29 Oct 2009
तनावमुक्त कैसे रहें ?
हम तनाव में क्यों आते हैं? क्या तनाव तभी नहीं होता, जब प्रतिरोध होता है? हमारे आसपास ही कई आवाजें शोर के रूप में रहती हैं - कुत्ते का भौंकना, बसों की आवाजाही, बच्चों का रोना, या मैकेनिकों की दुकानों की उठा पटक ठोकने पीटने की आवाजें। जब आप प्रतिरोध करते हैं, तनाव खड़ा हो जाता है। यथार्थतः यही होता है। यदि आप किसी तरह का प्रतिरोध ना बनायें शोर को वैसे ही होते रहने दें, शांतचित्त होकर सुनें, बिना किसी प्रतिरोध के.......ये ना कहें कि ये अच्छा है या बुरा है, या कि ऐसा होना चाहिए या नहीं होना चाहिए, बस केवल सुनें। जब तक कोई कोशिश या प्रतिरोध नहीं होगा, तनाव नहीं हो सकता। प्रतिरोधरहित संवदेनशक्ति सम्पन्न व्यक्ति कभी भी नर्वस टेन्शन और नर्वस बे्रकडाउन का शिकार नहीं हो सकता।
28 Oct 2009
खूबसूरती का सार
क्या खूबसरती रंग है, आकार है, चेहरे की हड्डियां है, आँखों की स्पष्टता है, त्वचा या केश है, या खूबसूरत आदमी या औरत की अभिव्यक्ति में है? या खूबसूरती का कुछ और ही गुण है जो इस खूबसूरती का अतिक्रमण करता है, जो जिन्दगी में होने पर आकार, चेहरे और सब तरह की खूबसूरती अस्तित्व में आती है। अगर उस गुण को ही नहीं जाना-समझा जाता तभी, सभी बाहरी अभिव्यक्तियां सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती हैं।
आप जानते हैं आप जब कभी नीले आकाश की पृष्ठभूमि में किसी किसी शानदार पर्वत को देखते हैं, उसकी जीवन्त होना, चमक, धवलता, अप्रदूषित बर्फ, उसकी महिमा दिव्यपन आपको क्षुद्र विचारों, सरोकारों, समस्याओं को कहीं और ही ढकेल देता है। क्या आपने कभी गौर किया है? आप कहते हैं ”ये कितना सुन्दर है,” दो कुछ क्षणों के लिए, आप एकदम शांत निस्तब्ध हो जाते हैं। उस पर्वत की भव्यता कुछ क्षणों के लिए आपकी क्षुद्रताओं को आपसे अलग थलग कर देती है। वैसे ही जैसे एक बच्चा किसी जटिल खिलौने में घंटों के लिए डूब जाता है। वह खिलौना उसे पूरी तरह अवशोषित कर लेता है, अपने में समो लेता है। इसी तरह पर्वत क्षण भर में लिए आपको अपनी भव्यता में समो लेता है, आप पूर्णतः शांत स्तब्ध हो जाते हैं, जिसका मतलब है आप अपने आपको पूरी तरह भूल जाते हैं। आपका अहं कुछ क्षणों के लिए खो जाता है।
अब, किसी के द्वारा अपने में समो लिये जाने के बगैर.... चाहे वह कोई खिलौना हो, कोई भव्य पर्वत हो या चेहरा हो या कोई विचार, क्या आप स्वयं ही उस अहंशून्यता में नहीं रह सकते। यही सच्ची खूबसूरती है, खूबसूरती का सार है।
आप जानते हैं आप जब कभी नीले आकाश की पृष्ठभूमि में किसी किसी शानदार पर्वत को देखते हैं, उसकी जीवन्त होना, चमक, धवलता, अप्रदूषित बर्फ, उसकी महिमा दिव्यपन आपको क्षुद्र विचारों, सरोकारों, समस्याओं को कहीं और ही ढकेल देता है। क्या आपने कभी गौर किया है? आप कहते हैं ”ये कितना सुन्दर है,” दो कुछ क्षणों के लिए, आप एकदम शांत निस्तब्ध हो जाते हैं। उस पर्वत की भव्यता कुछ क्षणों के लिए आपकी क्षुद्रताओं को आपसे अलग थलग कर देती है। वैसे ही जैसे एक बच्चा किसी जटिल खिलौने में घंटों के लिए डूब जाता है। वह खिलौना उसे पूरी तरह अवशोषित कर लेता है, अपने में समो लेता है। इसी तरह पर्वत क्षण भर में लिए आपको अपनी भव्यता में समो लेता है, आप पूर्णतः शांत स्तब्ध हो जाते हैं, जिसका मतलब है आप अपने आपको पूरी तरह भूल जाते हैं। आपका अहं कुछ क्षणों के लिए खो जाता है।
