16 Oct 2009

कि‍सी व्‍यक्‍ि‍त या वस्‍तु से जुड़ाव की प्रक्रिया

  • क्या मैं जो हो रहा है उसे त्वरित रूप से या तुरंत देख सकता हूँ?
  • माना कि मैं किसी वस्तु या व्यक्ति से जुड़ गया हूँ। लेकिन क्या मैंने उस विषय, वस्तु या व्यक्ति से जुड़ने से एकदम पूर्व के हालातों को देखा? इस जुड़ने में क्या-क्या शामिल था? और यह जुड़ाव कैसे पैदा हुआ, क्यों हुआ? क्या मैंने इस जुड़ने की घटना की सम्पूर्ण प्रकृति को देखा?
  • क्या मैं किसी वस्तु या व्यक्ति से इसलिए जुड़ा क्योंकि मैं अकेला था, मैं सुविधा चाहता था, मैं किसी पर निर्भर होना चाहता था या, क्योंकि मैं अपने आप के साथ ही नहीं रह पा रहा था? मैं साहचर्य चाहता था, मैं चाहता था कि मुझसे कहे कि ”बहुत अच्छे! बरखुरदार तुमने बहुत अच्छा किया!“,  मैं चाहता था कि कोई मेरा हाथ थाम कर चले जब मैं विषाद या क्रोध में  होऊं। इसलिए मैं किसी पर निर्भर था जिसके परिणामस्वरूप यह जुड़ना या जुड़ाव हुआ। इस जुड़ाव से भय प्रकट हुआ, ईष्र्या और फिर गुस्सा पैदा हुआ।
  • वैसे ही ; जैसे आप कोई प्रेमिका पा लें और फिर उससे अलगाव से भयभीत हों, उसके किसी से बात करने पर ईष्र्या प्रकट करें, और उसका अन्य व्यक्ति से जुड़ाव होने पर आपको गुस्सा आये।
  • तो क्या आप इस पूरी जुड़ाव की प्रक्रिया को, जब यह चल ही रही....हो ही रही हो... तुरंत देख सकते हैं?
  • आप इस पूरी प्रक्रिया को बिल्कुल देख सकते हैं - यदि आप होश से भरे हों और आपको,,, मन की हरकतों के बारे में जानने समझने में रूचि हो।

23 Sept 2009

कोई अपने ही बारे में, छवि क्यों बनाता है?

किसी भी व्यक्ति की अपने बारे में एक संकल्पना, खुद का ही छविचिन्ह या छवि होती है - कि उसे क्या होना चाहिए, क्या है, या यह कि उसे क्या नहीं होना चाहिए।
आईये जाने कोई भी व्यक्ति अपने बारे में छवि क्यों बनाता है? क्योंकि वो इसका अध्ययन कभी नहीं करता कि वह वास्तव में वो क्या है, यथार्थतः क्या है? हम सोचते हैं कि हमें यह होना चाहिए या वह होना चाहिए, आदर्श, नायकों, या कल्पना या इतिहास के उदाहरण पुरूषों की तरह।

हम जब भी जागरूक होते हैं हमारी अपने ही बारे में कल्पना, आदर्श हम पर हमला करते हैं। हमारा अपने ही बारे में जो खयाल है वह, हम जो तथ्यरूप.. वास्तव में हैं उससे.. पलायन बन जाता है। लेकिन जब आप स्वयं को तथ्य रूप में देखतें हैं जो कि आप वास्तव में हैं, तब कोई भी आपको दुख नहीं पहुंचा सकता। तब यदि कोई व्यक्ति झूठा है और उसे कोई झूठा कहता है तो इसका मतलब यह नहीं कि झूठा कहने वाला उसे दुख पहुंचा रहा है, क्योंकि यह तो तथ्य ही है। लेकिन यदि आपका अपने बारे में यह खयाल है कि आप झूठे व्यक्ति नहीं हैं, और कोई कहता है कि आप झूठें हैं तो आप गुस्सा हो जाते हैं, हिंसक हो जाते हैं।

हम लोग हमेशा एक आदर्शलोक में जीते हैं, कल्पनालोक में जीते हैं... मिथकों में जीते हैं उस जगत में नहीं जो यथार्थतः है। जो वास्तव में है उसे देखने के लिए... उसका जांच पूछ परख, यथार्थ से परिचय के लिये - हमें पूर्वाग्रह, पूर्व में ही निर्णय, मूल्यांकन, उसके बारे में भय आदि बिल्कुल नहीं होना चाहिए।

