31 Jul 2009
क्या कोशिश का मतलब बदलाव लाने के लिए किया गया वह संघर्ष नहीं है जो, ‘जो है’ उसे ‘जो नहीं है‘ या, जो होना चाहिए या जो होगा, उसमें बदलने के लिए। हम ‘जो है’, उसमें परिवर्तन अथवा बदलाव के लिए निरंतर पलायन करते/भागते रहते हैं। जब हम उस वास्तविकता से ‘जो है’, अ‘जागरूक होते हैं केवल उसी समय बदलाव की कोशिश पैदा होती है। तो कोशिश अ‘जागरूकता है। ‘जो है’ उसके अभिप्राय, उसके महत्व को जानना समझना जागरूकता है, और इस अभिप्राय/महत्व को पूर्णरूपेण स्वीकारना स्वतंत्रता लाता है। तो जागरूकता निष्प्रयास है। जागरूकता, ‘जो है’ उसे वैसा का वैसा बिना किसी विक्षेपण के देखना है। जहाँ भी कोशिश की जाती है प्रयास किया जाता है, वहाँ विक्षेपण होता है।
20 Jul 2009
सजगता द्वारा मैं खुद को देखना शुरू करता हूं, जैसा कि वास्तविकता में मैं हूं, अपने स्वयं का पूर्णत्व। प्रत्येक क्षण की गति को देखते हुए उसके सभी विचारों, उसके अहसासों, उसकी प्रतिक्रियाओं, अचेतन औ चेतन भी मन .... निरंतर अपनी गतिविधियों का अर्थ महत्व खोजता रहता हैं। यदि मेरी समझ मात्र कुछ चीजों का जोड़ है, तो यह जोड़ एक शर्त बन जाता है जो मेरी आगे की समझ को रोकती है। तो क्या मस्तिष्क स्वयं को बिना कुछ जोड़े घटाये जैसा है वैसा का वैसा ही देख सकता है?
एक स्पष्टता जो किसी कारण विशेष से नहीं होती - जब मन और शरीर की प्रत्येक क्रिया के बारे में अंर्तमुखी सजगता रहती है, जब आप अपने विचारों, खुले और दबे ढंके हुए सभी अहसासों, चेतन और अवचेतन के प्रति सजगता रखते हैं तब इस सजगता से एक स्पष्टता आती है जो बिना किसी कारण विशेष के होती है। जिसे बुद्धि के साथ एक ही श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। इस स्पष्टता के बिना आप जो करें, आप स्वर्ग, सारी धरती और कई अतल गहराईया छान लें लेकिन आप बिलकुल ही नहीं जान सकते कि सच क्या है?
एक स्पष्टता जो किसी कारण विशेष से नहीं होती - जब मन और शरीर की प्रत्येक क्रिया के बारे में अंर्तमुखी सजगता रहती है, जब आप अपने विचारों, खुले और दबे ढंके हुए सभी अहसासों, चेतन और अवचेतन के प्रति सजगता रखते हैं तब इस सजगता से एक स्पष्टता आती है जो बिना किसी कारण विशेष के होती है। जिसे बुद्धि के साथ एक ही श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। इस स्पष्टता के बिना आप जो करें, आप स्वर्ग, सारी धरती और कई अतल गहराईया छान लें लेकिन आप बिलकुल ही नहीं जान सकते कि सच क्या है?
यदि आप बाहरी चीजों के प्रति होशवान हैं
कृपया इसे ध्यानपूर्वक सुनें। हम में से बहुत से लोग सोचते हैं कि सजगता, ध्यान कुछ रहस्यमयी चीज है जिसका अभ्यास करना चाहिए और जिसके लिए बार-बार हम इकट्ठे होते और, बातें करते हैं। लेकिन इस तरीके से कभी होशवान नहीं हुआ जाता। लेकिन यदि आप बाहरी चीजों के प्रति होशवान हैं - दूर तक चली गई सड़क के सर्पीले घुमावदार लहराव, वृक्ष का आकार, किसी के पहनावे का रंग, नीले आसमान की पृष्ठ भूमि में किसी पर्वत का रेखाचित्र, किसी फूल का सौन्दर्य, किसी पास से गुजरते व्यक्ति के चेहरे पर दुःखदर्द के चिन्ह, किसी का हमारी परवाह न करना, दूसरों की ईष्र्या, पृथ्वी की सुंदरता..... तब इन सब बाहरी चीजों को बिना किसी आलोचना के, बिना पसंद नापसंद किये, देखना...... इससे आप आंतरिक अंर्तमुखी सजगता की लहर पर भी सवार हो जाते हैं। तब आप अपनी ही प्रतिक्रियाओं, अपनी ही क्षुद्रता, अपने ईष्र्यालुपन के प्रति भी होशवान हो सकते हैं । बाहरी सजगता से आप आंतरिक सजगता की ओर आते हैं। लेकिन यदि आप बाह्य बाहरी के प्रति सजग नहीं होते हैं तो आपका अंातरिक अंर्तमुखी सजगता पर आना असंभवप्राय है।
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अपने ही बारे में,
ध्यान
4 Jul 2009
स्वकेन्द्रित दुःख का शोक
हम अपने से संबंधित चीजों के बारे में देखने और सोचने मंे कितना कम ध्यान देते हैं। हम अति आत्मकेन्द्रित हैं, अपनी ही चिंताओं से भरे हुए, अपने ही लाभ के लिए हमारे पास देखने और समझने का समय नहीं है। यह भरापन हमारे मन को कुंद और हमें दिल दिमाग से थका हुआ, हीनताग्रस्त और शोकपूर्ण बनाता है और शोक से हम पलायन करना चाहते हैं। जब तक हमारा ‘स्व’ सक्रिय है थकान, कुंदपना और हीनग्रस्तता होगी ही। लोग एक पागलपन की दौड़ में फंसे हुए हैं, अपनी ही आत्मकेन्द्रित दुख के शोक में। यह शोक एक गहरी विचारहीनता है। विचारवान, और देखने वाला सभी दुःखों से मुक्त होता है।
