशील हैं क्योंकि जरूरत से ज्यादा भोजन करते हैं, धूम्रपान करते हैं, और कई तरह के ऐन्द्रिक रसों में आकंठ डूबे हैं। लेकिन इस तरह तो मन कुंद ही होता है। जब मन कुंद होता है तो देह भी जड़ होती है। यह वह पैटर्न है, ढांचा है जिस पर हम जीते हैं। आप जानते हैं कि आपको अपनी खुराक बदलने में ही कितनी कठिनाई होती है। आप एक विशेष मात्रा और स्वाद वाली खुराक के अभ्यस्त हो चुके होते हैं और हमेशा वैसा ही चाहते हैं। अगर आपको उसी प्रकार और मात्रा में भोजन नहीं मिलता तो अपने आपको बीमार-सा अनुभव करते हैं, एक भय और शंका आपको घेर लेती है। शारीरिक आदतें असंवेदनशीलता उपजाती हैं, वह चाहे किसी भी तरह की आदत हो जैसे मादक दवाएं लेना, शराब या धूम्रपान... ये सब शरीर को असंवदेनशील बनाती हैं और मन को प्रभावित करती हैं, उस मन को जो आपकी संवेदना का संपूर्णत्व है, वह मन जिसे अत्यावश्यक रूप से स्पष्ट दृष्टा, भ्रममुक्त और द्वंद्वरहित होना चाहिए। द्वंद्व हमारी ऊर्जा का अपव्यय ही नहीं करते यह हमारे मन को कुंद, जड़, भारी, मूढ़ भी बनाते हैं। इस तरह आदतों में जकड़ा मन असंवेदनशील होता है, इस असंवेदनशीलता, इस कुंदपने और जड़ता के कारण वह किसी भी तरह का कुछ नया ग्रहण करन में समर्थ नहीं होता क्योंकि जहां असंवेदनशीलता होती है वहीं जड़ता, मूढ़ता और भय भी होता है।
4 Nov 2009
एकाग्रता और ध्यान में अन्तर
अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा को किसी विशेष बिन्दु पर फोकस करना एकाग्रता है। ध्यान में कोई बिन्दु विशेष नहीं होता जिस पर फोकस किया जाये। हम एकाग्रता से भलीभांति परिचित हैं पर हमें ध्यान की खबर नहीं। जब हम अपनी देह पर ध्यान देते हैं तब देह पूर्णतः शांत हो जाती है, जो कि उसका अपना अनुशासन है; तब देह विश्राम अवस्था में होती है लेकिन निष्क्रिय नहीं तब वहां पर समरसता की ऊर्जा होती है। जहाँ ध्यान होता है वहाँ विरोधाभास नहीं होता इसलिए कोई संघर्ष नहीं होता। जब आप कुछ पढ़ें तो ध्यान दें कि आप कैसे बैठे हैं, किस तरह सुन रहे हैं, कोई कुछ कह रहा है तो आप उसे कैसे ग्रहण करते हैं, कोई कुछ कहता है तो आप किस तरह प्रतिक्रिया देते हैं और यह कि आप ध्यान क्यों नहीं दे पाते हैं?