22 Sept 2009

हम अकेले नही रह सकते

अब देखिये: जब आप सुनते हैं, यदि आप सुन रहें हैं, जब आप क्या कहा जा रहा है, यह सुनते हैं और उसमें हाजिर रहते हैं, न कि ये कि आप जो कहा जा रहा है उसे समझने की कोशिश करते हैं, हाजिर होने में मात्र जागरूकता होती है आप नहीं। वह क्षण जब आप जागरूक नहीं होते, आप एक केन्द्र होते हैं, आपका अहं या केन्द्र होता है। यह केन्द्र ही समस्याएं पैदा करता है। आपने जाना? नहीं? महानुभाव यह बहुत ही गंभीर बात है अगर आप इसमें गहरे जाएं। अगर एक ऐसा मन चाहिए जो समस्यारहित हो, और इसलिए अनुभव रहित भी तो यह बहुत ही गंभीर बात है। वह क्षण जब आप कुछ अनुभव करते हैं, और आप अनुभव को संचित करना, सहेजना चाहते हैं तब यह अनुभव एक स्मृति या या याद बन जाता है और आप इसे और अधिक मात्रा में चाहते हैं। तो वह मन जिसको कोई समस्या नहीं होगी, कोई अनुभव भी नहीं होगा। ओह! आप नहीं जानते कि इसमें कितनी सुन्दरता है।
क्या मैं आपसे आदरपूर्वक कह सकता हूं कि आप कृपया किसी के भी अनुयायी न बनें, अनुसरण न करें। लेकिन आप इसमें सहायता नहीं करते।
महोदय, इसका कारण जाने: हम अकेले नही रह सकते, हम सपोर्ट सम्बल चाहते हैं, हम दूसरों की ताकत चाहते हैं, हम चाहते हैं कि हमें एक समूह के रूप में पहचाना जाए, एक संस्थान के साथ। यह संस्थान (अब, कृष्णमूर्ति फाउंडेशन) उस तरह का संस्थान नहीं है, यह केवल पुस्तकें आदि प्रकाशित करने के लिए है। आप इसका अनुसरण नहीं कर सकतेे, क्योंकि आप किताबें नहीं छाप रहे, आप स्कूलों को नहीं चला रहे। पर संकल्पना है कि हम किसी चीज का हिस्सा बनें, ठीक? और किसीसे सम्बद्ध होना या अनुसरण ताकत देता है, ठीक? अगर मैं भारत में हूं और कहता हूं कि मैं हिन्दू नहीं हूं तो लोग मुझे जिस दृष्टि से देखेंगे वह खतरनाक होगी।

एक प्रश्नकर्ता ने कहा है कि जब वह एक चिन्हविशेष पर केन्द्रित होते हैं तो ताकत का अहसास करते हैं। हम सभी चिन्हों से जुड़े हैं। ईसाई जगत चिन्हांे से भरा पड़ा है। ठीक? सारा ईसाईजगत धार्मिक चिन्ह, छवियों, संकल्पनाओं, विश्वास, आदर्शों, रिवाजों से आच्छादित है इसी तरह का माहौल भारत में भी है बस नामकरण अलग है। जब कोई किसी विशाल समूह से सम्बद्ध रहता है जो समूह एक ही चिन्ह में श्रद्धा रखता है, वह एक अनन्य शक्ति प्राप्ति का अहसास करता है, यह प्राकृतिक है या बहुत ही आप्राकृतिक? यह आपमें जोश बनाये रखता है। यह आपमें यह अहसास बनाये रखता है कि आप कम से कम उसे चिन्ह से कुछ ज्यादा ही जानते समझते हैं।

पहले तो आप एक चिन्ह की खोज करते हैं - आप देखिये कि आपका मन कैसे काम करता है? पहले तो हम एक चिन्ह खोजते हैं, चर्च या मन्दिर मंे एक छवि, या यदि आप मस्जिद में हैं तो कोई अक्षर हम सब खोजते गढ़ते हैं और फिर उनकी पूजा शुरू कर देते हैं। हम उस सब की पूजा करते हैं जो हमने ही गढ़ा रचा या बनाया खोजा है यह मानकर कि वो हमारे अपने विचार से परे है.. जो हमें ताकत देता है शक्ति देता है।

तो क्या होता है? अब जबकि चिन्ह या संकेत या छवि जो कि वास्तविक नहीं है। पर चिन्ह या छवि हमें संतुष्टि देते हैं। चिन्हों को देखने, सोचने, उनके साथ रहने से हमें जोश, जीवनी शक्ति मिलती है। निश्चित ही जो विचार से सृजित हैं, मनोवैज्ञानिक रूप से वह संभ्रम और कल्पनाएं ही होंगे, क्या नहीं?