अब, किसी के द्वारा अपने में समो लिये जाने के बगैर.... चाहे वह कोई खिलौना हो, कोई भव्य पर्वत हो या चेहरा हो या कोई विचार, क्या आप स्वयं ही उस अहंशून्यता में नहीं रह सकते। यही सच्ची खूबसूरती है, खूबसूरती का सार है।
27 Oct 2009
आलोचना के बिना, जागरूक भर रहना
ध्यान ऐसी चीज नहीं है कि उसे करने के बारे में सोचा जाये या नियत समय सारणी बनायी जाये या मुहूर्त निकाला जाये। यह तंत्र-मंत्र-यंत्र जैसा नहीं कि जप-तप के लिए फलां-फलां जगह हो, कम्बल या किसी विशेष तरह का आसन हो, दिशा विशेष की ओर मुंह हो, ध्यान के सबंध में ये सारी बातें फालतू हैं। यह ऐसा ही है कि तुरंत अभी शुरू करना चाहिए। आसपास के वृक्षों को देखें, आसमान देखें, गिलहरी, चिड़िया, मछली को देखें, पत्ते पर पड़ते प्रकाश को देखें, किसी के परिधान के रंगों को, किसी का चेहरा,,, इसके बाद ही बात गहराई की ओर चलती है। धीरे-धीरे हम अन्दर की ओर खिसकते हैं। हम बाहरी चीजों को देखते हुए बिना पसंद-नापसंद के जागरूक हो सकते हैं, यह बहुत ही सरल है। लेकिन जब हम अन्दर, अपने भीतर की ओर जाते हैं तो बिना किसी आलोचना, बिना किसी निर्णय, बिना तुलना किये रहना ज्यादा मुश्किल हो जाता है। लेकिन हमें बस यह करना है कि हम अपने विश्वासों, डरों, झूठी मान्यताओं, भ्रमों , आशाओं, अवसादों, आकांक्षाओं और इसी तरह की अन्य सारी बातों के प्रति जागरूक रहें। इसी तरह हम परत-दर-परत अपने मन की ऊपरी सतहों और फिर गहरे तलों की यात्रा की शुरूआत कर सकते हैं।
26 Oct 2009
जो मन असाधारणरूप से शांत है, स्पष्टदृष्टा है उसे सीखने को शेष है भी क्या?
केवल देखने, सुनने के अतिरिक्त, सीखना क्या है?
सीखें पर किसी मनोवैज्ञानिक या विशेषज्ञ के कहे अनुसार नहीं। आप अपने आप को ही लें, अपने आप को ही देखें - बिना किसी आलोचना या प्रशंसा, निर्णय लेने के उद्देश्य से, या तुच्छता से अलग थलग पटक देने जैसे नहीं....बस.... मात्र देखें। उदाहरण के लिए देखें कि ”मैं घमंड करता हूं“ पर अब यह नहीं करना कि घमंड बुरी चीज है, या अच्छी, या गंदी चीज है... नजरिया बनाकर नहीं देखना है... बस केवल देखें। जैसे-जैसे हम निरपेक्ष, बिना किसी विक्षेप के यथावस्तु देखते हैं, हम सीखते हैं। देखना, मतलब सीखना कि अहं या घमंड में क्या-क्या शामिल है, यह जन्म कैसे लेता है, कैसे यह हमारे मन में गहरे कोनों में पैठा रहता है या सामने ही सामने फूलता-फलता है, और हमें ही इसकी फसल काटनी पड़ती है। जैसे हम अपने आप को ध्यानपूर्वक देखते हैं, तुरंत सीखते हैं। अब इसमें याद रखने और अनुभव करने जैसी कोई बात नहीं कि बाद में उससे सबक लेंगें।
तो यह बहुत कठिन है पर, यह केवल कुछ क्षणों 2-5 मिनट का काम है। ध्यानपूर्वक, जागरूक या सावधान-अवधानपूर्ण रहना बहुत कठिन है। हमारा मन बार-बार असावधान होता है तो उन क्षणों में जब आप असावधान हैं यह देखें-जाने कि असावधानता क्या है? हमें सावधान होने की कोशिश नहीं करनी, खुद से ही संघर्ष या लड़ना नहीं है पर यह देखना है कि यह असावधानता क्या है? ऐसा क्यों हो रहा है? इस असावधानता के प्रति पूरी तरह होशवान, सावधान रहें। यहीं ठहरें। यह ना कहें कि मैं अपना पूरा समय सावधान, होशपूर्ण रहने में ही लगाऊंगा। इससे ज्यादा गहराई में जाना जटिलता पैदा करेगा। यह हमारे मन का एक गुण है कि वह हर समय जागता है और देखता रहता है, और सीखना इसके अलावा कुछ है भी नहीं। जो मन असाधारणरूप से शांत है, स्पष्टदृष्टा है उसे सीखने को शेष है भी क्या?