आपको यह सीखना नहीं है कि ध्यान कैसे देना है? कयोंकि यदि आप सीख रहे हैं तो आप एक व्यवस्था बना रहे हैं, अपने दिमाग में एक कार्यक्रम भर रहे हैं जिसके अनुसार चलना है तो आपका यह ध्यान यांत्रिक, एक तरह का दोहराव और स्वचालित हो जायेगा जबकि वास्तव में ध्यान ऐसा कुछ भी नहीं है।
ध्यान अपने सारे जीवन को देखने का तरीका है, बिना स्वरूचि के किसी केन्द्र के।
आपको यह सीखना नहीं है कि ध्यान कैसे देना है? कयोंकि यदि आप सीख रहे हैं तो आप एक व्यवस्था बना रहे हैं, अपने दिमाग में एक कार्यक्रम भर रहे हैं जिसके अनुसार चलना है तो आपका यह ध्यान यांत्रिक, एक तरह का दोहराव और स्वचालित हो जायेगा जबकि वास्तव में ध्यान ऐसा कुछ भी नहीं है।
ध्यान अपने सारे जीवन को देखने का तरीका है, बिना स्वरूचि के किसी केन्द्र के।
2 Nov 2009
ज्ञान के परदे की ओट के बिना देखना
अवलोकन में किसी तरह के संचित ज्ञान की जरूरत नहीं, हालांकि ज्ञान एक स्तर विशेष तक सहजतः आवश्यक है जैसे चिकित्सीय ज्ञान, वैज्ञानिक ज्ञान, इतिहास का ज्ञान और अन्य सारी चीजों का जो हैं। क्योंकि अंततः वो सब चीजें जो हो चुकी हैं, हैं -उनके बारे में सूचना, ज्ञान है। लेकिन भविष्य का कोई ज्ञान नहीं है, बस जो हो चुका है उसके ज्ञान के आधार पर लिए अंदाजे ही हमें भविष्य के साथ जोड़ने वाली कड़ी हैं। एक ऐसा मन जो ज्ञान के झीने परदे की ओट से देख रहा है वह विचार की तीव्र धारा का अनुगमन करने में सक्षम नहीं हो सकता। यदि आप अपनी ही सम्पूर्ण वैचारिक संरचना को देखना चाहते हैं तो आपको अपने ज्ञान के झीने परदे को हटाकर, अपनी सम्पूर्ण वैचारिक संरचना को सीधे देखना होगा।
जब आप सामान्य सहज रूप से, बिना आलोचना या स्वीकारने के, केवल अवलोकन मात्र करते हैं तब आप देखेंगे कि विचार का अंत भी है। यूं ही सामान्य तौर पर विचार आपको कहीं नहीं ले जाते। लेकिन यदि आप विचार की प्रक्रिया का अवलोकन, अवलोकनकर्ता और अवलोक्य के भेद के बिना कर पाते हैं, यदि आप विचार की सम्पूर्ण गति देख पाते हैं (बिना आलोचना या स्वीकार्य के) तो आपका यह अवलोकन, विचार का तुरन्त ही अंत पा जाता है - और इसलिए इस स्थिति में मन करूणापूर्ण होता है, वह निरंतर उत्परिवर्तन (सनातन) अवस्था में होता है।
31 Oct 2009
जो आप हैं, वही यह संसार है
हममे से बहुत से लोग इस भ्रमित और क्रूर जगत में अपनी ही एक सर्वथा निजी, एक ऐसी जिन्दगी गढ़ने की कोशिश करते हैं जिसमें वो खुश और शांतिपूर्वक बाकी दुनियां की अन्य चीजों के साथ चलते हुए जी सके। हमें ये लगता है या हम सोचते हैं कि रोजमर्रा की संघर्ष, द्वंद्व, पीड़ा और दुख की जो जिन्दगी हम जीते हैं वो दुर्भाग्यशली और भ्रमित बाहरी दुनिया से अलग है। हम सोचते हैं कि हमारा अपनी निजी दुनियां का ‘‘मैं’’ ... अत्याचार, युद्धों और दंगों, असमानता, अन्याय भरी बाकी दुनियां से से अलग है, जैसे ये सब हमारी विशेष निजी जिन्दगी से सर्वथा अलग है। लेकिन आप जरा और करीब से जानें, केवल अपनी जिन्दगी को ही नहीं बल्कि सारी दुनियां की जिन्दगी को देंखें तो आप जानेंगे कि आपकी रोजमर्रा की जिन्दगी, आप जो सोचते हैं, जो अनुभव करते हैं वही बाहरी दुनियां भी है, वही वह दुनियां है जो आपके बारे में ही कहती है।