आप मुझे गढ़ सकते हैं, मैं आशा करता हूं कि आप ऐसा न करें, पर आप मुझे अपने गुरू के रूप में गढ़ लेते हैं। मैंने गुरू बनना सदा अस्वीकार किया है, यह एक बहुत ही बेहूदा चीज है क्योंकि मैंने देखा है कि किस तरह अनुयायी या शिष्य गुरू को और गुरू शिष्यों अनुयायियों को बर्बाद करते हैं। आप यह सब समझ रहें हैं न। मैंने यह देखा है। मेरे लिये यह सारी बात एक वीभत्सता है। क्षमा करें में रूक्ष भाषा का प्रयोग कर रहा हूं। पर जैसे आप मेरी एक गुरू की छवि बनाते हैं, वक्ता की छवि बनाते हैं, तो सारा गुरूघंटालों का धंधा अभी यहीं शुरू हो जाता है।
तो सर्वप्रथम यदि मैं कुछ इंगित करना चाहता हूं तो ये कि इन सब बातों में दिग्भ्रमित करने वाले चर्च और मन्दिर हैं, मस्जिदें हैं जो कि सच नहीं हैं, वास्तविक नहीं हैं। यह सब मन्दिर, मस्जिद, चर्च - पुजारियों के द्वारा, विचारों के द्वारा, हमारे डर के द्वारा, हमारी चिंता, भविष्य के प्रति अनिश्चितता से गढ़े गये हैं। आप समझें। हम एक संकेत या छवि बनाते हैं और उसी में फंस जाते, जकड़ जाते हैं। तो सर्वप्रथम हमें यह वास्तविकता जाननी होगी कि विचार वो चीज पैदा करता है जो हमं मनोवैज्ञानिक रूप से संतुष्टि प्रदान करती है, खुशी देती है। ठीक? वो हमें सुविधा देती है। ये संकेत या छवियां हमें अत्यंतिक सुविधा देती है। यह कुलमिलाकर संभ्रम है पर यह मुझे सुविधा देता है इसलिए मैं इससे परे कुछ देखता ही नहीं।

21 Sept 2009

आइये, अपने को ही समझें।

हम दुख को एक द्विअर्थी शब्द की तरह देखें, एक विरोधाभासी शब्द की तरह। आप उसे नकार दें, प्रश्न करें, संदेह करें, कुछ भी करें पर इसका सत्य खोजें। हमें इसका यथार्थ उत्तर खोजना है, सब लोगों द्वारा मिलजुलकर, इसलिए नहीं कि कोई ऐसा कह रहा है। क्या दुख का अंत हो सकता है? हमारा अस्तित्व ही शोकमय हो गया है, कई तरह से हम दुखी होते हैं, किसी अपमान में, किसी की हेय दृष्टि से, किसी की अकड़ से अहंकारपूर्ण मुद्रा से, बचपन में मिले घावों से, हमारे चेतन में गहरे पैठे किसी दुख से, या अचेतन में किसी के दुख से, या किसी को खो देने के दुख से। तो यदि आप गहराई से जाँचें, एक तथ्य की तरह लेकर तो यह है कि हम किसी न किसी तरह...... कभी अभिभावकों से, कभी शिक्षकों से, कभी स्कूल के अन्य छात्रों से, हमेशा ही दुखी होते रहे हैं। ये जख्म गहरे हैं, ढंके हुए हैं, और हम इनके चारों तरफ एक दीवार खड़ी कर देते हैं कि कोई हमें दुख न पहुंचा सके, और यही दीवार भय पैदा करती है।

आप में से कोई यह पूछ सकता है कि क्या हम यह चोटें या जख्म पूरी तरह अपने अस्तित्व से पोंछ सकते हैं? बिना खरोंचों के निशान छोड़े? आइये ये सब हम मिलकर देखें करें! मैं यह आश्वस्त होकर कह सकता हूं कि आप, हम सभी, जरूर कभी न कभी चोट खा चुके हैं, सब अलग-अलग तरह से अलग-अलग प्रकार से। यह दुख जमी बर्फ की तरह जमा हुआ है। इसे हम जीवन भर ढोते रहते हैं। इसका प्रभाव यह होता है कि हम अधिकाधिक अकेले होने लगते हैं, दुख के प्रति ही सचेत रहने लगते हैं, दुख को गंभीरता से लेने लगते हैं। हम नहीं चाहते कि हमें और दुख मिले तो हम अपनी चारों और एक दीवार खड़ी करते हैं। जैसे-जैसे यह दीवार ऊंची होती जाती है हमारा अकेलापन बढ़ता जाता है। आप सभी यह सब जानते हैं। तो कोई भी यह कह सकता है कि क्या ऐसा हो सकता है कि हम चोट न खाएँ? भविष्य की चोटों से, दुख से ही नहीं, आज के दुखों से बच सकें,, और इसी तरह अतीत के दुखों से जो किसी को बचपन में मिले उन्हें भी अपने व्यक्तित्व से पोंछ सकें, वो दुख जिन्हें हम जिन्दगी भर ढोते आए हैं।

अगर कोई वाकई गंभीर है तो उसे स्वयं इसका कारण खोजना होगा। जानना होगा कि हम दुखी क्यों होते हैं? इसका कारण क्या है? यह दुख क्या है? कौन दुखी हो रहा है और किससे?