सीखें पर किसी मनोवैज्ञानिक या विशेषज्ञ के कहे अनुसार नहीं। आप अपने आप को ही लें, अपने आप को ही देखें - बिना किसी आलोचना या प्रशंसा, निर्णय लेने के उद्देश्य से, या तुच्छता से अलग थलग पटक देने जैसे नहीं....बस.... मात्र देखें। उदाहरण के लिए देखें कि ”मैं घमंड करता हूं“ पर अब यह नहीं करना कि घमंड बुरी चीज है, या अच्छी, या गंदी चीज है... नजरिया बनाकर नहीं देखना है... बस केवल देखें। जैसे-जैसे हम निरपेक्ष, बिना किसी विक्षेप के यथावस्तु देखते हैं, हम सीखते हैं। देखना, मतलब सीखना कि अहं या घमंड में क्या-क्या शामिल है, यह जन्म कैसे लेता है, कैसे यह हमारे मन में गहरे कोनों में पैठा रहता है या सामने ही सामने फूलता-फलता है, और हमें ही इसकी फसल काटनी पड़ती है। जैसे हम अपने आप को ध्यानपूर्वक देखते हैं, तुरंत सीखते हैं। अब इसमें याद रखने और अनुभव करने जैसी कोई बात नहीं कि बाद में उससे सबक लेंगें।
तो यह बहुत कठिन है पर, यह केवल कुछ क्षणों 2-5 मिनट का काम है। ध्यानपूर्वक, जागरूक या सावधान-अवधानपूर्ण रहना बहुत कठिन है। हमारा मन बार-बार असावधान होता है तो उन क्षणों में जब आप असावधान हैं यह देखें-जाने कि असावधानता क्या है? हमें सावधान होने की कोशिश नहीं करनी, खुद से ही संघर्ष या लड़ना नहीं है पर यह देखना है कि यह असावधानता क्या है? ऐसा क्यों हो रहा है? इस असावधानता के प्रति पूरी तरह होशवान, सावधान रहें। यहीं ठहरें। यह ना कहें कि मैं अपना पूरा समय सावधान, होशपूर्ण रहने में ही लगाऊंगा। इससे ज्यादा गहराई में जाना जटिलता पैदा करेगा। यह हमारे मन का एक गुण है कि वह हर समय जागता है और देखता रहता है, और सीखना इसके अलावा कुछ है भी नहीं। जो मन असाधारणरूप से शांत है, स्पष्टदृष्टा है उसे सीखने को शेष है भी क्या?
24 Oct 2009
सीखा तभी जा सकता है जब हम अनुभव से मुक्त हों।
अनुभवों से कभी भी नहीं सीखा जा सकता। सीखने के लिए चाहिए आजादी, उत्सुकता, जिज्ञासा। जब एक बच्चा कुछ सीखता है, तब वह उस बारे में उत्सुक होता है, वह जानना चाहता है, वह स्वतंत्र संवेग होता है ना कि किसी चीज को पकड़ने, उस पर काबिज होने की प्रक्रिया और उससे आगे बढ़ना।
हमारे पास अनन्त अनुभव होते हैं और मानव सभ्यता के पाँच हजार सालों से हम युद्धों के अनुभव ही तो इकट्ठे कर रहे हैं। हमने इनसे एक भी चीज नहीं सीखी सिवा इसके कि हमने एक दूसरे को मारने की और भी अत्याधुनिक मशीनरी खोज ली है।
यहाँ तक कि सीखा तभी जा सकता है जब हम अनुभव से मुक्त हों।
हमारे पास अनन्त अनुभव होते हैं और मानव सभ्यता के पाँच हजार सालों से हम युद्धों के अनुभव ही तो इकट्ठे कर रहे हैं। हमने इनसे एक भी चीज नहीं सीखी सिवा इसके कि हमने एक दूसरे को मारने की और भी अत्याधुनिक मशीनरी खोज ली है।
यहाँ तक कि सीखा तभी जा सकता है जब हम अनुभव से मुक्त हों।
23 Oct 2009
रिश्ते दर्पण की तरह हैं।
रिश्ते दर्पण की तरह हैं जिनमें हम अपने आप को देख सकते हैं जैसे कि अभी हम हैं। इस पृथ्वी पर कोई भी ऐसी जिन्दा चीज नहीं जो किसी अन्य से सम्बंधित न हो। यहाँ तक की जंगल में अकेला बैठा सन्यासी भी अपने अतीत और अपने आसपास के लोगों से जुड़ा होता है। सम्बंधों से पलायन संभव ही नहीं है। यही संबंध एक दर्पण की तरह होते हैं जिनमें हम अपने आपको देख सकते हैं, हम यह खोज सकते हैं कि हम क्या हैं। इसी दर्पण में हम अपनी प्रतिक्रियाएं, पूर्वधारणाएं, गुस्सा, क्रोध, अपने भय, तनाव, विषाद, क्षोभ, अकेलापन, शोक, दर्द और दुख को देखते हैं। सम्बंधों के दर्पण में ही हम देख सकते हैं कि हम प्यार करते हैं या इस तरह की कोई चीज है ही नहीं। हमें रिश्तों संबंधी प्रश्नों की जाँच करनी चाहिए क्योंकि यही प्रेम का आधार हैं।
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