30 Oct 2009
ये सब समय रहते कर लें ना
लोग अक्सर से पूछते हैं - मौत के बाद क्या होगा? लेकिन कोई यह नहीं पूछता कि मौत के पहले क्या होगा? कोई यह क्यों नहीं देखता कि अभी उसकी जिन्दगी में क्या हो रहा है? आपकी जिन्दगी क्या है? काम, ऑफिस, पैसा, पीड़ा, प्रयास, सफलता से चिपके रहना, लेकिन क्या यही सब जिन्दगी है? हाँ, आपका जीवन तो यही कहता है। किन्तु मौत इन सब पर विराम लगा देती है।
तो क्या जीते जी... मौत से पूर्व ही यह संभव है कि हम ये सब स्वयं ही खत्म कर दें - जुड़ाव या मोह, अपने विश्वास-अंधविश्वास खत्म कर दें। किसी चीज को स्वेच्छा से, बिना किसी उद्देश्य से, बिना किसी खुशी से करना - क्या आप ऐसा कर सकते हैं? क्योंकि ऐसा करके ही किसी चीज के स्वेच्छा से खत्म हो जाने की सुन्दरता देखी जा सकती है।
और इस खात्मे, इस समाप्ति के बाद ही नई शुरूआत है। यदि आप स्वयं ही ये सब खत्म करते हैं, तो द्वार खुलते हैं, लेकिन आप अपना सांसारिक मायाजाल खत्म करने से पहले ही चाहते हैं कि कोई दरवाजे आपके लिए खुल जायें। आप कभी भी उस कुचक्र को खत्म नहीं करते जिसमें आप हैं, आप अपने उद्देश्यों लक्ष्यों को कभी भी खत्म नहीं करते।
ऐसा जीवन जिएं जिसमें अन्र्तमुखी समापन हो, यही मृत्यु की समझ लाता है।
तो क्या जीते जी... मौत से पूर्व ही यह संभव है कि हम ये सब स्वयं ही खत्म कर दें - जुड़ाव या मोह, अपने विश्वास-अंधविश्वास खत्म कर दें। किसी चीज को स्वेच्छा से, बिना किसी उद्देश्य से, बिना किसी खुशी से करना - क्या आप ऐसा कर सकते हैं? क्योंकि ऐसा करके ही किसी चीज के स्वेच्छा से खत्म हो जाने की सुन्दरता देखी जा सकती है।
और इस खात्मे, इस समाप्ति के बाद ही नई शुरूआत है। यदि आप स्वयं ही ये सब खत्म करते हैं, तो द्वार खुलते हैं, लेकिन आप अपना सांसारिक मायाजाल खत्म करने से पहले ही चाहते हैं कि कोई दरवाजे आपके लिए खुल जायें। आप कभी भी उस कुचक्र को खत्म नहीं करते जिसमें आप हैं, आप अपने उद्देश्यों लक्ष्यों को कभी भी खत्म नहीं करते।
ऐसा जीवन जिएं जिसमें अन्र्तमुखी समापन हो, यही मृत्यु की समझ लाता है।
29 Oct 2009
तनावमुक्त कैसे रहें ?
हम तनाव में क्यों आते हैं? क्या तनाव तभी नहीं होता, जब प्रतिरोध होता है? हमारे आसपास ही कई आवाजें शोर के रूप में रहती हैं - कुत्ते का भौंकना, बसों की आवाजाही, बच्चों का रोना, या मैकेनिकों की दुकानों की उठा पटक ठोकने पीटने की आवाजें। जब आप प्रतिरोध करते हैं, तनाव खड़ा हो जाता है। यथार्थतः यही होता है। यदि आप किसी तरह का प्रतिरोध ना बनायें शोर को वैसे ही होते रहने दें, शांतचित्त होकर सुनें, बिना किसी प्रतिरोध के.......ये ना कहें कि ये अच्छा है या बुरा है, या कि ऐसा होना चाहिए या नहीं होना चाहिए, बस केवल सुनें। जब तक कोई कोशिश या प्रतिरोध नहीं होगा, तनाव नहीं हो सकता। प्रतिरोधरहित संवदेनशक्ति सम्पन्न व्यक्ति कभी भी नर्वस टेन्शन और नर्वस बे्रकडाउन का शिकार नहीं हो सकता।
Subscribe to:
Posts (Atom)