कृपया इसे समझें, जानें। क्या यह संभव है कि कोई अपमान करे और हम उसे अपने व्यक्तित्व पर अस्तित्व पर अंकित ही न करें। कोई दुत्कारे, धौंस दिखाए उसे हम लिख कर ही न रख लें। कोई क्रोध दिखाए गाली बके, अधैर्य दिखाये तो इन सब को हम पंजीकृत ही न करें। हमें इसकी गहराई तक जाना होगा। तो क्या आप इसके लिए तैयार हैं?

हमारा मस्तिष्क एक यंत्र है गतिविधियों को अंकित करने वाला। एक कम्प्यूटर की तरह जिसमें डाटा रिकार्ड या अंकित कर जमा रखा जाता है। हमारा मस्तिश्क सारी गतिविधियों को अंकित कर लेता है क्योंकि इससे उसे सुरक्षितता मिलती है, एक तरह की आत्म सुरक्षा। ठीक? क्या आप सब यह चीजें समझ रहे हैं? तब जब कोई कहता है - तुम मूर्ख हो या अन्य कोई अपमान करता है तो हमारे मस्तिष्क की त्वरित प्रतिक्रिया होती है और वह इन सब बातों को अंकित करता जाता है। मौखिक रूप से इसका प्रभाव पड़ता है कि यदि आप दुख ही लेना चाहते हैं तो यह शब्द मस्तिष्क में अंकित हो जाएंगे, ठीक उसी तरह जैसे कोई तारीफ करे और आपका मस्तिष्क उसे एक आनन्ददाय याद की तरह अंकित कर ले। ठीक? तो क्या यह अंकित करने की प्रक्रिया किसी अंत पर आ सकती है?

मस्तिष्क का तो काम ही है सभी तरह की बातों को रजिस्टर मंे अंकित करे चले जाना। एक तरह से यह जरूरी भी है नहीं तो आप कैसे जानेंगे कि आपका घर कौन सा है, आप कार कैसे ड्राइव कर पाएंगे, या कोई भाषा कैसे बोल पांऐगे। लेकिन मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रियाएं, अहसास अंकित न हों, क्या ऐसा हो सकता है? आप यह सब समझ रहे हैं न?

अब कोई पूछ सकता है कैसे? कैसे मैं एक अपमान या एक तारीफ, एक प्रशंसा को अंकित होने से रोक सकता हूं? प्रशंसा का अहसास तो बहुत ही सुखदायक होता है और मैं उसे एक याद की तरह संजोना भी चाहता हूं, पर दुख और अपमान इन सबको तो मैं खत्म कर देना चाहता हूं, बचना चाहता हूं।

लेकिन दोनो घटक, अपमान हो या प्रशंसा, दोनों ही अंकित किये जाते हैं। तो क्या यह संभव है कि मनोवैज्ञानिक रूप से अंकित न किए जाएं? ठीक! अब हम इसे मिलजुलकर एक होकर समझें, आगे बढ़ें।

वह क्या है जो चोटिल होता है, दुखी होता है। आप कह सकते हैं ‘‘मैं चोट खाता हूं, दुखी होता हूं’’, तो प्रश्न उठता है यह कौन सी चीज, यह कौन सा अस्तित्व है या पहचान है जो दुख अनुभव करती है? क्या यह कोई वास्तविक या यथार्थ चीज है? इसका मतलब क्या है? क्या यह कुछ ठोस चीज है, संवेदनशील चीज है, कुछ ऐसी चीज है जिसके बारे में हम आप बात कर सकें या जिसे जान सकें?

या यह कोई ऐसी चीज है जिसे आपने खुद ही अपने लिये गढ़ लिया है!! आप समझ रहे हैं न?
ठीक है, मैंने अपने खुद के बारे में एक छवि गढ़ी है, हममें में बहुत से लोग ऐसा ही करते हैं। यह छवि बचपन से ही गढ़ना शुरू हो जाती है। जैसे कि लोग कहते हैं आपको अपने भाई जैसा होना चाहिए जो कि बहुत ही चतुर और चालाक है, आपको उससे बेहतर और अच्छा होना चाहिए। यह छवि नियमित रूप से बढ़ती है, हमारी शिक्षा में, हमारे संबंधों में और इसी तरह हमारे सभी तरह के व्यवहार में। यह छवि ही ‘मैं’ बन जाती है। यह छवि है जो मैं को धारण किये हुए है, दुखी होती, या चोट खाती है। ठीक।

तो जब तक कि हमारी कोई छवि है तब तक हमेशा ये सभी लोगों द्वारा कुचली जाती है, रौंदी जाती है। इस छवि का हमसे बेहतर बुद्धिमान लोग ही नहीं, साधारण आम लोगों द्वारा भी उसका यही हश्र होता है। तो क्या यह संभव है कि हम अपनी ही एक छद्म छवि का सृजन न करें? अपने ही छवि निर्माण से बचें? आईये हम सब इस विषय में गहरे चलें। आईये साथ चलें और समझें कि यह छवि गढ़ने वाली यांत्रिकता मशीनरी क्या है?समझें कि ये कैसे होती है?