2 Jan 2009
ध्यान जीवन के लिए अनिवार्य है
वास्तव में क्या सच है और क्या झूठ इसके लिए, प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष प्रभावांे की सभी समस्याओं को समझने के लिए हमें, आंतरिक और बाह्य उद्देश्यों के प्रभावों - अनुभवों के प्रभाव, ज्ञान के प्रभाव को समझना होगा। हमें अत्यांतिक अंर्तदृष्टि, एक गहरी सूझ-बूझ चाहिए जो है उसे वैसा ही (बिना किसी बात से प्रभावित हुए) देखने के लिए और इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को ही ध्यान कहते हैं। ध्यान उसी तरह अनिवार्य है जैसे हमारा जीवन, दिनचर्या, और जीवन मंे खूबसूरती। खूबसूरती को खूबसूरती और कुरूप को कुरूप की देख सकने वाली चेतना चाहिए वर्ना आप खूबसूरत वृक्षों, शाम के सिन्दूरी आसमान और अनन्त विस्तार तक फैले क्षितिज में बादलों के झुरमुट में बैठे सूरज की खूबसूरती कैसे जान पाएंगे। सारी खूबसूरती और कुरूपता को जैसी वो है, वैसा ही देखने के लिए ध्यान की आंख चाहिए। हमारी सारी दिनचर्या में ध्यान चाहिए - सुबह जब हम दफ्तर या काम पर निकलते हैं, लड़ाई झगड़े करते हैं, तनाव, क्रोध, क्षोभ और गहरे डर को, प्रेम को, वासना को - इन सब बातों को समझने के लिए ध्यान अनिवार्य मूलभूत आवश्यकता है। हमारे अस्तित्व की संपूर्ण प्रक्रिया को - कौन सी बातें हमें प्रभावित करती हैं, किन बातों से हम तनाव में घिर जाते हैं, किन बातों को सुनसमझ महसूस कर हम फूल कर कुप्पा हो जाते हैं, किनसे दुख किनसे सुख मिलता साा लगता है इन सब बातों को जानने समझने का माध्यम है ध्यान। यह सम्पूर्ण देखना, जानना, बूझना समझना हमें समस्याओं से असत्य से मुक्त करता है और यथार्थ में प्रवृत्त यही ध्यान है।
31 Dec 2008
ध्यान शुभता के पुष्प का खिलना ही है।
एक निःश्छल, निस्वार्थ दिल का होना ध्यान का आरंभ है। जब हम उस के बारे में बात करना चाहते हैं तो मन मस्तिष्क के अंतस्तल की कोशिशों की आवश्यकता होगी। हमें पहला कदम उसके सबसे निकट के बिंदु से उठाना होगा। ध्यान का फल है शुभता और निश्छल ह्दय ध्यान का आरंभ है। हम जीवन की बहुत सी चीजों के बारे में बात करते हैं। प्रभुता, महत्वाकांक्षा, भय, लोभ, ईष्र्या, मृत्यु के संबंध में बहुत सी बातें करते हैं। अगर आप देखें तो, अगर आप इनके भीतर तक जाएं तो, यदि आप ध्यानपूर्वक सुने तो ये सारी बातें एक ऐसे मन को खड़ा करने का आधार हैं जो ध्यान में सक्षम हो। आप ध्यान के शब्द से खेल सकते हैं - ध्यान नहीं कर सकते यदि आप महत्वाकांक्षी हों। यदि आपका मन प्रभुत्व का आकांक्षी है, संस्कारों में बंधा है, स्वीकार और अनुसरण में लगा है तो आप ध्यान की खूबसूरती का अतिरेक नहीं देख सकतेे।
समयबद्ध रूप से इच्छाओं को पूर्ण करने की कोशिशें, मन की निश्छलता को, निस्वार्थ भाव को खत्म करती हैं। और आपको चाहिए एक निश्छल मन - एक खुला ह्दय, जो आकाश की तरह खाली हो। एक दिल जो बिना विचारे, निरूद्देश्य देना चाहता हो बिना किसी प्रतिफल की आशा के। क्षुद्रतम से लेकर जितना भी उसके पास हो उसे देने की त्वरितता, बिना किसी असमंजस, भले बुरे की परवाह बगैर, मानरहित..... किसी ऊंचाईयां की तलाश की कोशिश बगैर, बिना प्रसिद्धि की लालसा में। ऐसे उर्वर मन की भूमि पर ही शुभता फूलती फलती है। और ध्यान शुभता के पुष्प का खिलना ही है।
समयबद्ध रूप से इच्छाओं को पूर्ण करने की कोशिशें, मन की निश्छलता को, निस्वार्थ भाव को खत्म करती हैं। और आपको चाहिए एक निश्छल मन - एक खुला ह्दय, जो आकाश की तरह खाली हो। एक दिल जो बिना विचारे, निरूद्देश्य देना चाहता हो बिना किसी प्रतिफल की आशा के। क्षुद्रतम से लेकर जितना भी उसके पास हो उसे देने की त्वरितता, बिना किसी असमंजस, भले बुरे की परवाह बगैर, मानरहित..... किसी ऊंचाईयां की तलाश की कोशिश बगैर, बिना प्रसिद्धि की लालसा में। ऐसे उर्वर मन की भूमि पर ही शुभता फूलती फलती है। और ध्यान शुभता के पुष्प का खिलना ही है।
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