यह ‘मेरे देश’ की छवि, नेताओं की छवि, पूजारियों की छवि, भगवान की छवि - आप समझ रहें हैं न। यह सब छवियों के निर्माण का ही नतीजा हैं। यह छवियां कौन बनाता है? यह छवियाँ क्यों बनाई जाती हैं? आईये समझें कि ये छवियां किसके द्वारा और क्यों बनती हैं?

हम यह आसानी से देख समझ सकते हैं कि यह छवियां सुरक्षा, आत्म सुरक्षितता के कारणों से गढ़ी जाती हैं। क्योंकि यदि मैं एक ऐसे देश में जहां कि कम्युनिस्ट नहीं हैं वहां खुद को कम्युनिस्ट कहलवाऊं मुझे ज्यादा तकलीफों का सामना करना पड़ेगा। या एक ऐसे देश में जो कम्युनिस्टों का है, मैं अपने आपको कम्युनिस्टों से अलग कर लूं तो भी मुझे दैनिक जीवन में कठिनाईयां आएंगी।

लेकिन यदि मैं अपने आपको किसी छवि से जोड़ लेता हूं, या एक छवि के साथ जुड़ा पहचाना जाता हूं तो इससे मुझे एक अत्यंत सुरक्षित अहसास का बोध होता है। इसलिए बस इसलिए, इन्हीं कारणों से हम सब किसी न किसी रूप में छवियाँ गढ़ते या उनसे सम्बद्ध रहते हैं। किसी राजनीतिक दल से जुड़ना या धार्मिक संगठन या संप्रदाय से। किसी विचारधारा से जुड़ना या किसी समूह विषेश से। इससे छवि निर्माण या सम्बद्धता सतत जारी रहते हैं।

आप जानते हैं कि यह छवियां कौन गढ़ता है? इसकी मशीनरी क्या है? इसकी प्रक्रिया क्या है? आइये हम सब मिलजुल कर सोचे विचारें, बिना किसी अन्य कि प्रतीक्षा किये? स्वयं ही समझे बूझें।
तो यहां पर कृपया ध्यान से पढ़ें सुने--- क्या यह मशीनरी यह सारी प्रक्रिया एकसम्पूर्ण जागरूकता या अवधानपूर्णता से खत्म हो सकती है? यह यह सारी प्रक्रिया या मशीनरी तब ही सक्रिय होती है या काम करती है जब हम बेहोश से जीते हैं?
यदि मैं सम्पूर्ण रूप से जागरूक होता हूँ और आप मुझे बेवकूफ कहते हैं....आप मुझे मूर्ख कहते हैं तो यह मौखिक पत्थर मुझ पर चोट का प्रभाव करता है और एक प्रतिक्रिया पैदा होती है कि तुम भी बेवकूफ या मूर्ख हो... मैं यह शब्द ग्रहण करता हूं, इन शब्दों का अर्थ लेता हूं वह अपमान जो आप मुझे इन शब्दों के द्वारा देना या अहसास कराना चाहते है... यदि मैं तत्काल उसी समय इस सारी प्रक्रिया के प्रति जागरूक रहता हूं जब आप इन शब्दों का प्रयोग करते हैं? अगर मैं उस समय सम्पूर्ण रूप से जागरूक रहता हूं और आप इन अपमान पैदा करने वाले शब्दों का प्रयोग करते हैं तो यह जागरूकता एक ढाल की तरह नहीं या उस यांत्रिक चीज की तरह नहीं जो आप दुख से बचने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं? इस जागरूकता में, सावधानता में कोई स्वीकार करने वाला ग्रहण करने वाला नहीं होता। लेकिन जब आप मुझे मूर्ख या बेवकूफ कहें तो यदि मैं जागरूक नहीं रहता तो मस्तिष्क इसे अपमान की तरह अंकित कर लेगा। आप इसे एक प्रयोग की तरह कर के आजमा सकते हैं।
इस तरह केवल अतीत के घाव ही नहीं, अतीत की चोटें ही नहीं बल्कि इससे आपका मन मस्तिष्क और संवेदनशील होंगे, ग्रहणशील और खुले होंगे, संचलन में ज्यादा सक्षम होंगे, ज्यादा जीवंत होंगे, ज्यादा सक्रिय होंगे।

उस दीवार की ऊंचाई कितनी होगी जो आपने अपने ईर्द गिर्द खड़ी कर रखी है? क्या यह संभव है कि वह हटे, खुले आप संवेदनशील हों, ज्यादा जिंदा हों और तथ्यात्मक रूप से समझें कि इस दीवार की... इसे बनाने की कतई आवश्यकता नहीं है। संपत्ति की सुरक्षा के लिए दीवारें खड़ी की जाती हैं - ध्यान से सुनें। धन संपत्ति के इर्द गिर्द दीवारें खड़ी की जातीं हैं और आपने खुद से ही एक सम्पत्ति की तरह व्यवहार करना शुरू कर दिया है।
आप समझ रहें है कि यहां क्या कहा जा रहा है?
तो फिर से समझें - हम सब इस सब तरह की बातें क्यों करते हैं? पहले हम अपने इर्द-गिर्द दीवारें उठाते हैं और फिर उन दीवारों को गिराने की कोशिशें करते हैं और खुद को इन दीवारों को गिराने में असमर्थ पाते हैं, हम इससे बचते हैं, हम इससे दूर भागने की कोशिश करते हैं, या इसी दीवार के पीछे छिप जाते हैं। हम सब इस तरह की बातें क्यों करते हैं? हम अपने ही लिये समस्याएं क्यों गढ़ते हैं? हम क्यों निरे सहज, स्वस्थ और सरल नहीं रह सकते?

अब यह प्रश्न किया जा सकता है- एक समस्या क्या है? कोई समस्या क्या है? आपको क्या समस्या है? किसी की भी क्या समस्या है? वह जो कि कोई सुलझाने में समर्थ नहीं हो रहा हों। ठीक। आप उसको आकलन करते हैं, या एक मनोवैज्ञानिक के पास जाते हैं, या चर्च मंे जाकर स्वीकार कन्फेशन करते हैं, या स्वयं ही उसका आकलन संरचनात्मक अध्ययन करते हैं और फिर भी समस्या ज्यों कि त्यों बनी रहती है, उसके कारण बने रहते हैं। और आप प्रभावों की जाँच करते रहते हैं, प्रभावों का पर्यवेक्षण करते हैं। ठीक? और कारण की विचित्रता देखिये... कारण ही प्रभाव हो जाता है - आप समझ रहे हैं? और प्रभाव ही कारण बन जाता है। क्या यह सब अति बौद्धिक है?

तो हम सब के लिए समस्या क्या है? हमारी समस्या क्या है? और हमें समस्याए क्यों हैं? चलिये एक सामान्य सी समस्या लेते हैं - क्या ईश्वर है? मैं इसे एक तुच्छ उदाहरण के रूप में ले रहा हूं। क्योंकि हम कहते हैं ‘‘यदि ईश्वर है तो उसने इस विशाल दैत्याकार विश्वका निर्माण कैसे किया? ठीक। तो यह सब अधिक से अधिक और अधिक समस्याएं उत्पन्न करता है। सर्वप्रथम तो हम मान लेते हैं कि यह ईश्वर ने बनाया है, यह संसार और उसके बाद हम उसमें शामिल हो जाते हैं। या मैं एक विशेष संकल्पना रखता हूं, और उस संकल्पना या आदर्श के अनुसार जीना चाहता हूं इसलिए यह एक समस्या बन जाती है। मुझे बिल्कुल नहीं दिखता या बिल्कुल समझ नहीं आता कि हम सब को क्यों एक आदर्श के अनुसार होना चाहिए? सर्वप्रथम तो हम एक आदर्श बनाते हैं, फिर उस आदर्श के अनुसार जीने की कोशिश करते हैं जो समस्याएं पैदा होने की जड़ बन जाता है। मैं अच्छा नहीं हूं, .. मुझे अच्छा होना चाहिए तो बताइये कि मुझे क्या करना होगा यह सब प्राप्त करने के लिए आदि आदि। तो देखिये हम कैसे समस्या बनाते हैं, सर्वप्रथम कुछ काल्पनिक छाया सा गढ़ते हैं, जैसे अहिंसा एक काल्पनिक अप्रकट चीज है। तथ्य हिंसा है। हिंसा तथ्य है, और तब मेरी समस्या पैदा हो जाती है। कि कैसे मुझे अहिंसक बनना है? आप समझ रहे हैं न। अगर मैं हिंसक हूं तो मुझे उससे निपटने देना चाहिए न कि अहिंसक बनने से।

तो एक स्तर पर यह सब है जो हम कर रहे हैं? या यह कि मैं अपनी पत्नी के साथ नहीं निभा पा रहा। मैं इस सब के बारे में नर्वस रहता हूं। मैं किसी या अन्य के साथ नहीं चल पाता। इन सब में आप देखिये कि मैं क्या कहना चाह रहा हूं? हम सब कुछ मंे और सब जगह समस्याएं पैदा कर लेते या गढ़ लेते हैं। तो प्रश्न है, समस्या न होने से ज्यादा महत्वपूर्ण समस्या को सुलझाना हो गया है? अगर कोई समस्या नहीं होगी तो आपका मन मस्तिश्क यह, वह या अन्य समस्याओं को सुलझाने के अनन्त संघर्षों से बच जाएंगे। सभी समस्याओं की जड़, यह मूल समस्या क्या है? तकनीकी, गणितीय समस्याओं की नहीं, मनुष्य की मानवीय, आंतरिक मनोवैज्ञानिक समस्याओं में - इनकी जड़ क्या है? महानुभावो कृपया आईये और खोजिये। क्या इसका मूल कुछ ऐसा है कि उखाड़ फेंका जा सके, या उसे सुखा कर नष्ट किया जा सके, जिससे दिल दिमाग मंे कोई समस्या न रहे?
समस्या क्या है? कुछ जो वर्तमान में सम्मिश्रित है या भविष्य में है। ठीक? एक समस्या केवल समय में रहती है, समय में निहित होती है।

एक समस्या तब तक ही रहती है जब कि हम समय की भाषा मंे सोचते हैं। न केवल भौतिक या वैज्ञानिक समय में बल्कि मनोवैज्ञानिक, मानसिक समय में भी। जब तक हम मनौवैज्ञानिकता में समय की प्रकृति नहीं समझते, हम हमेशा समस्याओं में रहेंगे। हम सब एक साथ इन समस्याओं के पैदा होने, इनके अस्तित्व के बारे में एक साथ बैठकर बात कर रहे हैं, खोजबीन कर रहे हैं।
होता यह है कि हम दुनियादारी में सफल होना चाहते हैं साथ ही साथ आध्यात्मिक मामलात में भी सफल होना चाहते हैं।
ये दोनों बातें समान हैं। यह सफल होने की आकांक्षा समय में होने वाली गतिविधि है। तो हम कह रहे हैं, वह क्या जड़ या मूल है जो समस्याएं पैदा करता है निरंतर समस्याएं, समस्याएं, समस्याएं।

क्या यह विचार है? या यहाँ एक केन्द्र है जो अपनी परिधि में ही गति करता है? क्या समस्याएं तब तक ही नहीं रहती जब मैं खुद के, स्वयं के बारे में ही चिंतित होता हँू? जब तक मैं भला होने की कोशिश करता हूं, यह और वह और जाने क्या क्या चाहता हूं? मैं ही समस्याएं पैदा करूंगा। जिसका मतलब है क्या मैं अपनी एक भी छवि बनाये बिना जिन्दगी जी सकता हूँ?

जब तक मैं अपने सफल होने की छवि, या मुझे बुद्धत्व प्राप्त करना ही है इसकी छवि, या मुझे ईश्वर का साक्षात्कार करना है इसकी छवि, या मुझे भला बनना है, मुझे और प्रेमी की तरह का व्यक्ति बनना है, मुझे महत्वाकांक्षी नहीं बनना है, मुझे किसी को दुख नहीं पहुंचाना है, मुझे शांतिपूर्वक जीना है, मुझे एक मौन मन होना है, मुझे अनिवार्य रूप से जानना है कि ध्यान क्या है..... आदि आदि अपनी ही छवियां बनाते हैं। क्या यह संभव है कि हम मुक्त हो कर जीते रह सकें? जब तक किसी भी प्रकार का केन्द्र है तब तक समस्याएं रहेंगी ही। अब यह समझें, क्या केन्द्र का होना अजागरूक या बेहोश होने का नतीजा या निचोड़ है? अगर जागरूकता होगी तो निश्चित ही कोई केन्द्र नहीं होगा।

16 Sept 2009

यह हमारी एक परंपरा रही है जो कहती है आपको भले होने या सच्चा इन्सान बनने के लिए दुख उठाने होंगे। ईसाई जगत में भी और हिन्दुओं में भी... भले ही इसे दोनों अलग-अलग शब्दों में व्यक्त करते हैं। हिन्दू इसे कर्म वगैरह कहते हैं ईसाई कुछ और। और वो सब जगह कहते हैं कि आपको अनिवार्यतः दुख से गुजरना होगा, जो कि शारीरिक ही नहीं मनोवैज्ञानिक मानसिक भी होगा। इसका मतलब यह कि आपको कठिनतम कोशिशें करनी होंगी अथक प्रयास करने होंगे, संताप झेलने होंगे, आपको अपना सर्वस्व देना होगा, सब त्यागना होगा, सबका दमन करना होगा।
यह हमारी परंपरा रही है। पूर्व और पश्चिम जगत दोनों में। जबकि दुख सारी मानवजाति के लिए समान ही है और ये कह रहे हैं कि आपको एक विशेष द्वार से गुजरना होगा।
क्या कोई एक व्यक्ति है जो इस वक्ता के साथ आए और कहे कि इस दुख को खत्म होना है, इस दुख से गुजरने की कोई जरूरत नहीं, इसे समाप्त करना है। आप समझ रहे हैं मैं क्या कह रहा हूं? दुख अनिवार्य नहीं है। यह जीवन का बहुत ही विध्वंसक तत्व है। दुख... खुशी की तरह ही वैयक्तिता का निर्माण करता है यानि दुख कुछ आपका निजी, रहस्यपूर्ण, केवल अपना.. अन्य किसी का नहीं। जबकि मानवता वैश्विक दुख से, अनन्त संताप से... युद्धों से, भुखमरी से, हिंसा से गुजर रही है- आप देख रहे हैं? वह विभिन्न रूपों में दुखों को झेल ही रही है इसलिए उसने यह स्वीकार कर लिया है कि यह तो अपरिहार्य है ही। तो क्या इन शब्दों को सकारात्मक रूप में लिया जाना चाहिए या खुद को बदलने के लिए जागरूकता के स्रोत के रूप में।

15 Sept 2009

हम वैचारिकता की पूजा करते हैं। जितना ज्यादा और तीव्रता से हम सोचते हैं उतने ही बड़े माने जाते हैं। सभी दार्शनिकों ने असंख्य संकल्पनाएं दी हैं। पर यदि हम अपने ही भ्रम का निरीक्षण करें, अपनी व्यक्तिगत जिंदगी में संकीर्ण ढंग से देखने के रवैये को देखें, घर पर रोजमर्रा की दिनचर्या में देखें। इन सब के प्रति जागरूक रहें तो देखें कि कैसे विचार अविरत समस्याएं बनाने में ही लगा रहता है। विचार छवि बनाता है और छवि बाँटती है। यह देखना बुद्धिमत्ता है। खतरे को खतरे की तरह देखना बुद्धिमत्ता है। मनोवैज्ञानिक खतरों को देखना बुद्धिमत्ता है। पर प्रकतया हम इन चीजों को नहीं देखते।
इसका मतलब ये है कि कोई आपको हमेशा हांकता रहे, कारण बताकर उपदेश देता रहे, धकेलता रहे, संचालित करता रहे या कहता रहे, अनुनय करे कि कुछ करो तो ठीक वरना आप अन्य सारे समय अपने आप जागरूक रहने को बिल्कुल तैयार नहीं हैं। आप चाहते हैं कि एक आदमी हमेशा आपको जागरूक रखने के लिये, यह सब करने के लिए आपके साथ साथ हमेशा रहे। बताये कि ये करना ये ये नहीं, यहां जाना है यहां नहीं। और ऐसा कोई भी नहीं करेगा, यहां तक कि अति जागरूक व्यक्ति, बुद्धपुरूष भी नहीं। क्योंकि यदि कोई जागरूक बुद्धपुरूष आपक पीछे इस तरह पड़ भी जाये तो आप केवल उसके दास या गुलाम की तरह हो जाएंगे, आप समझ रहे हैं न।

तो यदि किसी को पास जिन्दादिली है, शारीरिक उर्वरता है, मनोवैज्ञानिक ऊर्जा है, जो कि अभी आपके आंतरिक द्वंद्वों, चिंता, बकवास चेटिंग, अनन्त गपबाजी में व्यर्थ ही खर्च कर रहे हैं.... आप अपनी ही नहीं अन्य लोगों की शक्ति भी व्यर्थ नष्ट कर रहे हैं, यही जिन्दादिली, शारीरिक और मानसिक शक्ति अथवा ऊर्जा आत्म अवधान में लगाई जा सकती है, वहां यह अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।

यही वह ऊर्जा है जिसका आप सबंधों के दर्पण में अपने आपको देखने पहचानने के लिए निवेश कर सकते हैं। हम सब एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। इन्हीं सम्बंधों में हमें संभ्रमों, गढ़ी हुई छवियों, व्यर्थताओं, ओढ़े हुए सिद्धांतों को देख पहचान कर इनसे बाहर निकलना है। इनसे निवृत्ति ही हमें मुक्ति के आकाश में ले जाएगी जहां सच्ची बुद्धिमत्ता प्रकट होती है, जो हमें जीवन का सही रास्ता दिखाती है। तो चलिये इसी मुक्ति की राह पर हम साथ साथ चलें।